फ़रवरी 03, 2014

अभी भी सपनों के पीछे..

इन सालों में इतना ख़राब कभी नहीं लिखा। लिखना ताकत देता है। यह बिखरने से बचाता है। टूटने से लगातार ख़राब दिनों रातों से निकालता रहा है। ऐसे तोड़ता नहीं है। पर न मालुम उस रात क्या हो गया। जिसे जैसे कहना था, उसके पीछे चिपका श्लेष, अपने अर्थों में उन ध्वनियों को ले गया, जो कभी सोचने को नहीं होता। मन ऐसा ही है शायद। शायद बिलकुल बिखरा हुआ। टूटा सा। बे-सबर। कहीं इंतज़ार करते-करते थक सा गया। इन बीतते क्षणों में कहीं न स्थित होता, बेतरतीब भागता रहा है। यह बिखरी हुई भूमिका उस कुबूलनामे का हलफ़नामा नहीं है। बस ऐसे ही लगा कि उसके बाद बहुत सारे सवाल सामने दिख पड़े हैं, जिनके जवाब मुझे देने हैं। उन्हे दिये बिना काम नहीं चलेगा।

तो कोशिश करता हूँ एक-एक कर तरतीब से सब कहता चलूँ..

हमारे सर इसे ज़िंदगी का 'लिट्मस टेस्ट' कहते हैं। यह संक्रामण काल है, जहाँ हमारी जाँच चल रही है। हम कैसे इन सारी विपरीत परिस्थितियों में ख़ुद को साबित करते हैं, यही सवाल सबसे जादा महत्वपूर्ण है। ज़रुरी है इन सबमें से ख़ुद को बचाकर रख लेना। चाहे जैसे भी हो, हमें यह करना होगा। पर शायद लिखते वक़्त हम इतने वैचारिक आग्रहों को कुछ देर के लिए स्थगित कर देते हैं। दिल थोड़ा साँस लेने लगता है। मन थोड़ा उदास-सा कहीं किसी टूटी कुर्सी के पास खड़ा, इंतज़ार में पैर दुखाता, वहीं बने रहना चाहता है। बने रहना इतना आसान नहीं। पर कोशिश है सूरत बदलेगी। कभी-न-कभी कुत्ते की तरह उसका दिन भी आएगा।

कामयाबी इस समाज में सापेक्ष है। हम ख़ुद के लिए नहीं, दूसरों के लिए सफ़ल होना चाहते हैं। इसकी परिभाषा हमने नहीं उन्होने गढ़ी है, जो हमसे बाहर हैं। ऐसा भी नहीं है के नौकरी का सपना हमने देर से देखना शुरू किया। पर यह ज़रूर है कि हमारी बढ़ती उम्र ने इसे हमारे झुके कंधों का बोझ कुछ और बढ़ा दिया। यह कुल मिलकर ऐसा दबाव है जिससे हम बच नहीं सकते। बचने वाले किस और मिट्टी के बने होंगे। हम इसके इर्दगिर्द बनते बिगड़ते दबावों, उलझनों, हताशा के जोड़ से अपने आप को बचा नहीं पाये।

लिखना इस रूप में अकर्मक क्रिया है जो किसी भी तरह से जीविकोपार्जन का कोई भी मौका बनाती नहीं दिख रही। इस सिलसिले में अपनी तरफ़ से कोशिश कितनी हुई, यह अलग से पूछे जाने लायक सवाल है। या हम इसे इस मद से अलग क्रिया मानते रहे और पूरे विश्वास के साथ खड़े रहे कि इस लिखने को हम पैसों में तब्दील नहीं कर सकते। कम से कम उन पैसों में जिनसे हम इन चारदिवारियों को लाँघ सकें। ऐसा नहीं है कि सपने देखना बंदकर, आँख मूँदे नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के कमला मार्केट की तरफ़ खुलते पुल पर कोई सस्ता सा नशा कर पेशाब में लथपथ पड़े हुए थे। नहीं। हमारे हिस्से इस तरह की अकर्मण्यता नहीं थी। हम दिमागी रुप से अक्षम बना दिये गए दिमाग थे। किसी लायक नहीं। बस जोड़-गाँठ कर कुछ-कुछ लिखने लायक हो गए थे। जिन्हे पूछना तो दूर, कोई जानता भी नहीं है। यह जानना अपनों की भीड़ में पहचाने जाने लायक बनने का है। जो हम किसी भी हाल में नहीं हैं।

