जून 19, 2014

लिखने की बात

पीछे से बाक़ी ..

लिखने का मन कल रात था। पर लिख नहीं पाया। सो गया। थका था। अभी भी इतना ख़राब लिखकर नीचे से आया, तब से सोच रहा हूँ, ऐसा क्या है, जो उसमें कम है? वहाँ क्या कह दिया, जिसके लिए वहाँ जगह नहीं थी। पता है हम लोग हार रहे हैं। हारे हुए लोग हैं। कभी-कभी ख़ुद को बचाने के चक्कर में उन स्थितियों से बचते रहते हैं। उनका सामना नहीं करते। टाल जाते हैं। टालना, उस घुटन से बचने का सबसे बढ़िया तरीका है, जो हमने अब तक ढूँढा है। आगे कोई और युक्ति मिलते ही उसका परीक्षण शुरू कर देंगे। पर यह सवाल पूछने लायक है कि इन बीतते सालों में हम कब से इस तरह बनते रहे हैं। यह सारे दबाव हमने अंदर से महसूस किए हैं या उन्हे किन्ही बाहरी दबावों कि तरह लेते लेते अब असहनीय पीड़ा की तरफ़ ढ़केले जा चुके हैं। वहाँ जो भी बातें हैं वह बड़ी स्थूल हैं। इनमें सूक्ष्मता न के बराबर है। बारीक होने से बच रहा हूँ जैसे। कि कोई देख नहीं पाएगा। पर ऐसा होना अच्छा नहीं लगता।

इधर यह भी महसूस हो रहा है कि अर्द्धविराम का इस्तेमाल कुछ जादा कर रहा हूँ। करने लगा हूँ। पहले मेरे यहाँ यह काम पूर्णविराम करते थे। यह अपने आप है या सायास? पर पता है इसका एक मतलब क्या है? शायद यह कि मेरे वाक्य किसी भी तरह की जटिलता से बचे रहे। नहीं शायद यह नहीं। शायद ये के वहाँ कही हर बात को समझने की जिस दक्षता की माँग वह पंक्तियाँ करती हैं, वह उन्हे पढ़ने वालों में कुछ कम है। या एक अर्थ यह भी हो सकता है कि इस तरह मैं अपनी हर बात को उनके दिमाग से होता हुआ दिल के करीब ले जाना चाहता होऊंगा, जहाँ पहुँचकर वह उनके ख़ून में घुल जाएँ। यह कोई जादा बड़ी इच्छा नहीं है। वहाँ जैसा भी लिखा है, उसकी कई परतें, वहीं जाकर अपनी व्याप्ति में अर्थ को प्राप्त होंगी। उसके बिन यहाँ कुछ भी पढ़ना, सिर्फ़ पढ़ना है।

फ़िर यह भी लगने लगा है कि मोहन राकेश की डायरी से जो ‘के’ लेता आया था, उसकी जगह इन दिनों छोटी ‘कि’ का प्रयोग करने लगा हूँ। पता नहीं अवचेतन में इसके क्या मानी होंगे? ख़ैर। जादा बोझिल तो नहीं हो रहा? क्या करूँ, दिन ही कुछ ऐसे हैं। हरामज़ादे क़िस्म के। कुत्ते साले। अपने मन की कर रहे हैं। हमारी सुनते ही नहीं हैं। दिमाग गरम नहीं है। ये ऊपर वाला कमरा तप रहा है। यहाँ का छत पंखा भी ख़राब है। न मालुम कब से। एकबार ठीक करवा रहे थे, तो पता चला, फुंक गया है। तब से ऐसे ही लटका है, सर के ऊपर। बिन घूमे। डेढ़ खिड़की खुली हैं, एक दरवाज़ा खोल रखा है। पर सब बेकार। किसी काम का नहीं। मेरी तरह। 

अभी जब ऊपर आया तो यही सोचा था, कागज़ पर लिखुंगा। पर नहीं। डायरी उठाई भी तो हाथ के पसीने से कागज़ भीगने लगा। एक लाइन के बाद ही बंद। यहाँ लिखने का मन बाद में बना। बनते बनते बना। 

सोच रहा हूँ, बहुत कुछ लिखना है। अभी लखनऊ गया था। कुछ नोटिंग की हैं। वहाँ भी मेट्रो की आहट है। इधर साल भर बाद बस में घूमने निकला तो लगा दिल्ली ज़रूरत से जादा तेज़ चल रही है। हम अभी भी उसी दिल्ली को दिल में बिठाये रखे हैं। पढ़ना फ़िर से शुरू करना है। पर जेब की हैसियत कुछ बढ़ानी होगी। या यही एक बहाना बने कि हम भी नेट पर मैगज़ीने पढ़ने की आदत बना लें। ‘कथादेश’ अपना सफ़र जारी रखने के लिए पाठकों से अपील कर रही है। सच अगर मेरी जब में भी रुपये होते तो कबका संरक्षक सदस्य बन चुका होता। पर जैसे नौकरी वैसे पैसा। दोनों गधे के सिर पर सींग जैसे गायब। अमरकान्त की दो कहानियों पर भी उधेड़ बुन चल रही है। पुरानी हैं। नयी नहीं। इसपर बाद में। स्वाद पर भी कुछ कहना है। ज़मीन से जोड़कर। एक कैंटीन से शुरू करेंगे। अभी नहीं। रुक कर। ये बारिश बीच में हुई पर लगता है अभी केरला में आलोक के पास ही है।

