मार्च 08, 2014

सपने में तुम हो, मैं हूँ, हम दोनों हैं..

रात बारह बजकर एक मिनट। घंटी बजी। उधर से फ़ोन नहीं आया। तुम सो गयी हो। समझ नहीं पा रहा, नींद आ रही है या आँखें ऐसे ही भारी हो रही हैं। पलकें घंटा भर पहले भी ऐसी थीं और अभी भी ऐसी ही हैं। नींद गायब है। सपने में भी नहीं हूँ के तुम तक पहुँच जाऊँ। करीब से हम दोनों, एक दूसरे के पास बैठे रहें। ठंड कुछ कम है। छत पर भी कुछ देर टहल सकते हैं। जैसे-जैसे दिन, शाम बन इन खत्म न होने वाली रातों में बदलते जा रहे हैं, ऐसे ही ख़यालों में खोया-सा रहता हूँ। तुम्हारे करीब आने के बहाने काम नहीं करते। काम करती है तुम्हारी आवाज़। पता नहीं फ़ोन पर तुम्हारी आवाज़ कैसी लगी। नींद से अचानक जगी हो जैसे। कुछ खोयी-खोयी सी। अनमनी नहीं। अकेली। खाली-खाली सी। हम जितने दूर हैं, उतनी ही तरह से पास हो जाना चाहते हैं। कभी ये न लगे, साथ नहीं हैं। यह सपने ही हैं, जो इस तरह आकर बचा ले जाते हैं। टूटने की हद तक जाकर वापस लौट आने की तरह। हर गुज़रती रात अपने आप ऐसे ही बुनती जा रही है। इनमे जितनी कम आवाज़ें हैं, यह उतनी ही तरहों से अंदर तक भरी हुई हैं। दिल की तह से आसमान की तह तक। तारों से लेकर सितारों तक। 

दिल में हर कोने में बैठी तुम चली आती हो, आँखों के सामने। हमदोनों एक दूसरे के पास थोड़ी देर वहीं बैठ जाते हैं। बात नहीं करते। बस ऐसे ही अबोले लेटे रहते हैं। एक दूसरे की तरफ़ देखते हुए बोलती हैं, दिल की धड़कनें। बड़े दिनों से सोच रहा हूँ, तुम्हें एक ख़त लिखूँ। अभी बैठ वही सोच रहा था। कभी पोस्ट नहीं करता। अपनी डायरी में छिपाये रखता। गुलाब के फ़ूल की तरह। उसकी ख़ुशबू में तैरती हम दोनों की तस्वीरें, जुगनुओं की तरह नाचती रहती। तालाब के पानी में उनकी परछाईं भी वैसे ही खेलती। खेलती रहती सुबह उजाला होने तक। वो ख़ुशबू टिमटिमाते तारों की छाव में, इन ठंडी रातों की हवा में सिमटती कहीं पेड़ के नीचे बैठ जाती। इसमें शब्द नहीं होते। होती झींगुरों की झंकार। तुम्हारे घुँगरू वाले पायल की आवाज़। जो दिल की धड़कन की जगह मेरे सीने में धड़कती है, हर रात। जैसे लहू नहीं, तुम बहती हो मेरी नसों में। साँसों में घुलती गंध हम दोनों की देह गंध होती। भीनी भीनी सी। हरसिंगार के फूलों की तरह। रजनीगंधा की पंखुड़ियों के जैसे। चम्पा की महक की तरह। हर रात ऐसी ही किसी सपनीली दुनिया में इंतज़ार करता सो नहीं जाता, उन बैलों की आँड़ में तुम्हारे बाहर आने की राह देखता, बैलगाड़ी से टेक लगा, वहीं खड़ा गुनगुनाता रहता। गुनगुनाता झींगुरों की तरह। तब भी कोई मेरी आवाज़ सुन नहीं पाता। सबको लगता रात ऐसे ही होती है। 