पिछली पोस्ट इन्ही सबको मिलाकर ख़ुद को उस तरफ़ ले गयी, जहाँ इन सारी उलझनों के लिए एक ही तरीका बचता है। यह इस तरह हारे हुए लोगों का फैसला है। हम कभी हारेंगे नहीं। यह पिछले वाक्य वाला भाव  उन पंक्तियों से सिरे से गायब था। हम अभी हार भी रहे हैं तो क्या? हमने ख़ुद को इस तरह तो गढ़ा ही है कि कभी यहाँ से पलायन नहीं करेंगे। बस थोड़ा सा उखड़ सा गया था के यहाँ होना किसी अश्लील प्रहसन की तरह है। जहाँ हम जैसी उम्र वाले कितने साल पहले आर्थिक स्थायित्व की तरफ़ हो लिए और दूसरी तरफ़ हम अभी भी त्रिशंकु बने बीच में झूल रहे हैं। हम किसी ऐसे समाज में क्यों नहीं रह रहे जहाँ इस तरह सब नौकरी वाले हो जाने की बाध्यता से मुक्त होकर भी जिंदा रह रहे हैं। यहाँ की सारी व्यवस्थाएं मूलतः इस अर्थ में प्रतिगामी ही हैं जो व्यक्तिगत निर्णयों के लिए अब तक जगह नहीं बना सकी हैं। हम नौकरी नहीं कर रहे हैं, तो किसी तरह के दबाव से क्यों दबे जा रहे हैं..

अब इस तरह अगर मैं कहता हूँ के ब्लॉग पर लिखने की आवृति थोड़ी कम होती जाएगी तबइस दबाव को ही स्वीकृति देता चलता हूँ। पर यह कहीं से भी यह नहीं कहती कि अब लिखना छोड़ रहा हूँ। अभी भी इसके बजाए कागज़ पर ख़ुद को जादा आज़ाद महसूस करता हूँ। इसकी सीमाओं में लगातार इस 'स्पेस' को तोड़ा है। इसने ख़ुद को बुना है। पर उस हद तक ले जाने की हिम्मत कभी-कभी कम पड़ जाती है। सच कहूँ तो इस चल रहे साल में काम कुछ अलग तरह से करने का मन है। थोड़ा व्यवस्थित होकर। फ़िर बहुत से सपने हैं जिनके सच होने का साल है। उसमें कुछ ऐसे भी हैं जहाँ थोड़ा वक़्त कम पड़ जाएगा, तो कभी मन नहीं होगा। पर उसके लिए अभी यह जगह ठीक नहीं। डायरी में तो वह जमाने से है। यहाँ वक़्त आने पर..जब इंतज़ार खत्म हो जाएगा तब..

फ़िर कह तो रहा ही हूँ न..कि न सपने देखना छोड़ा है, न लिखना। मेरे यहाँ दोनों एक दूसरे के पर्याय की तरह आते हैं, बार-बार। बस पिछली पोस्ट की गड़बड़ यह है कि कई मर्तबा ऐसी बातें सिर्फ़ कागज़ में ही दबी रह जाती हैं, उन्हे चाहकह कर भी कह नहीं कहते। पर, वहाँ तब भी कहा था, यह दूसरों से पहले, मेरे लिए है। अभी भी ऐसा है। और जो रह गया है, उसे फ़िर कभी..

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