जनवरी 07, 2014

हिन्दी ब्लॉगिंग: दस साल बाद यह पड़ाव

गतांक से आगे..

बड़ी देर से स्क्रीन के सामने बैठे सोच रहा हूँ, कहाँ से शुरू करूँ? कितनी सारी बातें एकसाथ आ रही हैं। उन्हे किस क्रम से कह पाऊँगा? जबसे यह तय किया है के ब्लॉग के इन बीते दिनों पर कुछ लिखना है तब से ‘नोट्स’ बन रहे हैं। कितने तो ड्राफ़्ट लिखे और मिटा दिये। पर आज उनमे से कुछ ज़रूरी बातें कह ही दूंगा। इसलिए शुरू में ही कह रहा हूँ यह कोई ‘संस्थानिक शोधपत्र’ नहीं है। न उन वैज्ञानिक प्रविधियों पर इसकी जाँच संभव है। यह मेरी व्यक्तिगत सीमाओं के भीतर बनी दृष्टि है। इस कथन के बाद यह लेख प्रारम्भ माना जाये। इससे अलग कुछ नहीं।

ब्लॉग। बहुत छोटा सा शब्द है। उसमें छोटी सी हिन्दी की दुनिया है। पिछली बार यही कह रहा था के ब्लॉग लिख कौन रहा है? इसके पाठक कौन हैं? इन्हे लिखा क्यों जा रहा है? यह शास्त्रीय काव्य ‘हेतु’, ‘लक्षण’, ‘प्रयोजन’ के चश्मे से अलग प्रस्थान बिन्दुओं की तरफ़ हमें ले जाते हैं। यह किसी अस्मितावादी पाठ के निर्माण की प्रक्रिया जैसा है। जहाँ सभी अपने हिस्सों के साथ माजूद हैं। हम सब कह लेना चाहते हैं। जो आज तक किन्ही कागज़ के पन्नों में बंद जिल्दों में रखा था, उसे सबके लिए सहज उपलब्ध कराने जैसा। यहाँ इंतज़ार है। बेकरारी है। शब्दों को ढूँढना है। उन्हे कहीं से पकड़ लाना है। उन्हे कंपनी बाग के भारी से लोहे के बेंच की तरह जमाते हुए। जहाँ हम सब पाए जाएँगे। जब जो मन करेगा कहेंगे। किसी से पूछेंगे नहीं। बस लिख देंगे।

यह सीमित अर्थों में उन वर्चस्ववादी प्रकाशन संस्थानों से अलग लेखन का लोकतांत्रिकीकरण है, जहाँ कौन, कैसे, किस रूप में प्रकाशित होता है; इसका पारदर्शी ढाँचा कम-से-कम हिन्दी में तो नज़र नहीं आता। उन्हे कोई खोलना नहीं चाहता। उन बंद दरवाजों से अलग एक यह दुनिया है। तथा सीमित इस अर्थ में भी कि जिस प्रौद्योगिकी का हम इस्तेमाल कर रहे हैं उसकी पहुँच का दायरा इतना विस्तृत नहीं है। वह अभी भी बहुत छोटा घेरा है। बिलकुल वैसे ही जैसे यह कहना असंगत है कि दिल्ली विश्वविद्यालय और उत्तरप्रदेश में वितरित ‘लैपटॉप’ के बाद, उन प्राप्तकर्ताओं के ‘ब्लॉगर’ बनने की संभावना बढ़ गयी है। बहरहाल। वापस।

यहाँ सबसे बड़ा सवाल ब्लॉग बना लेना नहीं है। उसे चलाना है। चलाना नियमितता है। यहाँ बार-बार आना है। हमने यह स्पेस किस लिए बनाया? हम यहाँ क्या करने आते हैं? हमारे पास कहने के लिए क्या है? हम लगातार इसे कैसे बना बिगाड़ रहे हैं? हमारे पास उन शुरुवाती दिनों में कह लेने के रोमांच के बाद इधर आने का कितना समय है? हम कितना समय इसके लिए अपनी व्यस्त दिनचर्या में से निकाल पाते हैं? हम कब तक अपनी आंतरिक प्रेरणा के सहारे यहाँ टिके रहते हैं। यह जगह हमें कितना रोक पाती है। फ़िर ऐसे उदाहरण कम ही होंगे जिनमे ‘मानसिक हलचल’ के लेखक ज्ञान दत्त पाण्डेय की प्रेरणा से प्रवीण पाण्डेय ‘न दैन्यं न पलायनम्’ नियमित लिखने लगे। कभी-कभी यहाँ ऐसे ब्लॉग भी टकरा जाते हैं जो अब उतने नियमित नहीं हैं या बिलकुल सो गए हैं। जैसे एक अनाम सी लड़की अर्चना का ब्लॉग है ‘तुम्हारे लिए’। वह वहाँ पिछले साल सितंबर के बाद नहीं है। इन्हे किन अर्थों में लें?

