अप्रैल 21, 2014

तुम्हारी मेरी बात

तुम: अच्छा सोचो अगर आपको मुझे प्रपोस करना हुआ तो कैसे करेंगे?
मैं: तुम्हें बहराइच के कचहरी रोड ले जाएंगे। लस्सी पिलएंगे। वहीं कह देंगे। जैसे लस्सी मीठी है वैसे हम दोनों अगर साथ हों तो ज़िंदगी भी खुशनुमा हो जाएगी। इसपर तुम या तो मुस्काती या अपना सैंडील निकाल मेरे सर पे दे मारती..

तुम: ऐसा नहीं है, हम तो आपको मिठाई खिलाते, वही स्पेशल वाली, बड़े प्यार से..

मैं: वही तो अगला तरीका था हमारा।
तुम: पर मैंने बाज़ी मार दी। 

मैं: अगर लस्सी पर न मानती या पाशोपेश में होते तब कभी किसी दुपहरी कुमार पिक्चर पैलेस चलते। बालकनी का टिकट कटाते। कोने वाली या वहीं खाली जगह मौका देख धीरे से हाथ पकड़ लेते। फिर कान के पास उससे भी धीमे से कहते। हमारे साथ चलोगी। ज़िंदगी भर।

पता नहीं तुम क्या कहती..

तुम: Yes i will marry you :)
मैं: ये कह देती आप..!!
पर ऐसा क्या देखा आपने हममे। जो सारी ज़िंदगी हमारे साथ रहने का फैसला कर लिया। वो लड़का जो सिनेमा हाल में तुमसे कहे। तुम मान गयी..

सवाल टेढ़ा है पर बताना ज़रूर..

तुम: जी 101 परसेंट। 
किसी को भी अपने लाइफ पार्टनर से बस दो चीज़ों की उम्मीद होती है, प्यार और विश्वास। और हमें पता है यह दोनों चीज़ें हमें आपसे मिलेंगी बहुत ही प्यार से। 

मैं: अच्छा जी ऐसा क्या..
या एक और बार कोशिश करते।

तुम: मतलब,
शायद यही आप हमसे भी चाहते होंगे??

मैं: तुम्हारे ऑफिस के बाहर खड़े रहते। केडीसी की क्लास मिस कर देते। शाम निकलते वक़्त तुमसे अचानक मिलते। कहते कुछ देर साथ चल सकता हूँ डिगिहा तक या अस्पताल मोड़ तक। उसी दरमियानी में तुमसे कहता। क्या तुम्हें लगता है के हम एक साथ ज़िंदगी भर नहीं चलते रह सकते ऐसे है।
पता नहीं तुम नाराज़ होती या क्या..

या पैर पटकते हुए गिलौला वाली जीप पकड़ घर चली जाती। और मैं मुँह लटकाए वापस मल्हीपुर बस स्टैंड आता बस में बैठता। और पूरे वक़्त तुम्हारा नंबर ट्राइ करता रहता। के कुछ तो कहो तुम..

तुम: हम कहते अच्छा एक बात बताओ, हम आपके हैं कौन?
तब आप क्या कहते?
अब बताओ भी.. सोचना पड़ रहा है क्या ??

मैं: कहता के तुम्हारे बिना मैं खुद को अधूरा-सा मानता हूँ। लगता है कुछ छूटा-सा जा रहा है, तुम्हें देख भर लेने से अंदर ही अंदर पता नहीं कैसा कैसा होता जाता हूँ। पर अगर हम साथ हुए तो कोशिश यही करूंगा के तुम्हें कभी दुख न दूँ..

तुम: अच्छा एक वर्ड में बताइये अब..

मैं: क्या बताऊँ..पर पहले तुम कहो इतना सुनने के बाद तुम क्या कहती..
उस लड़के को..

तुम: पहले आप बताओ हम आपके हैं कौन। फ़िर हम बताएँगे। 
 मैं: वो लड़का कहता तुम मेरी सब कुछ हो..

तुम: सब कुछ मतलब क्या?
क्या हुआ नहीं बताएँगे..
हम तो कहते, आप न मिले तो जान दे देंगे पर आपके बिना जीना पसंद नहीं करेंगे मर जाएँगे हम आपके प्यार में।

मैं: सब कुछ ज़िंदगी है।
तुम: अच्छा जी

मैं: किसी के न होने से वह थोड़ी खाली तो हो ही जाती है। और जब वह दिल के करीब हो तब और भी दुख होता है। जो कहा नहीं जाता दिख जाता है।

तुम: पर आप तो हमारी जान हैं।
मैं: ओहो आप तो रोमांटिक हुई जा रही हैं..
तुम: हम ने तो अपनी फ़ीलिंग बताई है। 

मैं: अच्छा चलो एक बार फिर कहता। अगर हम उस कस्बेनुमा शहर में लगातार मिलते, मिलने के मौके बनते रहते। तब कभी न कभी ज़िद करके अपने कुछ करीबी दोस्तों को श्रावस्ती चलने पर राज़ी करता। तुम्हारी सहेली से तुम्हें चलने को कहलवाता। और उस सहेली से कहता के तुम्हें किसी भी तरह से राज़ी कर ले बस।

फिर वहीं अंगुलीमाल की गुफा के ऊपर ताप्ती नहीं की तरफ से आती हवा के झोंको के साथ तुम्हारे कान में मेरी आवाज़ जाती। क्या मैं तुम्हें पसंद हूँ। इतना पसंद के सालों तक मुझे झेल लो। तुम्हें छेड़ना चाहता हूँ ज़िंदगी भर। क्या तुम ऐसे परेशान होना चाहती हो..कर सकता हूँ तुम्हें परेशान..??

इस बार भी पता नहीं तुम क्या कहती..
मानती के नहीं..??

तुम: हमने कहा न कि आप हमारी जान हैं। और जान के लिए तो कोई कुछ भी कर सकता है।
मैं: अच्छा जी..

मैं: पापा आ गए हमारे।
अब फोन कर सकती हैं आप .??

तुम: आपकी बानियाँ लेकर। 
फ़ादर-इन-लॉं हैं, पूछेंगे तो क्या बताएँगे?

मैं: ओ हो..
तो कल करिएगा
तुम: हाँ। 

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