और भी बहुत सी बातें हैं। पर ‘पब्लिक डोमेन’ में कहना नहीं चाहता। यह वो जगह नहीं है। कुछ पर्दे दारियाँ यहाँ भी ज़रूरी लगने लगती हैं। और हैं। सच में लिखने का बिलकुल भी मन नहीं हो रहा। लिखे भी तो किसके लिए? कौन पढ़ रहा है? पढ़ भी रहा है तो पता तो चलता नहीं। फ़िर वो दो भी तो गायब हैं। वो तो देवघर चली गयी होगी। और वो बीच में दोबार आया भी है। एकबार तो आज ही सुबह। साथी नहीं होते तो मन भी नहीं करता। इसलिए तो मैं थोड़ा बहुत लिख रहा हूँ के अगर उनका भी मन मेरी तरह कर रहा हो तो क्या पता मुझे यहाँ देख लिखने का उनका भी मन कर जाये। तुम्हें नाम की क्या ज़रूरत? तुम्हें तो पता है, तुम कौन हो? 

लगता है, बात भटक गयी। कुछ फ़िर कहीं रह गईं। बाद में। कभी और।

4 टिप्‍पणियां:

  1. एक बार अनुराग के सौजन्य से पढ़ा था, उसकी वाल या फिर ट्विटर पर बहुत अच्छे कोट्स मिलते हैं अक्सर।
    I can't write without a reader. It's precisely like a kiss—you can't do it alone.
    - John Cheever

    ---
    तुम्हारे ब्लोग पर अक्सर का आना जाना है। बहुत कुछ पढ़ती रहती हूँ। आज बस उपस्थिति दर्ज करा रही हूँ कि कभी कभी कहना भी जरूरी होता है। लिखने के बारे में मेरा तो ये हाल है कि सारा कुछ लिखा हुआ सिर्फ चिट़्ठी होता है। हम अपनेआप को फुसला रहे होते हैं कि हम किसी पाठक के लिये लिख रहे हैं, ऐसा पाठक जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते। असलियत ये होती है कि लिखना सिर्फ एक शख्स के लिये होता है। एक सिर्फ उस के लिये। हर लिखे का पाठक सिर्फ वो एक होता है। जरूरी नहीं है कि वो कभी उस लिखे को पढ़े, लेकिन लिखा उसको ही लक्षित करके जाता है। हर बार ये अलग होता है। ये स्वान्त: सुखाय: भी इसलिये हो पाता है कि हम अपने मन में आलरेडी उसकी प्रतिक्रिया भी इमैजिन कर चुके होते हैं।

    बहरहाल, लिखते रहो। मुझे भी कई बार लगता है कि कौन पढ़ रहा है, फिर लगता है कि जिसके लिये लिखा है शायद वो कभी ना पढ़े, तो फिर बाकी किसी के भी पढ़ लेने से क्या फर्क पड़ता है। बहुत सारा कुछ जाने क्या कह गयी।

    लिखा करो। इतना सोचो मत।


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    उत्तर
    1. कभी-कभी मन जब कई तरफ़ों से घिर जाता है तब पता नहीं कैसा हो जाता है। सोचने का मन नहीं होता फ़िर भी ख़याल आने लगते हैं। लगता है सबसे जादा हम अपने लिए लिख रहे होते हैं। अपने खाली अन्तः स्वासों को भरने के लिए। उन कोनो अंतरों को समेटकर रख लेने का मन करता है। यह उसी का एक कोना है।

      ऐसी हालत में हो जाता हूँ, जहाँ लिखने का कोई मतलब नहीं रह जाता। फ़िर भी कह देता हूँ। एक तरह का ढीठ होता गया हूँ। जिसे कहते हैं न बेगैरत होना। बिलकुल वैसे। किसी और काम के लायक तो बचे नहीं, तो यही सही। फ़िर लगता है यह सबसे जादा अकर्मक क्रिया है।

      बहरहाल, इन सारे दाँव पेंचों के दरमियान लिखना इन सारी उठापटकों कों को समेटे रहेगा। और तुम ऐसे ही पीछे से आती रहना। कभी कभी बता दिया करना।

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  2. उत्तर
    1. कोशिश जारी है।

      थोड़ी मदद आप भी कर देते तो और आसान होता।

      हटाएं

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