फ़िर इधर एक बदला हुआ ट्रेंड दिखता है। कई ऐसे हैं जिनके पास कहने के लिए बहुत कुछ है। वे अभी भी उतनी संवेदनशीलता से अपनी बात कह रहे हैं। उनके अनुभवों में, विचारों में, कहने में वैविध्य बना हुआ है। वे समानान्तर उस जगह का इस्तेमाल करते रह सकते हैं। पर वे अब ब्लॉग की जगह ‘फ़ेसबुक’ पर अपनी बात कहते हैं। उदय प्रकाश अब वहाँ कोई पोस्ट नहीं लगाते। प्रियदर्शन बड़े विनयपूर्वक पढ़ने का आग्रह यहीं अपनी दिवार पर कर देते हैं। ‘बात पते की’ कभी पब्लिक डोमेन में खुला मिला ही नहीं। मनीषा पाण्डेय कभी ‘बेदखल की डायरी’ लिखती थीं। अब यहीं रहती हैं। एक तरफ़ यह उन्हे लक्षित पाठक वर्ग से सीधे जोड़ता है, साथ ही यहाँ सरलता से उन सबकी त्वरित टिप्पणियों से परिचित हो जाते हैं। पर अगर यह सिर्फ़ संवाद की बात है तब समझ नहीं आता कि फ़िर किशोर चौधरी ने अपने ब्लॉग ‘हथकढ़’ पर कमेंट्स को डिसेबल क्यों कर रखा है।

अभी जब इसी पोस्ट के लिए गूगल की तलाशी ले रहा था तब कहीं पढ़ा के रवीश एक जगह कहते हैं जब भी वह ‘हिंदुस्तान’ के अपने साप्ताहिक कॉलम ‘कमेंटरी’ के लिए ब्लॉग ढूँढते थे, तब उनका सारा ध्यान इस बात पर होता था कि इस हिन्दी में साहित्यिक विषयों से इतर कहीं लिखा उन्हे मिले। वह उन पुरानी यादों बातों संस्मरणों के विशुद्ध हिन्दी पाठ न हों। उनमे विषयों को लेकर विविधता हो। यह सच है के हममे से अधिकतर का लेखन इसी हिन्दी की साहित्यिक परिभाषा में समा जाने की इच्छा से लिखा जा रहा है। क्योंकि हम वहाँ नहीं हैं, हमारे अनुभव वहाँ नहीं हैं इसलिए सबसे पहले हम वहाँ हो जाना चाहते हैं। और ऐसा लगता है अभी यही चलने वाला है। हम पहले ख़ुद को तो कह लें। पर ऐसा भी नहीं है के यहाँ साहित्येतर कुछ नहीं लिखा जा रहा।

लेकिन अभी जो बात ऊपर से सीधे जुड़ रही है। वह यह कि वहीं किसी लिंक पर रवीश के कॉलम के दोहज़ार दस में बंद हो जाने पर एक पाठक यह लिखता है के वे इसका मौखिक इतिहास लिख रहे थे। उस परंपरा में अभी कोई नज़र नहीं आता। हम इससे लिखना भी सीख रहे थे। पर यहाँ जो महत्वपूर्ण बात रही जा रही है वह यह कि इस तरह रवीश ने प्रिंट मीडिया में ब्लॉग के लिए जगह बनाई। यह इसे अगंभीर माध्यम के बजाय एक संभावनाशील माध्यम के रूप में स्थापित करते हैं। तभी आज बड़े से बड़े अख़बार में इन आवाज़ों के लिए नियमित स्थान सुनिश्चित है। ‘ब्लॉग् इन मीडिया’ वैबसाइट की परिकल्पना इसी के बाद का विचार है। जो इन अखबारों में प्रकाशित होते ब्लॉगों का संकलन करती है। उन्हे बाकायदा वहाँ ब्लॉगवार रखती है। 

