मई 12, 2014

सपने जिसमें हम सच में अभी गुज़र रहे हैं..

इन बातों को आज इतने महीने पहले ही ‘ड्राफ़्ट’ करके ‘शेड्यूल’ कर रहा हूँ। तीन चार सपने तरतीब से लगा दिये हैं। के आगे वाले दिनों में कहीं इसे लगाना रह न जाये। भूलने वाला प्राणी नहीं हूँ, फ़िर भी.. मन कर रहा है। तारीख़ वही है जब हम सच में चारबाग़ स्टेशन के लिए चल दिये होंगे। इस वक़्त शायद बस बहराइच से निकल चुकी होगी। लखनऊ रोड। जरवल क़स्बा के आसपास। या घाघरा नदी पार कर चुके होंगे। बस में इंटरनेट से पोस्ट करना थोड़ा मुश्किल है। इसलिए भी महीनों पहले अरबरा रहा हूँ। ढेर-ढेर सपने हैं, जो लगातार हम देखते रहे हैं। उनकी पहली साझा किश्त इधर पूरी होने जा रही है। हम बिलकुल अगल बगल बैठे हैं। सबसे आगे वाली सीट पर..

अभी से मन भाग रहा है। ठहरता नहीं कहीं। बारात आँसू अबोली मुलाक़ात के दरमियान अभी पता नहीं कैसे सामने से विदाई वाला दिन गुज़रा। अचानक। आपकी चलते वक़्त आँखें लाल हैं। वह रो रही हैं। हम देखकर थोड़ा असहज हो रहे हैं। किन यादों को यहीं रहने दें। किन्हे साथ ले चलें। समझ नहीं पा रहे। एक नयी जगह जा रहे हैं। सबको छोड़कर। इस दुनिया से नयी दुनिया में। हम गाड़ी में बैठे हैं। अगल-बगल। चेहरा शांत है। चुप है। बात काफ़ी कम हो रही है। हाँ-हूँ के अलावा कुछ नहीं। कभी बाहर देखते हैं कभी अंदर ही कुछ ढूँढ रहे हैं। शायद वह जो पीछे छोड़ आए हैं। अपने बचपन वाला घर। पता नहीं अभी कहाँ से हम दोनों वेदी पर दिखायी दिये। मेन स्टेज से उतरकर वहाँ बैठे हैं। एक एककर सब आते जाते दिख रहे हैं। गीत हो रहे हैं या सब ऊँघ रहे हैं दिखे नहीं। अफ़रातफ़री नहीं है। सब धीर शांत हैं। आवाज़ें कम हैं। रात के दो बज रहे होंगे। इतनी जल्दी करने के बाद भी। नाचने-गाने खाने-पीने के बाद।

अचानक हम गाँव पहुँच गए हैं। गाँव भी कुछ अलग है। अब वह वह जगह नहीं है। थोड़ा बदली है। हमारे लिए भी। आपके लिए भी। चाचा वाला घर। खपरैल। हम तब कहाँ होंगे? कह नहीं सकते। शायद छत पर या दुआरे। आप वहीं लड़कियों से घिरी-घिरी घर में। हम कब मिलेंगे। पता नहीं। चार छह दोस्त हैं। बैठे हैं। उन्हे भी जाने की तय्यारी करनी है। या नहर किनारे घूम आने को कह रहे हैं। पता नहीं। ऐसा सब देख लेना पता नहीं कैसे कर जाता है। थोड़ा रूमानी सा। थोड़ा हरारत भरा। के वक़्त पास आ रहा है। जब साथ होंगे।

कई दिन से तुम्हें चारबाग स्टेशन वाला सपना बार बार याद दिलाने का मन होता रहा। पर यहाँ लिख नहीं पाया। पता नहीं कैसे टलता गया। वो जो सपना है उसमे शादी के बाद तुम और मैं गाँव से दिल्ली आ रहे हैं। पता नहीं सब पहले ही लौट चुके हैं इसलिए भी यह एकांत है। अचानक बस दिखती है। बस बहराइच से चल पड़ी है। धूप है। सर्दियाँ हैं। रास्ता उसी तरह लम्बा है। तुम्हें नींद आ रही है या आ गयी है। तुमने अपना सिर आहिस्ते से मेरे कंधे पर रख लिया है। मैं भी हिल नहीं रहा हूँ। बस भागे जा रही है। हाथ धीरे से पकड़े हुए हूँ। लगा तुम जाग रही हो। बस इस अफ़रातफ़री में थोड़ी सी थक गयी हो। इसलिए नींद आ रही है। और कुछ नहीं।

