मार्च 06, 2014

घर, जेब, जगह, किताबें, मेला और इसबार

कल बस इतना कहा था किताबें पढ़ना छोड़ दिया है। यह कहीं नहीं लिखा के उन्हे खरीदना भी बंद कर दिया है। शायद उन्हे अभी इकट्ठा कर, कभी इत्मीनान से कहीं बैठकर कहीं से भी पढ़ने लग जाऊँ। यह किन अर्थों में विरोधाभासी व्याघातक बात है, पता नहीं। शायद हम सब इन्ही के भीतर बनते-बिगड़ते रहे हैं। फ़िर अगर यही सोचता रहता तो इसबार भी प्रगति मैदान में लगे किताब मेले में नहीं जा पाता। हरबार इनके पास आने के बहाने ढूँढता रहा हूँ। एक नज़र देख लेने की ज़िद। उन छपे पन्नों की स्याही की गंध। उन्हे छू लेने की तमन्ना। उन्हे घर तक लाने की कोशिश। इन सबके बीच एक अदद जेब। जेब में मनमाफ़िक पैसे। पैसे न हों तो जाना बेकार। फटी और खाली जेबें कुछ नहीं खरीद सकती। कुछ भी नहीं।

हरबार बात यहीं से शुरू यही पर खत्म। इतनी किताबें पढ़कर क्या हो जाना है। यह हमारी ज़िन्दगी में कितनी जगह रखती हैं। यह जगह कभी भरे या नहीं पर हम जिन दीवारों वाले स्थापत्य के नमूनों में रहते हैं, उनकी भी कुछ सीमाएं हैं। हमारी उम्र के साथ वहाँ उपलब्ध जगह धीरे-धीरे सिमटकर इतनी भर रह गयी है के हम रात का खाना अगर एक साथ बैठकर खाने लगें तो जगह नहीं बचती। फ़िर होता यही है के जल्दी-जल्दी किसी सदस्य को पेट भर उठना पड़ता है। कि अगर थाली में दाल कम पड़ जाये तो वह आसानी से उस पतेली तक पहुँच जाए। थोड़ा रुककर मयूरजग तक जाकर सब तक पानी से भरे गिलास पहुँचा पाने में सक्षम हो सके। हम होते वहीं हैं। चाहे कुछ हो। थाली भी वहीं है, गिलास भी। हम भी। फ़िर भी कुछ है, जो इस बार भी चल पड़े किताबों की दुनिया में।

एक ऐसी जगह जहाँ किताबें ही किताबें हैं। बहुत सारे स्टॉल। लोग कुछ कम हैं। वह उनका इंतज़ार कर रही हैं। कुछ लेखकीय कोने इस बार भी गुलज़ार थे। शाम की बैठकों में वहाँ इन किताब लिखने वाले लोगों से मिला जा सकता था। पता नहीं कौन सी शाम थी, हॉल नम्बर अठारह में कोई कवि 'बकरी' पर रचित अपनी कविता का पाठ कर रहे थे। सुनने वाले भी कभी दायें-कभी बाएँ अपनी गर्दन घुमा घुमाकर कभी मेमने कभी बकरी में रूपांतरित हो जाने की पुष्टि करते रहे। हम थोड़ा वापस हुए। पीछे की तरफ़। वहीं 'जनचेतना' के स्टाल पर कुछ कविताओं की किताबें देख रहा था। उन्ही के पास खड़ी लड़की जो शायद वहाँ की व्यवस्था में संलग्न थी; किसी अनाम से कवि की अनुसंशा कर बताने लगी कि आपको अगर कविता पसंद है तो यह वाली किताब ज़रूर पढ़नी चाहिए। चलिये अनामिका जी को ही ले लीजिये। नहीं। तो कात्यायनी की कवितायें ज़रूर पसंद आएंगी। वहाँ अनुवाद की किताबें जादा थीं। क्या उसके कहने पर मुझे वह सुझायी गयी पुस्तकें खरीद लेनी चाहिए थी? इसके लिए उसकी आँखों में दोबारा झाँक नहीं पाया। पता नहीं उस क्रान्तिचेतस लड़की को कैसा लगा होगा। ख़ैर छोड़िए। मैंने भी जादा सोचा नहीं।