प्रवीण ने संस्थानिक प्रयासों की बात की है। पता नहीं इसे संस्थानिक प्रयास माना जाएगा के नहीं। फ़िर भी लिखे दे रहा हूँ। बड़े दिनों से बात घूम रही है। जिस विश्वविद्यालय से मैंने पढ़ाई की है वहीं से विनीत और मिहिर अपनी पीएचडी कर रहे हैं। अमितेश मेरा बैचमेट है। तीनों को जेआरएफ़ मिली। वे क्रमश मीडिया, सिनेमा और रंगमंच पर शोधरत हैं। इस तरह तीनों को विश्वविद्यालय में रुकने के पर्याप्त मौके मिले। जो कईयों को नहीं मिल पाते हैं। अब जो बात इस पूर्वपक्ष के बाद ब्लॉग के संदर्भ में कहने लायक है वह यह कि विनीत की ‘हुंकार’, मिहिर का ‘आवारा हूँ..’ और अमितेश के ‘रंगविमर्श’ को इस रूप में क्या माना जाये? यहाँ आना इनका स्वतंत्र निर्णय हो सकता है, पर क्या उस स्थिति में भी वे इसी तरह इन्ही विषयों पर लिख रहे होते? इसका कोई तयशुदा उत्तर नहीं हो सकता। हो सकता है वे लिखते पर इन विषयों पर इन संरचनाओं में नहीं।

हो सकता है वह आलोक की तरह अपना ब्लॉग बनाते। ‘लोकरंजन’। वह भी इसी विश्वविद्यालय से हिन्दी में पोस्टग्रेजुएट है। पर इतने व्यवस्थित ढंग से इन विषयों को नहीं चुनते। वह राकेश की तरह दो हज़ार छह के बाद पिछले साल ‘अ-कल्पना’ बनाते। जिसपर चाहकर भी वह वक़्त नहीं दे पाते। वह आशीष हो जाते। जो पैरा-टीचर होने पर अपनी छटपटाहटें बाँटता।‘इश्क़ मेरा..’ लिखता है। पर कहीं पक्की नौकरी न होने की टीस उसे कुछ भी लिखने से रोकती रहती। वह भी बस यही सोचते रहता है, वह क्यों नहीं राजनीति विज्ञान में किसी कॉलेज में ऍड-हॉक पढ़ा रहा। इस तरह यह तीनों अ-संस्थागत हैं। यह उन्हे मौके नहीं देना है।

यह भावुकता का मामला नहीं है। यह अवसर बनाम प्रतिभा बनाम लेखन का मामला है। बहस बहुत लंबी है इसलिए इसे यहीं छोड़ते हैं। फ़िर कभी इस पर लौटेंगे। पर पहले विनीत तुमसे कुछ कहना है। उस दिन जब अभय कुमार दुबे तुम्हें कह रह थे सरोकार और प्रतिबद्धता की बाइनरी से निकल मीडिया को देखना शुरू करो, तब लगा था, तुम कुछ करोगे। पर तुमने निराश किया। यह माध्यम जितनी तेज़ी से बदल रहा है उसी अनुपात में तुम अभी भी ‘फ्रैंकफ़र्ट स्कूल’ में पड़े हुए हो। नयी शब्दावली की तरफ़ तो जाओ दोस्त। ऐसा हम कब तक पढ़ते रहेंगे। उसे साहित्य से भी हटाओ। ‘गेस्टाल्ट’ में देखना शुरू करो। आशा है तुम कोशिश करोगे।