हम एक दूसरे की तरफ़ देखते हैं। दोनों धीरे से मुस्काते हैं। अचानक दोनों साथ बोलते हैं- ‘क्या’? दोनों फ़िर साथ कहते हैं- ‘कुछ नहीं’! दोनों साथ हैं। सपने में भी। असली में भी। कुछ बोल नहीं रहे हैं, बस चुप हैं। थोड़ा बोलते हैं। थोड़ा रहने देते हैं। रह-रह बोलते हैं। रह-रह चुप हो जाते हैं। यह अंदर बाहर होते रहने में रह-रह देखना है। उन साथ वाले दिनों को आहिस्ते से बुनने की तय्यारी जैसे। जैसे यह ख़ुद को आहिस्ते से एक दूसरे में मिलते जाना है। एक दूसरे की साँस में घुलते जाना है। लगातार। बिनरुके। उन सब बातों यादों रातों को दोहराते जाना है, जहाँ से चलकर हम साथ चल रहे हैं। कितने मुश्किल के दिन थे। पर अब नहीं। अब साथ हैं।

फ़िर चारबाग़ रेलवे स्टेशन। वैसा ही। जैसा है। पर कुछ है जो वही नहीं रह पाया है। तुम समान के पास बैठी हो। कहीं दूर से तुम्हें देख रहा हूँ। पास आकार साथ बैठ जाता हूँ। तुम फ़ोन उठाती हो। नंबर मिलाती हो। घर। मम्मी उठाती हैं। रोने का मन हो रहा है। पर नहीं। आँखों के कोनों में पलकों में आँसू आकर रह गए हैं। बात कम हो रही है। तुम बोलते बोलते चुप हो जाती हो। कभी उधर से आवाज़ रुक जाती है। रुमाल निकाल उन आँसुओं को वहाँ से हटाता हूँ। चुपके से। कोई देख भी रहा हो, तब भी। सब जैसे रुक गए हों। हम दिल्ली उतर चुके हैं। ऑटो पकड़ घर आते हैं। तुम सूट में हो। उसी ललिया वाले सूट में। रंग अभी भी वही है। हाथ में नाखुनी भी वही। सैंडल की आवाज़ कानों के साथ नयी सी है। उसे सुनना किसी नयी आवाज़ को सुनने जैसा है। हम धीरे धीरे जीना चढ़ रहे हैं। आराम से दरवाज़ा खोलते हैं। अंदर दाखिल होते हैं। बाहर सब देख रहे हैं या नहीं। कह नहीं सकता। आदत तो देखने की ही है।

पोस्ट स्क्रिप्ट: 

{यहाँ से कब चले पता नहीं। सपना दिल्ली आ जाने तक है। उसके आगे नींद खुल गयी। पता नहीं वैसा ही लिख पाया हूँ या नहीं। ऐसे कई सपने हैं, जो दिमाग में घूमते रहे हैं। भूलता नहीं। उन्हे सिर्फ़ तुमसे कहता हूँ। कई लिखे हैं। कई ऐसे ही अनलिखे घूमते रहे हैं।

पता है यह डायरी में कब लिखा है? वहाँ नीचे तारीख़ पड़ी है, सोलह अक्टूबर। रात आठ बजकर छप्पन मिनट। पता नहीं कैसा-कैसा होता गया था। जो मन में आता गया, रोका नहीं। और आज जब यहाँ ब्लॉग पर इसकी ड्राफ़्टिंग कर रहा हूँ तो दिन है सोमवार। तारीख़ पच्चीस नवम्बर। बारह बजने में दस मिनट। कुछ देर बाद दिन बदल जाएगा। और शाम तुम्हें फ़ोन कर बताऊँगा। के रात क्या लिखा।

बस के अंदर की हमारी तस्वीर जो है भी वह इतनी साफ़ नहीं है। इसलिए यह लगायी है। सागर किनारे। सपने के सच में साथ गुज़रते हुए। मन तो अभी पोस्ट करने का हो रहा है। उस दिन की तारीख़ भी नहीं पता। पर वादा उसी दिन का है। उस दिन तक इंतज़ार..}

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