सोच यही रहा था के 'सीएसडीएस' की जो नयी पत्रिका 'प्रतिमान' आई है, उन्हे खरीदने के लिए जेब में साढ़े चार सौ रुपए होने चाहिए। नहीं तो उन वैचारिक बहसों, विमर्शों, संवादों, स्थापनाओं, सहमतियों असहमतियों से परिचित होने के अवसर को नहीं प्राप्त कर सकता। वह तभी बाहर आएंगे, जब हम उन पन्नों से गुज़रते हुए वहाँ उपस्थित होंगे। वह हमें किस तरफ़ ले जा रहे हैं? क्या नहीं सोचने देना चाहते? खयाल यह भी आया कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि इस हिन्दी के दोनों बड़े प्रकाशक हमारी वैचारिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने की स्थिति में हैं? कैसे हमें अन्य वैकल्पिक स्रोतों की तरफ़ भी जाना होगा? या यह विचार स्वयं में समस्याग्रस्त है कि हमें सोचने के लिए किन्ही किताबों की तरफ़ जाना होगा। किताबें किस हद तक पढ़ी जानी चाहिए? हम यह निर्धारित करने की स्थिति में हैं? बहस बहुत लंबी थी, इसलिए दिमाग थोड़ा थक गया। थोड़ा रुक गया। हमारी आँखें सिर्फ़ हिन्दी के भाषिक संकेतों को जान समझ पाती हैं इसलिए ख़ुद को इन्ही के इर्दगिर्द किए रहते हैं। फ़िर अँग्रेजी कामचलाऊ तो है, पर इनकी किताबें हैसियत से बाहर की चीज़ हैं, इसलिए विषयगत विविधता का आग्रह भी उस तरफ़ नहीं लेजा पाता। रुके खड़े रहते हैं।

राजकमल प्रकाशन से प्रो. तुलसीराम की आत्मकथा का दूसरा खण्ड प्रकाशित हुआ है। दोबार गया और दोनों बार 'मणिकार्णिका' नहीं मिली। सुनने में आया कि कुँवर नारायण की गद्य में कोई किताब आई है, वह भी नहीं दिखी। कवि कैसे लिखता है, नहीं देख पाया। 'एक कवि की नोटबुक' भी नहीं मिली। आधार प्रकाशन से असद ज़ैदी के तीनों कविता संग्रह पुस्तकाकार मिल रहा था। मेरे पास दो पहले से हैं, इस तीसरे वाले के साथ पिछले दोनों के लिए तीन सौ रुपये देने का मन नहीं किया। बस विनोद कुमार शुक्ल की 'खिलेगा तो देखेंगे' पिछली बार रहने दी थी, इसबार ले आया। और भी कोई किताब थी शायद। पता नहीं कौन सी। वाणी प्रकाशन के कैश काउंटर पर उदय प्रकाश की किताब देखकर वह बोला, 'इनकी एक और किताब आई है साँड-साँड करके..'। किताब नयी नहीं है, पुरानी है। हिन्द युग्म के स्टाल पर तब 'कुल्फ़ी एंड कैपिचिनो' का आदमक़द लेआउट नहीं लगा था। अगली बार गए तब वहीं इसके पास किशोर चौधरी दिखे। फ़ेसबुक वाली तस्वीर से मिलान कर लिया था, फ़िर भी मुलाक़ात का वक़्त नहीं था। जल्दी निकलना था। सच कहूँ तो बस दूर से देख कभी फुर्सत से मिलने की ठान चला आया। शैलेश तो दोनों बार वहाँ नहीं थे। दख़ल प्रकाशन पर अशोक कुमार पांडे थे..पर वही मिल लेंगे। मिलने में क्या रखा है। वहीं से विमल चंद्र पांडे की इलाहाबाद वाली किताब खरीदी। 

अभी जाना है। फ़ोन आ रहा है। वहाँ से किताबें सिर्फ़ ही नहीं लाया सोन चिरइया में मालिनी अवस्थी की आवाज़ भी साथ है। बस थोड़ी देर में। मेरे पास कोई सॉफ्टवेयर नहीं है न इसलिए ऑनलाइन उसका फॉर्मेट बदलना होगा। वापस लौटकर वह नीचे ही होगी।


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