ख़ैर। वह जो अभी विषयों के वैविध्य की बात चल रही थी, वहाँ यही कह सकते हैं के अभी हम बहुत पीछे हैं। यह सिर्फ़ भाषा का मामला नहीं, यह इस माध्यम की भी दिक्कत है। विद्यालयी स्तर पर हिन्दी किन विषयों को ढो रही है। यह चयन का अवसर ही नहीं देती कि ‘स्थापत्य’ की पढ़ाई हिन्दी में कोई कर सके। ‘आयुर्विज्ञान’ एम्स के बाहर लगे बोर्ड में इतना अपरिचित लगता है तब जबकि वह मेडिकल की हिन्दी की किताबों में आने के बाद उसका क्या होगा? ऑटोमोबिल्स, ऍरोनॉटिक्स में तो कभी सोच भी नहीं सकते। हम हिन्दी मीडिया की पढ़ाई में ही अपनी स्वतंत्र पारिभाषिक शब्दावली नहीं गढ़ पाये हैं। इनपर हिन्दी में लिखने वाले कहाँ से मिलेंगे। थोड़ा बहुत इतिहास ‘सिंहावलोकन’ पर जान लेते थे वह भी महीनों से पता नहीं क्यों रुका हुआ है। ‘मल्हार’ अपने किस्म का ठिकाना है। फ़िर घुमक्कड़ी पर ठीक ठाक लिखने वाले दो ही लोग हैं देशज जगहों पर ‘नीरज’ और विदेशी हवाई यात्राओं के लिए ‘मनीष कुमार’। अभी पिछले साल इंडीब्लॉगर ने पचास श्रेणियों में सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगों को चुना है। उनसे गुजरते हुए लगता है अभी कितनी जगहें खाली पड़ी हैं। उन्हे भरना है।

हमें बस एक ही नयी चीज़ ने आकर्षित किया। पॉडकास्ट। उसके बाद हमारी सूई रुक गयी। आज जब वापस ‘आवाज़’ पर लौटता हूँ तब वह ‘फ्लैश प्लेयर’ सिर्फ़ ‘बफ़रिंग’ करते हैं, उनसे लौटकर कोई आवाज़ नहीं आती। सजीव सारथी के ‘रेडियो प्लेबैक इंडिया’, इरफ़ान की ‘टूटी हुई बिखरी हुई’, अनुराग शर्मा के ‘पॉडकास्ट’, प्रमोद सिंह के ‘अजदक’ के अलावे मनीष कुमार के यहाँ कभी कभी कुछ सुन लेते हैं। फ़ोटो ब्लॉग के लिए तस्वीर खींचने वाला कैमरा चाहिए। जो लगता है सिर्फ़ एफ़बी पर एल्बम बनाने के अतिरिक्त कोई और काम नहीं कर सकता। कुछ कार्टूनिस्ट के अपने अड्डे हैं। इसके बाहर जो कुछ भी है वह कविता है। और कुछ नहीं।

भाषा पर एक महत्वपूर्ण बात इनसबके बीच रहती गयी। वह यह कि कई ऐसे ब्लॉगर हैं जो एक से अधिक ब्लॉग लिखते हैं और उनके यहाँ दो तरह की भाषाएँ नज़र आती हैं। यहाँ दो उदाहरण हैं। एक सागर हैं। उनके दो ब्लॉग ‘सोचालय’ और ‘बैरंग’।  दूसरे अभि। इनके भी दो ब्लॉग। ‘एहसास प्यार का’ और ‘मेरी बातें’। दोनों जगह वह दोनों नियमित लिखते हैं। पर इस तरह उनकी भाषा एक से दूसरे ब्लॉग में आवाजाही नहीं करती। यह सचेत है या अवचेतन में कोई भाषिक मकेनेज़िम अपना काम कर रहा होता है कि विषय, भाव, समय के साथ कैसी भाषा बरतनी है वह स्वतः अपना काम करते रहते हैं। वे दोनों जगह दो अलग तरहों से लिख रहे होते हैं।

