मार्च 05, 2014

क्या मैंने सच में लिखना छोड़ दिया है

इस शीर्षक को सवाल की तरह ही देख रहा हूँ। इसमें कोई जवाब नहीं छिपा है। फ़िर भी, इसे घूरे जा रहा हूँ। मार्च का पाँचवा दिन सुबह के यही कोई साढ़े नौ बज रहे हैं। कितने दिन हो गए यहाँ आए? अभी गिने नहीं हैं। उन्हे गिनने के लिए उँगलियाँ कम नहीं पड़ेंगी। पर क्या करूँ, नहीं देखना चाहता कितनी देर बाद लौटा हूँ। बस थोड़ी तबीयत नहीं होती, कभी मन नहीं करता, कभी वक़्त नहीं मिलता। इधर इन बीते दिनों में कुछ खास कर भी नहीं रहा था के यहाँ नहीं घूम सकता था। पर अभी तो कहा न.. मन थोड़ा भाग रहा है।

अभी लखनऊ से लौटा तो डायरी पलट कर देखी। आखिरी एंट्री बीस फरवरी। दस बारह दिन से कुछ नहीं लिखा। क्या इतनी भी फुर्सत नहीं रहती अब के दो चार लाइन भी लिख लिया करूँ। सिर्फ़ पेन उठाकर कागज़ पर लिखना ही तो है। कितनी घिसी पिटी लाइन है। कितनी बार दोहराता रहूँगा। ख़ैर छोड़ो.. पर लगता है, बात सिर्फ़ इतनी नहीं है। कुछ और है। क्या है? पता नहीं। अब तो ऐसी हालत हो गयी है के कई कई दिनों तक अंदर से भरा हुआ भी नहीं लगता। शायद खाली हो रहा हूँ। कुछ नयी चीज़ों के आने से पहले ख़ुद को तय्यार कर रहा हूँ जैसे।

यह अचानक नहीं है के अब लिखने वाली बाते अंदर ही अंदर उन तरहों से बेचैन नहीं करती। इस बेचैनी के कम होने और आने वाले दिनों में इसके गायब होते जाने का मतलब क्या यह भी है कि भीतर कहीं रचनात्मक ऊर्जा का विघटन किन्ही और दिशाओं में हो रहा है? या अब उन मानसिक उद्वेलनों से बाहर निकल कर आने से यह अभिव्यक्ति को और सशक्त करेगी? पता नहीं मुझे क्या हो गया है? इतनी क्लिष्ट भाषिक संरचना में पालीवाल सर होता जा रहा हूँ। कि अभी घंटे भर बाद भारतीय काव्यशास्त्र की एमए की क्लास लेनी है और उसी के बोझिल से नोट्स बना रहा हूँ। मुक्तिबोध भी तो नहीं हुआ जा रहा मुझसे। कि रचना के तीसरे क्षण के बाद कोई चौथा बिन्दु ढूँढ लाऊँ, और मेरी भी डायरी कहीं से छप जाये। नहीं भी छपे पर कहीं वह हो तो।

ऐसा नहीं है कि ख़ुद में अप्रासांगिक होता जा रहा हूँ। ऐसी बात नहीं है। सब अपने लिए कोई न कोई ऐसी बात ढूँढ ही लेते हैं, जिससे उनका मन मान जाए के उनके होने से इस लिखने पढ़ने वाली दुनिया में कुछ उनके हिस्से का भी है। मेरे पास अभी तो ख़ैर ऐसा कुछ भी नहीं है पर तलाश जारी है। जल्द ही वहाँ तक पहुँच कर एक धांसू-सी पोस्ट लिखकर सबको बता दूंगा।

यह सवाल बार-बार अपने रूप मुद्राएं बदल कर सामने आ ही जाता है। कि इस लिखने को किस तरह लिया जाये। इस साल की शुरुवात हुई भी इसी तरह। लिखने के मामले में इसे कुछ अच्छी बात नहीं कह सकते। फ़िर सवाल यह भी तो है के लिखने वाले इतना सोचने लगें तब तो हो गया। यही मेरे साथ भी हो रहा है। जबसे लिखना शुरू किया था तब इसपर किसी भी तरह से सवाल उठाने की सोच भी नहीं सकता था। अगर तब इतना सोचा होता, तब लिखना कभी शुरू ही नहीं कर पाता। शायद सबके साथ ऐसा होता होगा। कभी-न-कभी। वह सब भी इस स्थिति से जूझते होंगे। उन्हे उनके कौन से तरीकों युक्तियों ने बचाया होगा कहीं कोई हवाला पढ़ने को नहीं मिला। अभी पीछे कहीं असगर वज़ाहत अपनी किसी कहानी की रचना प्रक्रिया को समझा रहे थे, पर वह थोड़ा अलग संदर्भ है। कहते हैं ऑस्कर वाइल्ड में इस पर कुछ लिखा है। लेकिन अभी तक वहाँ पहुँच नहीं सका हूँ। फ़िर यह भी तो नहीं पता कि क्या इन सबसे एक साथ गुज़रते हुए जो अनुभव हो रहे हैं, वह मिलकर 'राइटर ब्लॉक' जैसा कुछ बनाते हैं भी या नहीं। या यह कुछ और ही है। और इसकी छवियाँ कहीं किसी अलग रेटिना पर अपना बिम्ब बना रही हैं, जो मुझे दिख नहीं रहा हो।

