फ़रवरी 16, 2014

अध्यापक की नई परिभाषा

{इसे यहाँ पोस्ट करने का मन नहीं था, फ़िर भी किए देता हूँ। इसके बाद यह कोई न पूछे, नीचे जो लिखा है; वह सच है या झूठ। कई चीज़ें सिर्फ़ यही नहीं होती। उससे आगे जाती हैं। बस कल सुबह एक क्लास में बैठा यही सब कागज़ पर उतरा। }

अगर हम थोड़ा जोख़िम या साहस लेकर, ख़ुद को 'अध्यापक' मानने की गलती करें, तब वर्तमान स्थिति कैसी बनती है? यह पद आज अपने अंदर किन मूल्यों को समाहित किए हुए है? यह किन अर्थों को हमारे द्वारा हमारे विद्यार्थियों की ओर ले जाता है? इस दुतरफ़ी प्रक्रिया में यह किस प्रकार आकार लेता है? समाज हमें इस पेशे के कारण कैसे पहचानता है? इस कमरे में बैठे-बैठे ऐसे तमाम सवाल दिमाग में चल रहे हैं जो अचानक किसी विस्फोट के बाद उत्पन्न नहीं हुए हैं। इन का होना इस समूची प्रक्रिया का क्रमिक विकास है। यह विद्यालय की चारदीवारी के भीतर अलग अलग समरूपी छात्रों के बीच हमारी बनती बिगड़ती छवि को लगातार बनाते बिगाड़ते हैं।

दस बजकर कुछ मिनट हुए हैं। पिछली घंटी में बारहवीं के एक लड़के ने एक वरिष्ठ अध्यापक को अपशब्द कहे। गालियाँ दी। सारे अध्यापक उस छात्र को स्वतः आरोपी मानकर उसे दंडित करने की माँग कर रहे हैं। कुछ मुखर होकर, कुछ दबे स्वर में। पर ध्यान से देखे बिना भी कोई इस स्थापना पर पहुँच सकता है कि उसके ऐसा कहने में कुछ भी 'असामाजिक' नहीं है। उसने इन सालों में, यहाँ तक पहुँचने में जो कुछ भी सीखा, जो कुछ उसे अपने परिवेश से मिला, वह उसी का प्रदर्शन हमारे सामने कर रहा है। अभी जिस कक्षा में बैठा हूँ, यहाँ छात्र इतनी स्वतन्त्रता महसूस करते आ रहे हैं कि बाहर जाने और अंदर आने से पहले कोई नहीं पूछता। वे बिना किसी समस्या क बे-रोकटोक आ रहे हैं, जा रहे हैं। गालियाँ उनकी बातों में किसी स्वाभाविक अभिव्यक्ति की तरह आती है। अगर उनकी बातों में यह न हों तब उनका वजन शायद कुछ कम हो जाये जैसे। यह लोकतान्त्रिक कक्षा का कौन सा 'मॉडल' है समझ नहीं आता। क्या वे इस मूल्य तक कभी पहुँच भी पाएंगे। यह स्वानुसाशन क्या होता है, जान पाएंगे? पता नहीं। 

फ़िर ऐसी स्थिति में हम यहाँ क्या कर रहे हैं? हमारे होने न होने का कोई मतलब नहीं है। यहाँ किस तरह से हस्तक्षेप किया जाए, इसका भी कोई बना बनाया ढर्रा नहीं है। जितना कह सकते हैं, उससे कोई फ़रक नहीं पड़ने वाला। थोड़ा बहुत लिहाज़ कर भी लिया तो सामने पड़ने पर कुछ नहीं कहेंगे, पर यह अपशब्द उनकी भाषा से गायब हो जाएँ, ऐसा नहीं हो सकता। यह किसी को छेड़ने का मौका है। तंज़ कसने का तरीका। इसकी पुरुष सत्तात्मक व्याख्याएँ फ़िलहाल स्थगित कर आगे बढ़ते हैं। उनके बारे में तो यहाँ वहाँ बहुत कहा जा चुका है। जो नहीं कहा है, वही कह रहा हूँ। वे मौके बे-मौके कुछ-कुछ कहते रहेंगे। उन्हे कभी फ़रक पड़ेगा? पता नहीं।