फ़िर आख़िरी में एक बात कहकर अपनी बात ख़त्म कर दूँगा कि हिन्दी अभी भी भाव और विचार पक्ष में विभाजित लगती है। यह बहुत विस्तृत खाँचें हैं। पर दिखता ऐसा ही है। पर यह भी यथास्थितिवादी नहीं है। वह ठीक है के उन ब्लॉगों के दीर्घजीवी रहने कि संभावना अपने प्रारम्भ से ही अधिक रहती है जो किसी के व्यक्तिगत प्रयासों से अधिक सामूहिक वैचारिक आग्रह लिए होते हैं। जैसे एक गलत उदाहरण यहाँ फ़िट करने की कोशिश में प्रभात रंजन का ‘जानकीपुल’, अशोक कुमार पाण्डेय का ‘कबाड़खाना’। या ‘अनुनाद’ या ‘सबद’ या ‘पढ़ते-पढ़ते’ या ऐसा ही कोई और। इनमे स्वयं व्यक्तिगत रूप से इनकी भागीदारी कम है। वे नियमित रूप से अपनी अभिव्यक्ति के साथ वहाँ उपस्थित नहीं होते। फ़िर इन्हे ‘वेब पोर्टल’ जैसी शब्दावली में भी गिना जा सकता है। पर दूसरी तरफ़ स्त्रियों की आवाज़ें हैं। कई इसे ‘वैचारिक भावुकता’ भी कह सकते हैं, जहाँ आराधना का ‘ब्लॉग’ है।‘लहरों’ वाली पूजा है। ‘मैं घुमन्तू’ की अनु चौधरी के अनुभव हैं। इनके बिना हम कुछ भी नहीं हैं। यह हमारे समाज का जीवित इतिहास हैं। जिस आईने में रोज़ ख़ुद को देखने से हम एक नए समाज का निर्माण कर सकते हैं। यह उसकी पहली भूमिकायेँ हैं।

पोस्ट चार पन्ने की हो गयी है। पर एक साथ ही लगाए दे रहा हूँ। इसे बीच में कहाँ तोड़ता समझ नहीं आया इसलिए। जो इसके पीछे जाना चाहते हैं, वह राकेश कुमार सिंह द्वारा दो हज़ार नौ की बैठक वाला शोध पत्र देख सकते हैं। फ़िलहाल ‘मसिजीवी’ की तरह इनका ‘हफ़्तावार’ भी बंद है। ऐसा ही कुछ हाल चन्दन पाण्डेय की ‘नयी बात’ का है। यह मूल्यपरक टिप्पणी नहीं वस्तुपरक टीका है। और जो सब रह गया है, वह नीचे बताते जाएँ तो अच्छा होगा..!!

13 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लाॅगिंग का जादू थम गया है। जो नियमित थे, वे भी रूक गए हैं। एक बड़ा तबका फेसबुक पर शिफ्ट हो गया है। क्या कहोगे। जल्दबाजी या ब्लाॅगिंग की पहुंच की कमज़ोरी। हमने देखा है ब्लाॅगिंग का जादू। कुछ लोग बदलते दौर के साथ बड़ी तेज़ी से सामंजस्य बना लेते हैं। फेसबुक थोड़ा मनोरंजन भी दे देता है लेकिन बहुतों के व्यक्तित्व का जादू वहां टूटा भी है। तुमने लेख बढि़या लिखा है, मैं भी लिखना चाहता हूं कई महीनों से। तुम तो बहुत बाद में आए हो, वो दौर मिस कर दिया जब इसी प्लेटफाॅर्म पर धमाचैकड़ी मचती थी। आज जो वहां हो रहा है, कभी यहां हुआ करता था। यहां प्रेम भी था और उसके साइड इफेक्ट भी। फिर भी यह पड़ाव बड़ा सुंदर और करिश्माई था। आप अच्छे लेखक के बारे में हैरान भी होते, सीखते भी और उसके व्यक्तित्व के मोहपाश में फंसते भी। सोचते भी। हर सुबह जब लाॅग इन करते तो एक उत्सुकता मन में होती। आज कई कई तक मित्रों के भी ई-मेल नहीं आते।
    वैसा मेरा ब्लाॅगिंग काल बहुत अच्छा रहा है। होगा कोई ऐसा भी जो सागर को न जाने, लिखता तो अच्छा प बदनाम बहुत है टाइप। मुझे यहां से कुछ बेहद शानदार दोस्त और इंसान मिले हैं। बड़े कीमती तोहफे भी मिले हैं और कई बार जब खुद को तुर्रमखान समझे तो आए हुए कमेंट ने यह इशारा किया कि - लिखने में उस्ताद सिर्फ तुम ही नहीं हो सागर, कहते हैं कि इसी वक्त में कई मीर भी हैं।
    हमलोगों की कहानी तो बहुत दिलचस्प है। खोज खोज कर महिलाओं के ब्लाॅग पर कमेंट करना, उनके लिखे को लेडी शेक्सपीयर, गुलज़ार एक्सटेंशन बताना और यूं ही मस्ती करते करते कुछ बेहद शानदार पढ़ना जो अच्छा लिखने को प्रेरित करता था। यहां बातें बहुत सी हैं जो गोल कर रहा हूं।
    लेकिन मुझसे पहले भी कई वरिष्ठ ब्लाॅगर थे जो तब मद्धम पड़ रहे थे और ब्लाॅगिंग छोड़ रहे थे। दरअसल जिंदगी की तरह लोग लिखने से भी उकता जाते हैं। हमें आऊटपुट देखने की आदत है। एक बात और भी है कई लोग बने हुए राइटर हैं, तो कोट खत्म हो जाता है एक दिन। कई लोग लिखते लिखते खाली भी हो जाते हैं। जब लगता है अब मेरे अंदर कुछ नया नहीं आ रहा। कुछ ऐसे भी हैं जो अब इसे अपनी टाइमपास और पहले नादान प्यार की तरह मूर्खता बताते हैं, अपने पुराने लिखे को पढ़कर झेंपते हैं।
    बहरहाल, तुमने एक बार फिर से बेहद अच्छे ब्लाॅगों की सूची लगाई है। कुछ ऐसी ही पैनी नज़र मेरी भी रहा करती थी, और आज भी थोड़ी बहुत रहती है।
    फिर भी रवीश कुमार का ब्लाॅग आज भी बहुत पढ़ा रहा है। कारण पुण्य प्रसून वाजपेयी की तरह सिर्फ राजनीतिक फोकस नहीं है, पोस्ट में विविधता है, मोहक नज़र, भाषाई रस और फेस वैल्यू है।
    तुमने अच्छा लिखा है, तारीफ पढ़ने की चाह में पूरा पढ़ गया।

