जनवरी 09, 2014

दादी की याद

पता नहीं क्यों हुआ। होना नहीं चाहिए था। फिर भी। चन्दन पाण्डेय की कहानी ‘शुभकामना का शव’ पढ़कर दादी याद आ गयी। कहानी में कामना की कोई दादी क्यों नहीं है? शायद इसलिए। फ़िर तो बड़ी देर तक नीचे गलियारे में घूमते हुए उनकी बहुत याद आई। अगर उस लड़की की दादी होती तब भी क्या उसके साथ भी यही होता। हमारी दादी इतनी जल्दी क्यों चली गईं। रोने को नहीं हुआ फ़िर भी मन उदास था। कुछ खाली-खाली सा। उन बीते सालों में उनका न होना। दिमाग दिल की तरह धड़कने लगा। कहीं गुमसुम सा बैठा बच्चा अपनी दादी को जलते हुए देख रहा है। इसके बाद वह कभी नहीं दिखेंगी। वह ऐसे ही कभी पापा के सपनों में कभी किसी भाई की शादी में हवा बन के आती रहेंगी। इधर फ़िर ऐसे ही आने का वक़्त पास है..

कितनी ही यादों में सिर्फ़ उन्हे सुनते रहे हैं, अब उनमे बड़े होकर लौट जाने का मन करता है। मन करता है, उन्हे वापस बुला लाऊं। कहीं से भी। कैसे भी करके। वह मना करती रहें फ़िर भी। उनकी साँस फूल जाएगी, तो रुक जाएंगे। कहीं फ़रेन्द के पेड़ के नीचे बैठ जाएंगे। सुस्ता लेंगे। खाना खिलाते एक कौर और खा लेंगे। कऊवे को बिन भगाये नहा लेंगे। पर नहीं। वह कहीं नहीं मिलतीं। हर बार खाली हाथ लौटता हूँ..उनमें सिर्फ़ उन हाथों की छुअन होती है और धुँधला सा चेहरा। आवाज़ से वह भाई को थारु भी नहीं बुला पाती..

कल अपनी ज़िन्दगी में एक और साल जुड़ने वाला है और ख़ुद अंदर तक सिमटता, मैं, वहाँ ठंड में भी रात साढ़े ग्यारह के बाद भी बदस्तूर घूम रहा था। पता नहीं कैसी-कैसी यादें उनकी बाद की बातों के साथ चली आयीं। वहीं ठहर सा गया। सोचता रहा आज होतीं तो कैसी लगतीं। उनसे हम भी घंटों बात किया करते। उनकी अपनी कहानियाँ सुनते। पर नहीं वह वहाँ थीं ही नहीं..

हम लोग शायद दस-ग्यारह साल के रहे होंगे। यहीं दिल्ली में। उस रात देर से घर लौटे थे। शनिवार था। कमला चाचा के यहाँ से। दयानन्द विहार से। उन्होने नया टीवी खरीदा था, अकाई का। वही देखने गए थे। लौटते-लौटते हम सब काफी थक गए। खिचड़ी बनी, वही खा कर सो गए। रात के ढाई बजे के लगभग फ़ोन की घंटी बजी। उधर चाचा थे। पीसीओ तब बहराइच में ही थे। गाँव में नहीं। रात साइकिल चलाकर वहाँ आए। बड़ी मुश्किल से एक दुकान वाले को जगाकर फ़ोन मिला। आज सोचता हूँ कैसे नम्बर मिलाये होंगे। हाथ कैसे काँपते से रह गए होंगे। फ़िर कह दिया होगा उस पीसीओ वाले को ही.. कि भईया नम्बरवा मिलाय देओ..

दादी अब नहीं थीं। दिल का दौरा पड़ा था। दादी की तबीयत खराब है, यह हम सबको पता था। इसलिए फरवरी में ही सब उन्हे देख लौट थे। निश्चिंत नहीं थे, फ़िर भी इसकी कल्पना नहीं की थी। हम तो ख़ैर बहुत छोटे थे। इन सब बातों में तब के मतलब अब भर कर देखते हैं तो रोने को हो आते हैं। पर फ़िर भी बताते नहीं। ऐसे लिख लेते हैं। जैसे उन सब बारियों का अब लिख रहा हूँ। कैसे उन सब बातों को याद रखता गया यह भी नहीं पता। उन्हे कभी-कभी कुरेदने पर बहोत दर्द होता है.. जैसे..कुछ नहीं..वह कैसा इतवार था। उदास। रूआँसा। आँखों के पास काले घेरों की तरह। पापा सबसे जादा दुखी थे, मम्मी की तरह। पर दोनों बता नहीं रहे थे। हमे अपनी कोई खबर न थी। बस जो देख रहे थे उसमें हम भी कहीं खोये खोये से उन दिनों को बस सहेज रहे होंगे। अंदर ही अंदर झट से पहुँच जाने की सोचते होंगे, फ़िर रह जाते होंगे। पर क्या करें अभी दूर हैं। थोड़ा रोके रखते हैं..न चाहते हुए भी..

