फ़रवरी 04, 2014

संजय व्यास की किताब: टिम टिम रास्तों के अक्स

फ़ेसबुक पर चैट करते वक़्त संजय व्यास की किताब ‘टिम टिम रास्तों के अक्स’ ऑर्डर की थी। यह मेरी पहली ऑनलाइन खरीदी किताब है। फ़्री होम डिलिवरी थी। आज सुबह मिली। सुबह ही बैठ गया। तब से लेकर अभी दस बजे रात तक कुछ-कुछ हिस्से पढ़ पाया हूँ, उन्ही पर यह फौरी नोट्स। पता नहीं कुछ काम के हैं भी या नहीं..यहाँ इसे ‘आइडिया’ की तरह लिया है। और कुछ सूत्र हैं, कुछ धागे हैं जिन्हे पकड़ने की कोशिश की है। तो शुरू करते हैं;

• किताब का मुखपृष्ठ ‘कैची’, माने चाक्षुष है। आँखों में ठहर जाने वाला। दो पुराने जमाने वाले स्विच बोर्ड। ‘नॉस्टेलजिया’ की तरह पीछे खींचते। कहीं अतीत की तरफ़ ले जाते।

• विषय अलग हैं, उनमे विविधता है। पर साथ ही एकसूत्रता भी है, जो उन्हे बाँधे हुए हैं। यह एकसूत्रता भावों, भाषा, और उसके शिल्प को लेकर है।एक सिरे से लेकर आखिरी सिरे तक।

• ‘विचार’ अनुपस्थित हैं। विचारधारात्मक आग्रह सतह पर नज़र नहीं आते। मतलब ‘ट्रेस’ करने लायक कोई सूत्र नहीं है; मतलब इसे किसी काल विशेष में ‘लोकेट’ करने लायक ‘मकैनिज़म’ नहीं है। फिर भी उनका काल है। विचार है।

• रेलगाड़ी में भरी गंध से अच्छा रात के ढाबे वाला संस्मरण/ शब्दचित्र है। रेलगाड़ी बेस्वाद लगती है। ढाबे का स्वाद इतनी तरह से अलग होकर हमारे अंदर घुलने लगता है। लगता है, हम भी वहीं-कहीं बैठे देख रहे हैं।

• यह जितने अनगढ़ है, अधूरे हैं, उसी अनुपात में ताज़गी भरे हैं। उनका कोई खाँचा नहीं है। उनकी कोई सीमा नहीं है। वह जितने खुले हैं, उतने ही पास लगते हैं। जेब में रखे बेतरह खुले सिक्कों की तरह उनकी आवाज़ अंदर उतरने लगती है।

• यादें इसकी ‘यूएसपी’ (USP) हैं। उनमें अतृप्त इच्छायेँ (प्रेम), जो बीतकर भी नहीं बिता है, उसका आग्रह (सात रुपये वाली कमीज) बनाए रखता है। कहीं दिल की कसक अंदर रिसने तक मीठे-मीठे दर्द की तरह बनी रही है।

• बचपन, सफ़र, रेल, बस, शहर, कस्बे, गृहस्थी, प्रेम, यौवन, बेतरह सबकी ज़िंदगियों में थोड़े-थोड़े घुलते मिलते रहे हैं।

• खो जाने का एहसास, कहीं न पहुँचने का डर, यहाँ काम करता चलता है। पाठक कहीं से भी शुरू करे, वह कहीं गुम नहीं होगा, इधर-उधर से लौट आएगा। वह कहीं ठहर भी जाएगा, तो वापस देख पाएगा अपना अक्स।

• फ़ेसबुक पर इस तरह के लिखी गयी ज़िन्दगी को सब कहानियाँ कहते पाये जा रहे हैं, पर अपने को यह ‘सूट’ नहीं किया। यह सब सपने हैं, जिनके घटित होते वक़्त हम नहीं थे, पर अब हैं। वहीं पास से सब देख रहे हैं। महसूस कर रहे हैं।

• सपने ही नहीं इन ‘ड्राफ्ट्स’ का आकार में छोटा होना भी इनकी पठनीयता को बचाए रखता है।

• पढ़ते वक़्त लगा यह इसकी एक और USP है; कि कहीं से भी शुरू करके इसे खत्म किया जा सकता है। शुरू से लेकर आखिरी तक चिपके नहीं रहना पड़ता। कहीं से उठ जाने पर, कहीं भी बंद कर सकते हैं।

अभी के लिए आखिरी में यही लिख रहा हूँ कि हम किताब में वही ढूंढते हैं, जो हममे गायब रहता है। या जिसकी हमें सबसे जादा ज़रूरत रहती है। जैसे मेरे ख़ुद के लिए पुराने दिन, शहर, सपने, कमरे, प्यार, अतीत में रुका रह गया कोई खटका।

यह सब बिन्दु किसी विशेष पदानुक्रम को प्रकट नहीं करते हैं। इसकी और भी व्याख्याएँ हो सकती हैं, पर अभी के लिए मेरा 'पाठ' यही है। पता नहीं इसे और किस तरह से पकड़ा जा सकता था। हमारे हाथ तो इसी तरह लगी।

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