    मैं चाहता हूं कि तुम रहो। कहो।

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    1. पढ़कर उदास हो आता हूँ शायद। पर अंदर से कैसा हूँ, पता नहीं। पता नहीं यह कैसा भाव है। शायद हम थोड़ा देर कर गए। देर से यहाँ पहुँचे, जब पहुँचे तो बड़े बड़े नाम यहाँ से जा रहे थे। वे कभी लौटे नहीं। लौटे तो उस रंगत के साथ नहीं। उनका मन अब यहाँ नहीं है..

      देख रहा हूँ तुम एक रिक्शे पर सुबह-सुबह जा रहे हो। प्रशांत बंगलोर से दिल्ली आए हैं। साथ पंकज भी हैं। किसी बैंक में हैं शायद। हमारे बहराइच के पड़ोस से। लखीमपुर खीरी से। सोचता कभी नानपरा रिसिया दुधवा के किस्से मिलेंगे। इंतेज़ार करते रहे। अभी भी कर रहे हैं। सच वह दोस्तियाँ हमारे हिस्से नहीं आयीं। हम कभी किसी से नहीं मिले।

      जब भी मिले यहीं किसी पर टिप्पणी से बचते रहे। अब तो स्थिति ऐसी है के हम ही लिख रहे हैं हम ही पढ़ रहे हैं। हम सोचते थे अपने जैसे मिलेंगे। देखें तो वो सब कैसे हमारे आस पास माजूद हैं। देखता हूँ रवि रतलामी अब अपने नाम के साथ ‘उपाध्याय’ लगाने लगे हैं। ‘अखाड़े का उदास मुगदर’ किताब की शक्ल में आ गया। प्रमोद सिंह ज़िद से यहाँ बने हुए हैं। उनकी सुखी होने की तकलीफ़ उसकी टीस बराबर अंदर तक महसूस होती है। अभी जब विनीत का लिंक लगाया तो पाया उसने अपना ब्लॉग बंद कर लिया है। संजय व्यास भी ऐसे ही गायब हैं।
      कल शाम आलोक से बात होने लगी तो वह भी कहने लगा अब यहाँ आने का मन नहीं होता। इसका तिलिस्म अब धीरे धीरे कम हो रहा है। इसे ‘क्रेज़’ भी कह सकते हैं जो नए मॉडल के हंडसेट आने के बाद पुराने से उचट जाता है। वह जो अलग दिखना था अब वैसा नहीं रह गया।