यहाँ दिक्कत यह है कि वह घटना जो ऊपर अध्यापक के साथ घटित हुई उसमें हम सब मिलकर छात्र के व्यवहार में कोई गुणात्मक परिवर्तन क्यों नहीं ला पाये? यह असल में 'एजेंसी' के रूप में हमारी विफलता है। लेकिन इसे नैतिक शिक्षा जैसे दक्षिणपंथी पूर्वाग्रह की तरह समझने में यही दिक्कत है, जिससे हमें बचना होगा। हम मिलकर अगर उनके सलीकों को नहीं बदल पा रहे, तब क्या किया जा सकता है? समानुपात  में हम उन्हे बात बात में टोकें उनपर कड़ी नज़र रखने के लिए आगे पीछे घुमंतू दस्तों को निर्माण करें या कुल मिलाकर विद्यालय का वातावरण ही एशिया बनाएँ कि उन्हे बाहर और अंदर के परिवेश में अंतर ख़ुद ब ख़ुद जान पड़ें। यह स्वाभाविक प्रक्रिया की तरह होना चाहिए। न कि बाहर से थोपे गए दिशा निर्देशों की तरह।

पर तब यहाँ हमारी भूमिका निर्णायक होगी। हमें सबसे पहले अपने व्यवहार में, चिंतन में, भाषा में, वह सब घटाना होगा जिसके कारण हम इस माहौल में बने रहे हैं। इसे ऐसा बनाए हुए हैं। हमें कक्षाओं के छात्रों को अध्यापकीय क्रियाकलापों से तत्काल प्रभाव से अलगाना होगा। उन्हे किसी भी तरह से उन तमाम गिनती वाली जिल्दों को भरने के लिए न दिया जाये। न किसी भी प्रकार से उनकी सहायता ली जाये, जिनमें वे अध्यापक के बाद कक्षा में स्वतः द्वितीय पंक्ति के दंडाधिकारी बन बैठते हैं। उनकी भूमिका को न्यूनतम स्तर पर लाना होगा। सहायक की तरह संचालक की तरह नहीं। अध्यापकों को  उन कक्षाओं में जाने के बाद ख़ुद को बच्चों के मोबाइल लेकर उनमें 'ब्लू फ़िल्मों' को देखने से ख़ुद को रोकना होगा। उन स्टाफ़रूमों में होती स्तरहीन अश्लील बातों को अपदस्थ करना होगा। किसी के पिता की दुकान से डिस्काउंट की इच्छा को खत्म करना होगा। उन्हे आधी छुट्टी या ऐसे ही किसी मौके पर सदर बाज़ार भेजकर अपने घर का समान लाने के लिए भेजने से रोक्न होगा। उन बच्चों के साथ वजीफे के पैसे लेने आई माँओं के शारीरिक सौष्ठव पर ध्यान केन्द्रित न कर बछों के अध्ययन से संबन्धित समस्याओं पर बात करनी चाहिए। छुट्टी के बाद ऊपर वाले कमरों में कुछ लड़कों को रोकने की बन गयी आदत से ख़ुद को मुक्त करना होगा। 

भले आज उस लड़के के अध्यापक को गाली देने फ़िर पुलिस बुलाने की घटना से इसका कोई सीधा संबंध न हो पर अगर ऐसा न होता तो कल स्कूल टाइम में क्लासों से पंखें गायब न होते और न प्रधानाचार्य महोदय पहले पुलिस थाने रिपोर्ट दर्ज़ कराने के बाद पहाड़गंज की दुकानों पर उन चोरी हुए पंखों की निशानदेही कर रहे होते। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. एक अच्छा शिक्षक ही सभ्य समाज की नीव रख सकता है। मगर वर्तमान हालातों को देखते हुये तो आज की तारीक में कई सारे परिवर्तनों के बाद ही यह संभव होगा। जिसकी शुरुआत हमें दूसरों से पहले खुद से ही करनी होगी। क्यूंकि बच्चे वही सीखते हैं जो देखते है। सारगर्भित आलेख...

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    1. हर शुरुवात शायद खुद से ही होती है। पर इस शिक्षा वाले बिन्दु पर आकर थोड़ा रुक जाने का मन करता है। व्यवस्था इस पूरे तंत्र को इस तरह से गढ़ रही है के यह आँकड़ों में तब्दील होते गए हैं। समाज निरपेक्ष होते जाने से यह सारी समस्याएँ जन्म ले रही हैं। समस्याएँ हैं तो इनके उपाय भी होंगे, उन्हे खोजने के ढोंग के बजाय उनकी तरफ़ हमें चलना भी होगा।

      ख़ैर बातें तो बातें हैं.. बस यही कह सकते हैं इस नीव मेन दीमक लग गयी है।

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