सारंग के पंखों की तरह छटपटाता वहीं ऊँघने को होता, तब चुपके से तुम बाहर निकलती। बड़े आहिस्ते से। पंजों के बल। एड़ियाँ उठाये। बिन आवाज़। बिन बोले। बिन कहे। तुम पायल घर निकाल आती। तुम्हारे लहँगे में तुरपाई किए सितारे चाँद की रोशनी में झिलमिलाते आँखों में पड़ते। आँखें मिलते ही दोनों चमकने लगते। लगता चंदा और चकोर मिल रहे हैं। कान की बाली धीरे से हवा में लहरती हुई दिखती। दिल देख धक्क सा होता। हर रात। तुम ऐसे ही पहर बीते निकलती। हमें देख कोई नहीं जागता। सब वैसे ही सोते रहते। उन्हे पता है, यह हमारा सपना है। उन्हे ऐसे ही सोते रहना है। हम बेखटके निमियक तरे बैठ जाएँगे। कोई कुछ नहीं कहेगा। कभी तुम्हारा मन इमली खाने को होता तो थोड़ी दूर बाहर निकाल आते। वहीं उन हवा के झोंकों के साथ हमारी आवाज़ें दूर तक जातीं और लौट कर वापस हम तक आतीं। वहाँ सुनने वाले हम दोनों ही थे इसलिए हवा भी हमारे इर्दगिर्द बहती। कहीं दूर जाती भी तो थक जाती। उसे थकना पसंद नहीं है। जैसे जादा चलने पर तुम्हारे पैर दुखने लगते हैं, वैसे वह भी सुकवार है। पर इतनी रात बाहर निकालने पर भी उसे ठंड नहीं लगती, न उसका गला ख़राब होता है। तुम आज फ़िर बिन शॉल चली आई।

तुम्हें पता है, उस रात जब तुम नहीं आई थी, तब चुपके से तुम्हारे दिल के दरवाज़े को खोल अंदर झाँक आया था। तुम वहीं रसोई में फ़रा बना रही थी। टमाटर के साथ छौंक लगाकर खाने में मज़ा आता है। स्वाद बढ़ जाता है। सब बैठे थे, इसलिए कुछ नहीं बोला। वहीं गायब होकर, तुम्हारे कान के झुमकों को निहारने लगा। उनकी आवाज़ सुनने के लिए वहीं तुम्हारी बगल में खड़ा रहा। तुम जान नहीं पायी। वो लकड़ी वाले कंगन कहाँ गए तुम्हारे। उनकी झनक सुने भी तो दिन हो गए। आज भी तुम थोड़ी थक गयी हो। चावल से कचरी बना रही थी, दोपहर। तभी रात खाना भी कम खाया तुमने। नींद आ रही है। मैं तो बस पल्ला खोल ऐसे ही आ गया। तुम सोती रहो। कभी-कभी तो मौका मिलता है, तुम्हें ऐसे देखने का। मैं भी बस जा रहा हूँ। उठना मत। अभी वहीं मिलते हैं। आज तो छत पर मिलने का वादा है न। चाँद नहीं आया है। सितारों को भेज दिया है। उस दुधिया रोशनी में फ़ूल बीनते हुए कुछ दूर निकल जाएँगे। कितने दिन हुए हम टहलने नहीं निकले। थकने लगना तो बता देना, वहीं से लौट पड़ेंगे। थोड़ा जल्दी वापस आकर छत पर बैठेंगे। तुम्हें एक गाना सुनाने का मन है। सूरज को कह देंगे, कल थोड़ी देर से आए। ठीक है न। जल्दी बताओ। नींद आ रही है।

{यह कल की तारीख में जनसत्ता में आ चुका है। पता चला आज सुबह। आठ अप्रैल को। थोड़ी देर पहले। पापा ने बताया। जब दिल्ली से चलकर तुम्हारी तरफ़ आ रहा हूँ, ये छोटा सा रुक्का, हम दोनों के नाम..!! वहाँ पढ़ने के लिए यहाँ चटकाएँ }

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