मार्च 23, 2014

गुम होते इस शहर में गैरज़रूरी फुटनोट..

कभी-कभी लगता है दिल्ली पल-पल पीछे छूट रही है। ख़ुद कभी नहीं सोच पाता के कहाँ से चलकर किधर आगया हूँ। कहीं के लिए चला भी हूँ या हम वहीं पृथ्वी की तरह अपने अक्षों पर परिक्रमा कर रहे हैं। हो सकता है यह थोड़ी देर के लिए हुआ मतिभ्रम है, जो कहीं नहीं रहने देता। बस भगाता रहता है। आराम कहीं नहीं है। हाँफ नहीं रहा, फ़िर भी लगता है, साँस फूलने लगी है। फेफड़ों से हवा आ नहीं रही, अंदर ही अंदर धौकनी की हवा से सुलगते कोयले में बदल गया हूँ। कहते हैं एक-एक कर जितना चीज़ों को संग्रहीत करने का आनंद है, उसी तरह उन सब संकलित वस्तुओं को छोड़ने में भी है। यह स्थिति कभी-न-कभी हमारी ज़िंदगी में आएगी ज़रूर। यह एक तरह का नियतिवाद नहीं है। पर कुछ-कुछ वैसी ही है। यह बीतते साल हमें ऐसे ही इस तरफ़ ढकेल देते हैं।

पर, जब इस पंक्ति को इस शहर पर लगाता हूँ, तो लगता है, इधर हो कुछ ऐसा ही रहा है। इसे जितना समेटा था, वह धीरे-धीरे खिसक रहा है। यह मेरी इस शहर को लेकर बनी समझ के ढाँचे के दरकने जैसा है। मैं इसमें रह नहीं पा रहा। यह कुछ सालों से जैसी दिखी है, वैसी बस उन्ही पलों में बनी रही है। लगता है वहाँ से लौटते ही वह कुछ बदल गया है। और अगली बार जब वहाँ फ़िर जाऊँगा, तो पहचानने में दोनों को थोड़ा वक़्त लगेगा। यह इसमें गुम हो जाने का डर ही होगा, जो अब लगने लगा हो।

यह शहर मुझमें गुम होगा या यह मुझे अपने अंदर समा लेगा? या इस सवाल को पूछने में देर कर दी। यह सवाल बेमानी है। फ़िर लगता है, ऐसे सवालों का कोई मतलब भी नहीं है। शहर अपने आप में कितनी जटिल संरचनाओं में लगातार बनते-बिगड़ते रहते हैं। हमें तो बस कुछ सालों तक इसका हमसफ़र रहना है, उसके बाद न हम वैसे रहेंगे, न यह। पर कुछ देर रुककर देखता हूँ, तो लगता है, ये सारी दलीलें बहुत कमज़ोर हैं, बिलकुल मेरी तरह। नाज़ुक सी। इनमें संवेदनायेँ नहीं हैं फ़िर भी यह कुछ ऐसी ही हैं। क्या यह कभी मेरी तरह नहीं सोचेगा के इस व्यक्ति के लिए मैं उसके मन मुताबिक न रह सका। इसके लिए कभी बन भी नहीं पाया। फ़िर जो बात दिमाग में दिल के रास्ते से गुजरती है वह यह कि ख़ुद अपने आप में यह शहर ख़ुद के लिए कितना है। कभी कोई मर्ज़ी इसकी है भी या हम ऐसे ही इससे गिले-शिकवे लेकर बैठ जाते हैं? कभी उसकी सुनते हैं भी..

