जून 20, 2014

दिल्ली मेरा शहर

दिल्ली, मेरा शहर। बीते शनिवार से इस भाववाचक संज्ञा को कितनी ही बार अंदर-ही-अंदर दोहरा रहा हूँ, पता नहीं। कितनी ही यादें बेतरतीब हुई जा रही हैं। आगे पीछे। ऊपर नीचे। इसमें ऐसा कुछ है जो बैठने नहीं दे रहा। हर वक़्त लग रहा है कुछ छूट रहा है। कुछ पीछे रह गया है। शायद डीटीसी बस की पीछे वाली सीट। या वो नेहरू प्लेस जाती एम तेरह। पुराने कंक्रीट से बने बस स्टेंड। आईटीओ की रेड लाइट। पहाड़गंज का सोमवार बाज़ार। संगतराशन गली। चूना मंडी। रामलीला मैदान। पटेल चेस्ट। मुनीरका। खान मार्केट। लोधी कॉलोनी। कोटला। गीता कॉलोनी। लक्ष्मी नगर। शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन। भोगल। आज़ादपुर। 

पता नहीं कितने ही और नाम इन दिनों दिमाग में लगातार घूमने लगे हैं। पूरी एक लिस्ट है। कभी न ख़त्म होने वाली। लेकिन अगले ही पल लगता है, शहरों से भी पहचान समय-समय पर रिन्यू करवानी पड़ती है। नहीं तो चेहरे पहचान में नहीं आते। यहाँ हमें लगता है, हम नहीं रुकते। पर असल में यह शहर है, जो कभी नहीं रुकता। वह न रुकने के लिए ही बनाए गए हैं। जबकि हम रोज़ थक जाते हैं। हमारे घुटने, पीठ की तरह दर्द करने लगते हैं। कोई मूव, कोई बाम उस दर्द को ठीक नहीं कर पाएगा। फ़िर एक दिन ऐसा आएगा, जब लगने लगेगा, हम कहीं ठहरे रह गए हैं। और शहर हमसे हमारे अंदर से निकलकर, कहीं दूर खड़ा है। इसबार भी वह किसी का इंतज़ार नहीं कर रहा। वह तो बस उसे देखने वाले को ऐसा लगता रहेगा। के शहर उसके इंतेज़ार में है।

यही सबसे बड़ा धोखा है, जो वह हम सबके साथ बड़ी सफ़ाई के साथ करता है। जिसे हम समझ भी नहीं पाते। यह शहर का जादू है जो सर चढ़ कर बोलता है। इसमे यह भी याद नहीं कब गोविंदपुरी, गली नंबर तेरह, मुकेश के यहाँ जाना हुआ था। उसने वह कमरा कब छोड़ा? शायद नीरज के मुनीरका छोड़ने के पहले? या बाद में? ठीक से कहना मुश्किल है। मुकेश पहले साहिबाबाद गाँव गया, उसके बाद भोपाल। वहाँ से दोबारा दिल्ली कब आया और अब भी लखनऊ में है, पता नहीं? दोस्त ऐसे ही शहर भर में छिटके रहते। जिन बहानों से हम उन सड़कों-गलियाँ को छान मारते, उनके वहाँ से गायब हो जाने के बाद, वह जगहें भी हमारे लिए वैसे ही गायब होती रहीं। जैसे एक दिन अचानक छह सौ चार नंबर बस संगम सिनेमा के आगे से गुज़रती है, तो हैरानी से भर जाता हूँ कि उस जगह अपनी पुरानी वाली इमारत नहीं है। वहाँ पीवीआर का बैनर लगा है। कमिंग सून। दिस नवंबर। 

एक झटके से मेरी याद के वह सारे पन्ने बिखर जाते हैं, जिसमें उसकी छवि बनी हुई थी। अब वहाँ वह कभी नहीं होगी। होगी सिर्फ़ उसकी याद। धीरे-धीरे वह भी मेरी आँखों की तरह धुँधलाती जाएगी। हो सकता है अपना यह अनुभव शायद ही कभी किसी से कह पाऊँ। कि अचानक किसी परिचित की जगह उन सबको देख कैसे भावों से भरता गया। वह भावुक क्षण नहीं थे। किसी परिचित के चले जाने के बाद की खाली जगह जैसे थे। उसे कभी भरा नहीं जा सकता। वह हमेशा ऐसी ही बनी रहेंगी। बस अलविदा न कह पाने की टीस अंदर ख़ून की तरह रिसती रहेगी। कुछ बातें हमेशा के लिए रह गईं। जो कभी शुरू भी हुई होंगी, वह अब पता नहीं कहाँ हैं?

फ़िर एक-एक कर वह सारे दृश्य आँखों के सामने से गुज़र जाते हैं, जहाँ से अभी बस होती हुई आई है। संसद भवन आज भी वहीं हैं। उसके पास वाला फव्वारा आजतक एक कदम भी नहीं खिसका। इंडिया गेट भी दूर खड़ा सब देख रहा है। वह एम्बेसी वाला पूरा इलाका वैसा का वैसा है। अमलतास के पेड़ों की पूरी लड़ी वहीं खिलखिला रही है। इन सारी बातों को अगर एक साथ जोड़ दूँ तो क्या हासिल होता है? कुछ काम की बात निकलती है भी या नहीं? जो अव्यव इन सभी गिनाई गयी जगहों में समान रूप से व्याप्त है, वह यह कि इनके रूप को यथासंभव वैसे का वैसा रहने दिया गया है। बल्कि यह कहना जादा मुफ़ीद होगा कि इनमे आमूलचुल रूप से कोई भी बदलाव होने नहीं दिया गया है। पर क्यों? कई जवाब इतने आसान नहीं होते। या शायद हो सकता है हमारी यादों और उनकी यादों के वजन में कुछ फ़र्क है। हमारे पास जो लालकिला है, वह इनकी याद का हिस्सा जादा है। हमारे हिस्से की यादें कुछ हल्की हैं।

{यह पोस्ट आज 'जनसत्ता' में आई है। वहीं समांतर में। 'हमारे हिस्से की यादें '। वहाँ का लिंक पीछे भी है, आगे भी ..}

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