जून 12, 2014

सपनों के साथ, सपनों के लिए, हमेशा

असल में हम सब सपनों में जीने वाले लोग हैं। हमारी ज़िन्दगी ऐसा नहीं है, ख़ूबसूरत नहीं है। ये भी नहीं के उसमे रंग कुछ कम हैं। चटकीले फिरोज़ी से लेकर दुधिया नीले तक। कोमलतम स्पर्शों की छुअन दिल में मौके बे-मौके धड़कन की तरह झिलमिलाती रहती हैं। आवाज़ें भी जेब भर-भर हैं। दूर से कहीं वापस जाकर आती रेलगाड़ी के डिब्बों के कदमताल जैसे। उनमे बैठे सैकड़ों लोगों की साँसों का नाद असाध्य वीणा का अनसुना राग बन जाती है। उनके मुँह से उतने ही तरह की सैकड़ों बार निकलती गंध। कान से लेकर कनअँखियों तक सब बिलकुल वैसा ही है, जैसे उसे होना था। करीने से। एकदम जगह पर। घास का वो तिनका उतना ही हरा है, जितना वह अपने जन्म के वक़्त से है। मुस्कुराता। खिलखिलाता सा।

इन सपनीली जगहों में कहीं वह भी जगह है, जो ओस की बूँद की तरह है। हमारे सपने ओस की बूँदों में तब्दील हो गए हैं। और हम ख़ुद किसी पेड़ पर उल्टे लटके चमगादड़ों की तरह उसे देखते रहने के लिए जैसे अभिशप्त हैं। उसकी दुनिया में उस बूँद का क्या काम? ख़ुद हम उल्टे लटके लोगों का क्या काम? फ़िर भी हम वहीं हैं। किसी दूसरे की बेमियादी सजा काटते। वहीं सीलन की कोठरियों में घुटते। हवा को तरसते, कभी सदियों पहले खुली खिड़की की तरफ़ ताकते। काला पानी से कभी न लौटते देख हम थोड़े आहिस्ते से सब कुछ देख रहे हैं। घुट रहे हैं। तिल-तिल कम साँस ले रहे हैं। अक्सर हम अपनी आँखों से ख़ुद को सबसे कम देखते हैं। पर इधर सबसे जादा हमारी आँखें हमारी तरफ़ ही हैं। अंदर से किसी ज़िंदा सपने को ढूँढती। टटोलती। तलाशी लेती।

हम इस वक़्त सबसे बेतरतीब जगह पर हैं। कहते हैं, सपनों के बीच इंटरवल नहीं होते। यह कभी बीच में रुकते नहीं हैं। तब क्यों हमारे सपने इतने रुक-रुक कर आ रहे हैं। इनके ऐसे होने की टीस एड़ी की हड्डी में जीना उतरते वक़्त लग गयी चोट की तरह है। एक कदम बढ़ा नहीं के दर्द रहने नहीं देता। यह रिस-रिस कर दिल के कोनों में नहीं पहुँचता। अगर कहीं कोई उन धड़कनों को सुन भी रहा होता है, तब भी लौट कर आवाज़ नहीं देता। शायद उसके सपने भी कहीं सफ़ेदे के पेड़ में पतंग की डोर की तरह अरझ गए होंगे। या उन भारी-भरकम पहियों के नीचे आकार पाँच रुपये के चपटे सिक्के की तरह पहचाने जाने लायक कोई भी निशानी नहीं छोड़ गए होंगे। वह बस उन्हे देख कहीं पीछे रुक-सी गयी होगी। कोई याद। कहीं किसी अलगनी पर टंगी रह गयी पोटली के जैसे। 

