फ़रवरी 04, 2014

तुम मेरे पास ही हो..

सच में कल रात की पोस्ट एक फ़िलर है। वहाँ जो कुछ भी लिखा है, वह पता नहीं क्या है? मन बस ऐसे ही बैठे रहने को था। तुम्हारा इंतेज़ार कर रहा था। तुम्हें बिन बताए। अचानक तुम्हारे पास पहुँच गया। वो दस बजकर पाँच मिनट वाली मिस कॉल के बाद तो जैसे नींद आई ही नहीं। उठकर नीचे आ गया। लगा अभी जब सब खाना खा लेंगे, तब इत्मीनान से फ़ोन आएगा। कहीं इस बीच सो न जाऊँ, इसलिए कुछ-कुछ सोचने लगा। इस पूरे दिन पर.. बड़े अजीब ढब से यह गुज़र रहा था। पास ही से होकर गुज़रा, पर पहचान में नहीं आया। यह कल सुबह की बात नहीं, पिछले दो-तीन दिनों का हासिल था। के खाली- खाली सा लगता रहा। पास न होने का एहसास, दिल में सूई की तरह चुभने लगा। लगा दिल धड़क नहीं रहा, साँस ले रहा है। बड़ी आहिस्ते से आवाज़ करता कि कहीं जग न जाऊँ। जगकर तुम्हें ढूँढता, तब क्या होता?

आज सुबह भी बड़े अनमने ढंग से उठा। मन नहीं था जाने का। सोचता रहा, यहीं रुक जाता हूँ। पर तब वक़्त और भारी पड़ता। बिलकुल अकेले उन भावों से जीत नहीं पाता। जेब में आईना होता, तो देखता, चेहरे पर यह भाव किस तरह दिख रहे हैं। अभी जब लिखने बैठा हूँ, कल ही दिमाग पर छाया हुआ है। शाम बड़े इत्मीनान से डायरी में लिख रहा था। हमें इन दूरियों में कैसे नहीं होते जाना। जो-जो नहीं करने की हिदायतें वहाँ ख़ुद को देता जा रहा था, रात उनसे ही दूर छिटक गया। ख़ुद को कमज़ोर न करने वाली बात हवा हो गयी। तुम्हारी आवाज़ सुन बे-तरह बनता गया। लिखा था, क्योंकि हम दूर हैं इसलिए इन भावों से नहीं भरेंगे। वरना दूसरा भी उन्ही तरहों से ख़ुद को सालता रहेगा। कहना ज़रूरी नहीं। कुछ क्षण की चुप्पी, दोनों तरफ़ से आर-पार हो जाने के लिए काफ़ी है। दिल नासाज़ है। तार टूटने लगता है। झंकार नहीं बजती। न गले से, न हलक से नीचे उतरकर पेट की तरफ़ जाती डकार, हिचकी में बदलती जाती है। यह हमेशा पास ही रही है। जीभ के पास। थूक से सनती नहीं, प्यार से वहीं लिपटी धरी रहती है।

पता है, असल में होता क्या है? जिन क्षणों में, इधर, मैं जैसे भी भावों से गुज़र रहा होता हूँ, उन्हे वैसे ही उन्ही क्षणों में तुम तक पहुँचा दूँ। और ऐसा करने के बाद, तुम भी उन्ही एहसासों से भरकर, मेरे करीब आ जाओ। ऐसा करते जाना इधर जादा होता जा रहा है। पता नहीं क्यों? यह यही करता है। दोनों को एक ही वक़्त एक सा महसूस कराते जाना। इसमे जितनी सघनता होगी, यह उसी अनुपात में दूसरे को प्रभावित करेगा। दूसरे को अपनी जद में लेती जाएगी। पर ज़रूरी नहीं कि वह दूसरा भी उसी क्षण बता दे। क्योंकि दोनों का एकसाथ ऐसे होते जान उन्हे बारी-बारी नहीं तोड़ेगा। एक साथ तोड़ेगा। हम थोड़ी देर चुप रहकर इसे छिपाना भी चाहें, तब भी नहीं छिपा पाते। यही चुप्पी बताती जाती है, अंदर क्या उमड़-घुमड़ रहा है। जिसे जानबूझकर छिपा रहे थे, वह अब वैसा नहीं है। इसके सामने आने पर दोनों आहिस्ते से समझाते हैं। थोड़ी देर मन में ही संभल जाते हैं। ताकि इस तरह न होते रहें। बचे रहें।

कभी-कभी लगता है ख़ुद तो परेशान होता ही हूँ, तुम्हें भी परेशान कर देता हूँ। कल पूरा दिन ऐसे बितता रहा के तुम तक पहुँच जाऊँ। पर नहीं। सोच रहा हूँ, कल रात वह मैसेज क्यों किया? फ़िर बारह बजे वाली दो मिस कॉल। परेशान हूँ। पर, इस वक़्त तुम्हें इस तरह नहीं होने देना था। पता नहीं, बिन बताए तुम कैसी होती गयी होगी। तुम शायद मुझसे जादा समझदार हो। बताती नहीं हो। बताती नहीं हो, इन दिनों इन रातों कैसे-कैसे बिन सोये रात ख़यालों में खोयी-खोयी सी रहती हो। बस चुपके से कहीं छिप जाती होगी। कि कहीं पलकों में रह गयी बूंदों को कोई न देख ले। तुम बार-बार ऐसी छोटी-छोटी बातों में फँस जाने की आदत पर कहती हो। पता है बार-बार ऐसे करने से हम कमज़ोर होते जाएँगे। एक दूसरे को संभालने के लिए भौतिक रूप से हम उपस्थित नहीं हैं। इसलिए भी यह कितनी देर किस रूप में रहेगा, कहा नहीं जा सकता। यह अवसाद नहीं है। परेशानी है। आकुलता है। बेकरारी है। बेसबरी है।

पर हरबार ऐसा ही होता जाता हूँ। तब आहिस्ते से दिल में कहता हूँ, अभी तुम पास नहीं हो न इसलिए। जब साथ तुम रहोगी, तब कहीं ऐसे नहीं अरझूँगा। तब तुम कहीं अटकने ही नहीं दोगी। तब हम सपनों की तरह सच में साथ होंगे।

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