जून 18, 2014

हम ऐसे ही हैं बेकाम

ये दिल्ली की गर्मी है या एबस्टस की छत पर लगे पंखे के न चलने की वजह से है। जहाँ बैठा हूँ, वहाँ हथेली की तरफ़ से पसीना मेज़ पर लगातार बह रहा है। दिमाग एक दम सुन्न-सा वहीं पड़ा बस सोच रहा है। लग रहा है, सब भागते-भागते इतनी तेज़ी से चलकर वहाँ जा पहुँचा है, जहाँ से वह सब हमें देख नहीं पा रहे। हम भी चींटी की तरह हो गए हैं, किसी भी पैर के नीचे आकर कुचल जाने वाले। वहीं कहीं जेब में कुछ मुड़े कागज़ भी हैं, उनमे कुछ लिखा है। शायद अख़बार का टुकड़ा है। रोज़गार समाचार का। तारीख़ पता नहीं। पर उसमे से कोई भी नौकरी हमारे लायक नहीं है। शायद इसे इस तरह से लिखा जाना चाहिए के हम वहाँ छपी किसी भी नौकरी के लायक नहीं हैं। हम तो चींटी हैं न! हमें नौकरी की क्या ज़रूरत? हम तो बस ऐसे ही ज़िंदा रह लेंगे।

यह किसी भी तरह का रोना नहीं है। हम किसी की शोक सभा में नहीं बैठे हैं। आँसू कहीं पलकों में फँसे नहीं रह गए हैं। तुम कह रहे थे, सब बह गए हैं। जो हैं भी, वह उन्ही की याद में कभी-कभी लौट आते हैं। बिन मर्ज़ी। कभी भी।

जो भी यहाँ लिखा है, उससे जादा उसके पीछे छिपा है। कहने को नहीं होता। होने का मन हो, तो भी नहीं कह सकता। कह देने से क्या होगा? कहीं से कोई अपॉइंटमेंट लेटर नहीं आने वाला। फ़िर कभी-कभी यह भी लगता है ये नौकरी होना इतना ज़रूरी क्यों है? मेरे लगने से क्या होगा? जो है वो है। सब चाहते हैं, तुम्हें एक दिन ऐसा हो जाना चाहिए। और हमारे मामलों में यह ‘एक दिन’ पीछे कितने दिनों से स्थगित है, कोई हिसाब नहीं। अब तो बस खीज होती है। यह अब छिपाये नहीं छिपती। इस तरह से हम ने एक काम किया है कि उन सब जगहों से ख़ुद को छिपा लेने का निर्णय ले लिया है। यह सुचिंतित है या अवचेतन की उपस्थिति कह नहीं सकता। मतलब कि ख़ुद को समेट किसी ऐसी जगह पड़े रहने की दीर्घ कार्ययोजना का हिस्सा जो हमें उन सब जगहों से एकमुश्त गायब रखेगा जहाँ इस तरह की कोई भी संभावित आशंका से हम ख़ुद को घिरा पाते हैं।

हम सब कितने झूठे हो गए हैं। पर सच हमने चाहा नहीं था, ऐसे हो जाएँ। के किसी दोस्त की फ़ेसबुक पर नौकरी लगने वाली पोस्ट पर अनमने ढंग से बधाई देते रहें। कोई थायलैंड से घूम कर लौटे और अपनी तस्वीरें दिखाये तो हम काटो तो ख़ून न निकले वाले स्थिति में पहुँच जाएँ। हममें क्या वह क़ाबिलियत नहीं है? या हम उनकी तरह मौक़ों को भुना नहीं पा रहे? कमी कहाँ रह गयी है? या इन सबको छोड़कर इस तरफ़ यह सवाल ख़ुद से पूछने का वक़्त है कि कभी कोशिश भी की है? यह ऐसी चादर है जिसमें छेद पता नहीं कब होगा। किसी दरीचे से वो सूरज हमारे आँगन में कील पर कब टंग जाएगा? उसकी रौशनी में अपने चेहरे देख पाएंगे?

यह बहुत आत्मकेंद्रित सी इच्छा है। थोड़े से स्वार्थी हो जाने की तरह। सब पहले अपने लिए सोचते हैं। फ़िर जब कुछ खाली वक़्त मिलता है तो अपने से बाहर भी देख लेते होंगे। चूँकि हम अभी बाहर हैं इसलिए उस तरफ़ से देख रहे हैं। हमारे सवालों का छद्म उन्हे इसी तरह भेदता है। फ़िर कुछ हफ़्तों बाद एक दिन ऐसा आएगा जब हम उस तरफ़ होंगे और कोई ऐसे ही परेशान टूट रहा कोई हमारी तरफ़ उँगली उठा कर कुछ पूछ रहा होगा। तब हम आज की तरह इन लोगों के जैसे कुछ संवेदनाओं सहानुभूति का स्राव कर अपने हिस्से की सहभागिता दिखाकर अपने खोलों में चले जाएँगे। पर सच यह है कि आज के हिस्से शाम पाँच बज रहे हैं और इस वक़्त हमारे पास महीने के ख़त्म होते-होते एकमुशत रकम आने का कोई स्रोत नहीं हैं। हम डरते हैं कि एक दिन ऐसा न हो जब हमारे कपड़ों से जेब कहीं गायब हो जाये। दर्ज़ी बनाना ही भूल जाये। हमारी ज़ेबें और यह नौकरी होने और न होने वाली विभाजक रेखा किसी भी तरह सौम्य, शालीन और हार्दिक नहीं रहने देती। भले सतह पर यही तैर रहे हों पर कोई अंदर उतर कर नहीं देखता..!!

{ आगे की बात ..}

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