अभी एक बारगी दोबारा से ऊपर लिखी हर पंक्ति को पढ़कर लगा यह कि यहाँ खुद से अपनी ही शब्दावली में एक महत्वपूर्ण सवाल करने की ज़रूरत है कि क्या यह एक भाव है, स्थिति है या किन्ही बृहतर परिपेक्ष में घटित होती कोई और प्रक्रिया? इन तरहों से देखने की कोशिश इतनी आसान नहीं लगती। पर समझने की ज़रूरत है। सबसे पहले वहाँ पहुँचने की आवश्यकता है जहाँ इस सवाल की जड़ें हैं। किन परिस्थितियों में इसका जन्म हुआ? फ़िर थोड़ी देर रुक जाऊँ तो लगता है यह कान को दूसरे-तीसरे तरीके से पकड़ने की एक भोथरी सी कवायद भर है, जिसका हासिल मुट्ठी में भरी रेत का धीरे-धीरे फिसलते जाना है।

इन सारी बकवास बातों का मेरे लिखने से किसी भी तरह, कोई भी प्रत्यक्ष संबंध अभी तक नहीं ढूँढ पाया हूँ। कहीं कोई ऐसी किताब नहीं मिली, जो मन मुताबिक हो। विनोद कुमार शुक्ल की 'दीवार में खिड़की रहती थी' के बाद कोई किताब उन ऊबों, परेशानियों वाले दिनों, उदास खामोश शामों से बाहर नहीं निकाल पाईं। कभी राजेश जोशी की 'किस्सा कोताह' कभी कहीं से भी पढ़ना शुरू कर देता। 'जलसा', साल दो हज़ार दस, के पन्नों पर भी लौटता रहा। पर नहीं। निर्मल वर्मा भी नहीं। उदय प्रकाश की '..और अंत में प्रार्थना' भी नहीं। अज्ञेय का 'शेखर' भी नहीं बचा पाया। न धर्मवीर भारती का 'गुनाहों का देवता' ही। मेरे मन की बातें वहाँ भी नहीं हैं। उन पन्नों पर ख़ुद को ढूँढते-ढूँढते अब थक गया हूँ। सच मैंने अब पढ़ना ही छोड़ दिया है। पर पता नहीं क्यों अभी भी दिल से लिखी एक किताब की तलाश में हूँ। जो मेरे लिए, किसी और ने नहीं लिखी होगी। इसे किसी और के लिए नहीं, ख़ुद अपने लिए लिखुंगा। पर थोड़ा इंतज़ार। थोड़ा रुककर। इसका हर पन्ना मुझे इस दुनिया से उस दुनिया में ले जाने के काबिल होगा, जहां आज तक मैं पहुँचना चाहता हूँ। उनके बीच मेरे हिस्से के सारे जिंदा सपने साँस लेते हुए मिलेंगे। इंतज़ार कर रहे होंगे, मेरी साँसों में घुल जाने का। उसके पोरों से मेरे देह की गंध निकलेगी। उसे कहीं दूर से भी पहचान जाऊंगा। यह किसी आइने में दिखती दिखती तस्वीर की तरह है।

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति को आज कि गूगल इंडोर मैप्स और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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    1. मार्च का जून हो गया। चलो आज आते हैं।

      तुमने लिंक लगाया आभार।

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  2. होता है होता है ऐसा ही बहुत बहुतों के साथ :)

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    1. उन बहुतों का पता नहीं, हम अपना जानते हैं। बहुतों का बहुतों की तरह होता होगा। हमारा अपनी तरह का है। ऐसी ढाढ़सनुमा टिप्पणियों से तो ख़ैर..पता नहीं क्या..

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  3. उत्तर
    1. भाई हमारी समाज सेवा में हम सबसे लघुत्त्म इकाई हैं। जब हमारा कल्याण हो जाएगा, कहीं न कहीं जुड़ जाएँगे। थोड़ी अभद्रता है। पर अभी इसी से काम चले, तो चला लो।

      सब यही करते हैं। पर क्या करे कोई कहता नहीं। सो उनके हिस्से का हमने कह दिया..

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  4. होता है कई बार....मेरे साथ भी...

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    उत्तर
    1. उन कई बारों में आप इस मनः स्थिति से कैसे निकलती हैं, थोड़ा मार्ग दर्शन देवें।

      आपकी अति कृपा होगी। अग्रिम धन्यवाद के साथ।

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