अप्रैल 11, 2014

आज शाम यहाँ की दिवारे..

कितने दिन हो गए, इस घर नहीं आ पाया। अनकही बातों से ख़ुद को भरता रहा। सोचता रहा बस, मौका तो लगे, सब कह दूँगा। तुम्हारे कान के पास आकर। चुपके से लटों को हटाकर। उन होंठों को हल्के से छूकर। उँगलियों के खाली हिस्सों को भरते हुए। आहिस्ते से कुछ-कुछ न कहते हुए। आँखों में आँख डालते हुए। कुछ भी अपने पास नहीं रखूँगा। पता नहीं था के इतनी जल्दी यहाँ वाले दिन उड़ जायेंगे। और आ जाएगा वह दिन, जब यहाँ से चल, तुमतक पहुँच जाऊँगा। अभी आज शाम यहाँ की दिवारे मेरे सीने से निकले उन सारे दिलों से भर गयी हैं, जितने मेरे यहाँ के आसमान में उड़ते रहे हैं। थोड़ी देर में ये सब भी चल देंगे। मेरे साथ। अंदर से बाहर तक। सब। इनमे वो भी हैं, जो उधर से तुमने भेजे। सबको सहेज कर रख लिया था, अब साथ ला रहा हूँ। कुछ यहाँ बचे नहीं रहेंगे। सब चल पड़ेंगे।

ऐसी कितनी ही शामें बिन तुम्हारे इस कमरे की दीवारों के साथ बिताईं, कहीं कोई हिसाब नहीं। जितना भी डायरी में लिख दिया है, उसमे भी सिर्फ़ उतना है, जितना कह पाया। असल हिसाब तो कभी लग ही नहीं पाएगा। कैसे आसमान का रंग गाढ़ा होकर गुलाबी नीले से बदलकर बैंगनी में बदल जाता। सारे रंग मिलकर दिल में अँधेरे से भर देते। कहीं दूर चाँद की परछाईं में तुम्हें ढूँढता रहता। झिलमिलाते तारों की रोशनी में अतीत से आती रोशनी में अपने भविष्य को देखता। मेरे अंदर कहीं दिल के किसी कोने में उसी अकेलेपन की उदास आँखें दौड़ने लगती। यह उन क्षणों को याद करती शायद आखिरी पंक्तियाँ हैं। इसके बाद कभी इन क्षणों को अकेले में सोच उदास खाली नहीं होऊँगा। तुम हमेशा साथ रहोगी। दिल से बाहर निकलकर बिलकुल सामने।

मेरे उन सारे ख़्वाबों ख़्यालों किस्सों से निकलकर असल में मेरी बगल में बैठी होगी। यह सपना नहीं होगा, यह सच होगा। जितना मेरे लिए उतना ही तुम्हारे लिए भी। अभी भी शायद हड़बड़ाहट में हूँ। जल्दिया रहा हूँ। तुम तक पहुँचने की अरबरी में। कि सच लिखने का मन नहीं हो रहा। मन कहीं तुम्हें ढूँढ रहा है। कहीं पास से देखने का मन है। इस तरह हरबार मन न जाने बेतरह तुम्हारी तरफ़ भागता रहा है। कहीं ठहर नहीं रहा। अरबरा गया लगता है। कितनी कितनी शामें तुम्हारी आवाज़ों में खोया खोया सा क्या क्या लिखता रहता। अब जबकि हम इतनी पास हैं शायद मेरी भाषा के पास वह शब्द ही नहीं जो मेरे मन कि बातों को हू ब हू वैसा ही उतार सकें। शायद तभी इधर लिखने का मन नहीं करता। जितना तुमसे बात कर ख़ुद को खाली करता रहता। बेसबर। बेपरवाह। बेताब।

तुम मेरे अंदर की खाली जगह को भरती रही, ख़ुद से। वह खाली हिस्से तुमसे ही भर सकती थी। कोई और अब ऐसा कर नहीं सकता। कभी नहीं। तुममें मैं हूँ। मुझमे तुम हो। हम एक दूसरे में गुथ गए हैं। जैसे समा गए हों दोनों एक दूसरे में। ऐसी कितनी ही बातें किस-किस तरह से तुम्हें कहता रहा हूँ। अब आज हम एक दूसरे को छू पाने की दूरी पर होने जा रहे हैं। कितनी तरह से तुम्हारे साथ हूँ। किसी की नज़र न लगे, इसलिए तुम्हें काला टीका रोज़ सपने में लगता रहा हूँ। हम इतने सारे दिनों पीछे से आज यहाँ तक कैसे पहुँचे हैं, हमारे सिवा कोई नहीं जानता। कितने अबोले वादों के साथ हम रोज़ मिलते। जितना कहते नहीं उससे कहीं जादा अपनी उन चुप साँसों की धड़कनों से कहते रहे। इस दिन के लिए ही तो हम चले थे। कि एक दिन हम हमेशा के लिए साथ होंगे। तब जब मन होगा दूसरे के कान में कुछ कह कनअँखियों से कहकर कहीं छिप जाएँगे। उन्ही के आसपास से देखते हुए मुस्कुराती सुबहों को साथ उठेंगे। इस साथ के लिए ही तो इतना इंतज़ार किया। पल पल इस दिन कि तरफ़ बढ़ती घड़ी को कितना कोसा। उसकी गति को चाहकर भी कभी तेज़ नहीं कर पाये। रात खूब कोशिश करते तब भी उदासी घेर लेती। कहीं इसकी छाया दूसरे पर न पड़ जाये इसलिए बीच बीच में चुप हो जाते। पर क्या पता था इसकी गति हमारे बोले शब्दों से कहीं जादा है, जो तुरंत दिल में कहीं जा धँसती। इसे निकालते निकालते सुबह होती। न चाहते हुए भी सबसे वैसे ही बोलना पड़ता। मन न हो फ़िर भी काम करना पड़ता।

आज पता नहीं क्यों यह सब याद आ रहा है। जितने ब्योरे यहाँ लिख सका, उससे कहीं जादा वह अभी भी उसी दिल के किसी तहखाने में बंद हैं। उनका होना दर्द देता है। पर पता है, यह उन आखिरी किश्तों में से है, जब इसे याद लिख रहे हैं। फ़िर कभी नहीं लिखेंगे इन दिनों को इन उदास रातों में। शामें ऐसी अकेली नहीं रहेंगी। लग रहा है, दिमाग कहीं ठिकाने पर नहीं है। दिल की तरह वह पहले ही तुम तक पहुँच चुका है..

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