सोलह मार्च। यही तारीख़ थी। पापा उस दिन किसी पुराने कागज़ को पढ़ते हुए यही बोले थे। उन्होने बोल दिया था जब तक हम न पहुँचे तबतक अंतेष्टि नहीं करेंगे। माँ को ऐसे कैसे जाने देंगे। पापा मम्मी सबका बुरा हाल था। आईटीओ पर तब पापा की मौसी रहती थीं। उन्हे भी बताया। कहने लगीं, वह भी चलेंगी। अपनी बहिन को आखिरी बार देख लें। भले इनकी शक्ल आवाज़ सब हु-ब-हु हमारी दादी की तरह है, पर इन्हे कभी दादी की तरह नहीं मान पाये। बस अब कैसे भी करके जल्दी से जल्दी वहाँ पहुँच जाएँ।

पता नहीं पुरानी दिल्ली से कौन सी ट्रेन थी। टिकट किसी भी तरह कंफ़र्म नहीं हो सकता था। नहीं हुआ। जैसे ही भूसे की तरह भरी लदी ट्रेन दिखाई दी मन किया छोड़ दें। पर नहीं। उसी में अपने सारे दुखों के साथ हमें समा जाना था। कहीं किसी कोने को ढूँढ रोते रहना था। कोई पूछता फ़िर भी नहीं बता पाते। कानपुर पता नहीं जैसे-तैसे करते गिरते-पड़ते पहुँचे। वहाँ से लखनऊ की बस। रोडवेज़। इतना छोटा था, फ़िर भी उन छवियों को अभी तक अपने अंदर कैसे आजतक वैसे का वैसा ही छिपाये रखा है, समझ नहीं पाता। पापा की मौसी के साथ वहीं बोनट के पास सिमटा बैठा हुआ हूँ। बस की हैडलाइट सड़क को बड़ी तेज़ी से लाँघती भागे जा रही है। कहीं रुक नहीं रही है। सब ऊँघ रहे हैं। पर मेरी आँखें जाग रही हैं। उस शोर करते इंजन में भी अजीब तरह की खामोशी है। वह भी नहीं कह रहा है। कोई चाहकर भी बोल नहीं पा रहा। बोलने जाते तो रुलाई छूटती। पता नहीं पापा-मम्मी के तब के चहरे क्यों याद नहीं रह गए। क्यों हर बार यही बस याद आती रहती। यह भी याद नहीं कि लखनऊ से बहराइच अख़बार पहुँचाने वाले टाटा चार सौ सात से कब बात की। कब सब हम उसमें बैठ गए। जरवल रोड़ के बाद हम सब अचानक बहराइच में दिखते हैं। सुबह हो चुकी है। और पापा उस टैम्पो वाले से तक़रीर कर रहे हैं कि वहाँ तय करने के बावजूद, वह अब हमें गाँव तक छोड़ने की बात पर आनाकानी क्यों कर रहा है।

वह नहीं माना। हम दरगाह बस अड्डे से पहली बस में बैठे उसके चलने का इंतज़ार कर रहे हैं। सबके चहरे किन्ही अदृश्य दिशाओं में अपनी-अपनी यादों को बुन रहे हैं। उन्हे अब कभी न निपटाई जा सकने वाली यादों की तरह सहेजकर अपनी-अपनी जेबों रुमालों में भर ले रहे हैं। हम लगभग भागने की गति से गाँव में चले जा रहे हैं। ठंड का सूरज आ चुका है। हवा में आँखों की तरह नमी, अब कुछ कम हो गयी। वह सब दादी को ले जाने की तय्यारी लगभग कर ही चुके थे। वहीं किनारे बर्फ़ की सिल्लियाँ बोरे से ढकी धीरे-धीरे पिघलती रहीं। सब चुप नहीं हैं। रो रहे हैं। देखते जा रहे हैं। और चुप होते जा रहे हैं। बाबा पता नहीं वहीं पास बैठे क्या सोच रहे होंगे। हम छत से खड़े उस भीड़ में सबको देख रहे हैं। एक एक कर जैसे सब बुत में बदलते जा रहे हैं। हम भी बस होने वाले हैं। अभी हुए नहीं हैं..इसके बाद का लिखा नहीं जाता..नहीं लिख रहा..कभी रोने का मन होगा, तो फ़िर आऊँगा..सोचा था, अब जो दादी नहीं हैं, उनकी यादें लिखता। जो-जो सुनता आया था, वह कहता..पर नहीं..पता नहीं इस नौ जनवरी को क्या हो गया..

इन सारी बातों को आजतक कागज़ पर नहीं लिखा है। यहाँ भी नहीं लिखता अगर इस साल सीलू की शादी न होती। वह इसी दिन जन्मी थी। वह अट्ठारह पूरे होते-होते फूफा के घर से विदा होने जा रही है। पता नहीं क्यों अच्छा नहीं लग रहा। शायद जितना भी पता चला है, उसमे लड़का लड़का नहीं, अधेड़ है। पाँच बहनों में पहली शादी इस तरह होगी, हम कल्पना भी नहीं सकते। वह कह रहे हैं, ‘हम निपटाइत हय..!!’ छोटी-सी मासूम-सी लड़की तीन चार सालों में दो-तीन बच्चों को संभालते जब दिख जाएगी तब वह कैसी लगेगी? वह उनको संभालेगी या खुद ही चलना सीख रही होगी। एक गोद में दूसरा हाथ की कानी उंगली पकड़े.. पता नहीं..

{ आज सत्रह जनवरी, दैनिक हिंदुस्तान मेंकॉलम वही 'साइबर संसार ' }  

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