      बिलकुल, यह इस माध्यम के लिए ठहराव का समय है। पर हमारे सामने वह अतीत नहीं है जिसमें हम गायब थे। उस ‘नोसतेजिया’ में हमारी हिस्सेदारी नहीं है। वह जैसा भी था अब नहीं है। पर.. पता नहीं क्या आ रहा था, रह गया.. फ़िर कभी.. तुम इतना बढ़िया तो लिख रहे थे, कहते-कहते रुक क्यों गए? अपने हिस्से की बात तो तुम ही कह सकते हो कर सकते हो। इंतज़ार रहेगा जब तुम इस ब्लॉगगिंग पर लिखोगे। थोड़ा वक़्त निकालो। पता है कई बार ड्राफ्टिंग भी कर ली होगी। पर इस बार कह देना। रुकना नहीं। और जो तुम कह रहे हो हम लिखते रहे। तो दोस्त, मैं भी नहीं जानता कब तक लिख पाऊँगा। शायद जबतक मैं भी खाली नहीं हो जाता। अभी भरा हुआ हूँ, शायद तब तक हूँ। ख़ुद के लिए पाँच साल का वक़्त लेकर चले थे.. देखते हैं क्या होता है..

      ख़ैर बातें तो ख़ूब-ख़ूब हैं। पर ठंड में और लिखा नहीं जा रहा। इस खुली खिड़की से हवा लगातार आ रही है।..

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    2. एक गलती रह गयी है, जो आज अचानक दिख गयी। रवि रतलामी 'उपाध्याय' नहीं, 'श्रीवास्तव' हैं। और उनका पूरा नाम रविशंकर श्रीवास्तव है।

      बाकी तुमने अपने हिस्से की किश्त नहीं लिखी। उसका आज भी इंतज़ार है।

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन शहीद लांस नायक सुधाकर सिंह, हेमराज और ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. महोदय यहाँ तक तो ठीक है के आप ब्लॉग पोस्ट को अपने यहाँ सम्मिलित कर रहे हैं। पर थोड़ा ध्यान रखें तो बेहतर होगा कि जिस तरह के शीर्षकों से आप अपने ब्लॉग बुलिटिन को गढ़ते हैं, उन्हे थोड़ा वस्तुपरक बनाएँ, ऐसे मूल्यपरक नहीं।

      वह कभी कभी हम जैसे लोगों के वैचारिक आग्रहों पूर्वाग्रहों पर थोड़ी दिक़्क़त लाते हैं। मैं यहाँ देशभक्ति जैसे अमूर्त भाव पर कोई अभिभाषण की आशीष नंदी नुमा कोई भूमिका नहीं दे रहा पर हम इसपर थोड़ा असहज महसूस करते हैं।

      ख़ैर आपने लिंक लगाया इसके लिए आभार।

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  3. पॉडकास्ट करना बहुत अच्छा लगता है वाकई !
    बहुत सारे ब्लॉग पता भी नहीं थे ,इस पोस्ट से मिले साथ ही बाहुत सी जानकारी मिली ,आभार

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  4. आपकी इस ब्लॉग-प्रस्तुति को हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ कड़ियाँ (3 से 9 जनवरी, 2014) में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,,सादर …. आभार।।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

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  5. ब्लॉगिंग में ठहराव सा तो आया है, पहले डेशबोर्ड पर 200 ब्लॉग अपडेट दिखते थे तो अब मुस्किल से 10-15 दिखते हैं। फ़ेसबुक अधिक समय खा जाता है। चलभाषधारी वाटसअप पर व्यस्त दिखाई देते हैं। उम्मीद है देर सबेर ब्लॉगिंग के दिन फ़िर लौटेगें।

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    1. आप आशान्वित हैं, यह देखकर संतोष होता है, बस उसके आगे कुछ नहीं। जो पुराने थे, उनमें से अधिकांश यह ठसक है कि वह पुराने हैं। जिनमें नहीं है, वह अभी भी लिख रहे हैं। फ़िर अधिकतर इस मीडियम को अपनी सहूलियतों के चलते छोड़ चुके हैं।

      यह सोचना ही गलत अवधारणा से घिर जाना है कि हमने रास्ता बनाया। उनका योगदान सराहनीय है, पर इसी से घिरे रहना, उन्हे ऊँचा पेड़ खजूर ही बनाता, साबित करता है।

      उम्मीद मुझे भी है, पर नए आने वाले लोगों से। अगर आपको अपडेट दस पंद्रह ही दिख रहे हैं, तो हम सबको मिलकर नए ठिकानों की तलाश में तुरंत निकल पड़ना चाहिए।

      हटाएं

आवाज़ें..

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