कभी एक जन कह भी गए हैं, सबसे ख़तरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना। और मुझे पता है तुम इन पंक्तियों को दिन में कितनी बार अंदर-ही-अंदर दोहराते रहे हो। रोज़। हर बीतते पल। हर क्षण। उन आती जाती साँसों से भी जादा। उस सुबह अचानक तुम्हारे फ़ोन पर टूटने की आवाज़, कहीं से भी सोने के सिक्कों के खनकने की तरह नहीं लगी। लगा कितने सारे सपने, एक के अंदर एक बनते-बनते बैठे रहे हैं। सपने, उस बाहरी खोल की तरह दिखने वाले कछुए के अंदर, लीची की मिठास की तरह कोमलतम अनुभूतियाँ स्पंदित हो रही हैं। आम की कल्ली से रस शहद की बूँदों की तरह टपक रहा है। उनका स्वाद न मालुम गाय के घी में बदल गया है। थोड़ी देर में वह चूल्हे से उतरे छाछ के भगोने में समा जाएगा। मधुमखियाँ उसके चारो तरफ़ नाचने लगेंगी। भँवरे वहीं मँडराने लगेंगे। सूरजमुखी का फ़ूल भी अमलतास की या गुलमोहर की तरह ऊपर की डाड़ में हिलोरे खाने को हो आएगा। वहीं कहीं उस टेढ़ी पुलिहा पर टोलियों में घूमते बच्चे, उस बहती साफ़ पानी की नदी में बारी-बारी अनगिन बार छपाक-छपाक कूदते हुए, तुम्हारे सपनों में खो जाएँगे। वहीं तैरते-तैरते वे सब भी अपनी सपनीली दुनिया बनाने लगेंगे। तुम्हारी तरह। हमारी तरह। हम सबकी तरह। जैसे हम किसी दूसरों के सपनों में आ जा रहे होते हैं। बताए। बिन बताए। कहे अनकहे। बे-नागा।

सच कहूँ मेरे पास, मेरी जेब में, या मेरी बगल में कहीं दबे हुए, कोई जादुई शब्द नहीं हैं। जो हैं, वह यहीं हैं। सबके सामने। कुछ भी छिपा नहीं है। हो सकता है, इन्हे पढ़ने के बाद से तुम फ़िर किसी नयी सपनीली दुनिया की तरफ़ जा सको। हम फ़िर कुछ और नए सपने देखती आँखों में डूब जाएँ। उन्हे पार करने की चाह से एक बार फ़िर भर जाएँ। तुम्हें पता है, वह आँखें हमारी ही हैं। जो बिलकुल हमारे सपनों की ही तरह किसी जादू से नहीं बनी होती। हम उन्हे अपने एहसासों की चिकनी मिट्टी से चाक पर रख देते हैं। हिम्मत से आहिस्ते-आहिस्ते दिल की धड़कनों के सहारे उन्हे हाथों से बुनते हैं। यह सच है, हमने आज तक कभी कोई रेशम की साड़ी नहीं बुनी, पर करीने से एक-एक धागा लिए अपने सपने बुनते हैं। इस धागे के लिए हम किसी शहतूत के पेड़ से वो रेशम के कीड़े नहीं पकड़ते। हम उन्हे अपनी नसों में बह रहे ख़ून से बने धागों से बुन रहे होते हैं।

और हम सब फ़िर चाहते हैं, तुम सपने फ़िर से बुनो। आहिस्ते से उस सपनीली नींद में जाकर फ़िर लौटो। सुकून से कभी सोचना, क्या तुम वही हो, जो दिल्ली आए थे। या वो जो दिल्ली छोड़ रहे थे। जाना किसी शाम उस ठंडे नीम के नीचे। वहीं नीरसता की कुर्सी को छोड़ आना। गर्दन उठा चुपके से ऊपर देखना, तुम्हारे सपने भी जंगली जलेबी की तरह वहीं किसी टहनी पर झूल रहे होंगे। अपने मनपसंद सपने साथ लेते आना। मेरे लिए भी आम की ख़ुशबू वाले। पानी के रंग जैसे। और इन ख़त्म होती पंक्तियों से पहले यही कहूँगा दोस्त, शादी की इस सालगिरह पर एकबार तुम दोनों फ़िर से कहो, सपनों के साथ, सपनों के लिए। हमेशा।

और अगली बार जब भी फ़ोन करना, तो बताना ज़रूर, दिल्ली कब पहुँच रहे हो..?? इंतज़ार रहेगा। 

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