फ़िर ये जो मुझे लग रहा है कि कहीं पीछे छूट गया हूँ उसमें कहीं ऐसा तो नहीं कि मैंने इस शहर में निकलना ही कमकर दिया हो। या कि उन मौक़ों को जो पहले सहज लगते थे, उनकी अनुपस्थिति में दिल कोई और ही खेल खेल रहा हो? यह इस शहर की तरफ़ से नहीं है। मेरी तरफ़ से है। मुझे ऐसा लग रहा है। उसे कितना लग रहा होगा, इसे नापने के लिए कोई तरक़ीब मेरे पास नहीं है। क्या पता वह जगहें भी मेरी रह देखती हों। पर कभी कह न पायी हों। या उनका कहना मेरे कान में तेल डालने से काफ़ी पहले की बात हो। पता नहीं। पता नहीं यह सब क्या है? यह सब अंदर घटित हो भी रहा है या इन मच्छर काटती रातों का नतीजा है? पर बेचैनी अब कुछ कम रहती है। उसके बिन नींद अच्छी आ रही है। कभी-कभी मन अकेला हो जाता है, पर मना लेता हूँ। थोड़े दिन और..

अभी कच्चा हिसाब लगाया तो दिख पड़ा, छह महीने तो पक्का हो गए, कोई फ़िल्म देखने नहीं गए। आख़िरी देखी कौन सी थी, यह भी याद नहीं आ रही। हाइवे, क्वीन, गुलाब गैंग और कौन सी फ़िल्में आई हैं? पता नहीं। सच कहूँ तो याद करने का मन भी नहीं है। कुछ सोच रखा है। तुम्हारे लिए। एक वादे की तरह। इसलिए भी टाले देता हूँ। मार्च बस एक हफ़्ता और बचा है। इसके बाद अपना महिना। पता नहीं कितनी कितनी ठंडी, कितनी कितनी गरम रातें जोड़ जोड़कर यहाँ तक पहुँचें है। इतनी पास आकर उन शामों की उलझनों में कहीं नहीं ठहरना चाहता। इंतेज़ार अब नहीं होता। कुछ अधबुने सपने हैं, कुछ किश्तें हैं, चाँद है, हवा है, तुम्हारी आवाज़ है। आवाज़ में हम दोनों कुछ कुछ खोये खोये से रहते हैं। आगे नहीं रहेंगे। तुम आ जाओगी, तो यह शहर भी मेरे अंदर से बाहर आ जाएगा। यह भी तुम्हारे इंतज़ार में है। मेरी तरह। तुम्हारे साथ इसे फ़िर से बुनना है। सपने के शहर की तरह।

देखा यही होता है। तुम्हारा ज़िक्र आने के बाद सब ठीक होने लगता है जैसे। किसी की नज़र न लगे, इसीलिए काला टीका लगा लिया करो। कितनी बार तो कहा है। पर..चलो जाने दो। आज आवाज़ नहीं सुनी है न, इसीलिए शाम से अजीबो-गरीब बातें करने लगा। खाली-खाली से पलों में ऐसा ही होते जाता हूँ। सच कह रहा हूँ, डायरी में अब लिखने का सबर नहीं रहा, लगता है। वहाँ बैठने के मौके भी नहीं मिल रहे। घूम बहुत रहा हूँ। तभी कब सुबह होती है, कब रात नहीं पता चलता। अभी इन दिनों तो एक कार दिखाई दे रही है जो अब कभी गेट पर लौटते हुए खड़ी नहीं दिखेगी, उसपर लिखने का मन है। पर बच रहा हूँ। ऐसी बहुत सी बातें हैं, जो रह जाती हैं हरबार। और हर बार लौटते लौटते थोड़ा वक़्त तो लगता ही है। इस बारभी लग रहा है। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. पहले चार पैरे जबर्दस्‍त भाव-विचारों से भरे हुए हैं। एकदम अपने से लगे।

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    1. सागर कभी पीछे एक टीप में कह गए के 'कमोबेश हर आदमी में हम हैं. और हममें वे हैं.'

      शायद वही कुछ कुछ हम सबमे आवाजाही करते रहते होंगे। यह शहर हम इन्सानों के लिए नहीं बने, बस उन्हे जिंदा रखने के बहानों के नाम पर अहमक़ से डेरों में तब्दील होते गए हैं। जहां साँस लेना भी इतना मुश्किल हो जाता है। पर यह कोई निराश होने वाली बात नहीं, बस हमें अपने कोनों को बराबर झाड़ते पोंछते रहना है, ताकि पहचान बनी रहे।

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