जून 21, 2014

तस्वीर में अब कोई नहीं बचा रह गया

बात तब की है जब फोटो खींचने वाले कैमरों से दोरंगी तस्वीरें ही निकला करती थी। हम तब पैदा भी नहीं हुए होंगे। पर अपने छुटपन से हम लकड़ी वाली अलमारी खोलते और बड़े आहिस्ते से एक एककर सारे एलबम निकाल लेते। धीरे-धीरे उन पुरानी यादों से अपनी पहचान बनाते। तब से लेकर आज तक कई सिर्फ़ उन तस्वीरों में ही रह गए हैं। इधर बाहर की दुनिया में कहीं नहीं हैं। पर इसतरह वह आज भी यहीं कहीं मौजूद हैं। हमारे पास ही। सिराहने। तकिये के नीचे। पास वाली मेज़ पर। किताब के अंदर पन्नों पर। दिल की किसी धड़कन में। जिनसे हम कहीं कभी नहीं मिले, उन्हे देख भर लेने से उन्हे जानने लगते हैं। थोड़ी कहानियाँ उनके साथ हरबार जुड़ती रहती। कब कहाँ यह तस्वीर उतारी गयी। कैसे यहाँ इसमें मौजूद लोग इकट्ठे हुए। कभी इन किस्सों को सुनाने वाले पापा होते, कभी मम्मी। पर हर बार इन किस्सों में कुछ और धागे उन्हे बुन रहे होते। कई और कड़ियाँ जुड़ रही होती हैं। एक से एक निकलती। एक से एक जुड़ती।

ऐसी ही एक फ़ोटो है। बीते इतवार, पंद्रह जून से बार-बार खींच रही है। पता नहीं, सच में भी वह कहीं बिलकुल वैसी ही है, जैसी अंदर दिख रही है या मन ने उसे ऐसे बना लिया है। हो सकता है उसने कहीं देखी होगी और उसने रख ली। वैसे ही। जेब के पास। वह जितनी भी जैसी भी याद है, उसमे ताजमहल है। ताजमहल वहीं पीछे खड़ा है। उसके आगे कई सारे लोग खड़े हैं। हमारी दादी भी हैं। बाबा के बगल। हम सबसे पहले दादी बाबा को पहचाते हैं। बाकी कौन हैं? यह बड़े होने के साथ पता चलता गया। सब ऐसे ही जहाँ हो पाये, खड़े हो गए। उन सबके कपड़ों में जादा रंग नहीं है। सादे हैं। पुरुषों ने कुर्ते के साथ पजामे पहन रखे हैं और स्त्रियों ने सूती धोतियाँ। सब इकट्ठे हैं। कैमरे के लेंस की तरफ़ देखते। पोज़ कोई नहीं। बस सीधे खड़े होने की तरह। उन सबका ऐसे ही कभी किसी जेठ के महीने में घूमने का मन किया होगा। अकेले नहीं सबके साथ। साथ से घूमना और मज़ेदार हो जाता है। आगरा गए रेलगाड़ी से ही होंगे। तख़्ती वाली सीटों पर बैठकर। कोयले वाले इंजन के साथ। उस धुएँ को उड़ते देखते हुए। आसमान में।

तो जो बात बार-बार खींचे जा रही है, उसका संबंध पापा की बड़की मामी से है। वह भी वहीं उन बड़के मामा के साथ वहीं खड़ी हैं, जो यहीं इसी दिल्ली में हमारे बचपन में गुम हो गए थे। फ़िर कभी नहीं मिले। कभी न मिलने के लिए ही तो लोग गुम होते हैं। कोई लौटकर थोड़े आता है। वह भी कभी नहीं आए। गुमशुदा तलाश केंद्र, नई कोतवाली वालों को भी नहीं मिले। मिली किसी थाने में उनके कुचले जाने की ख़बर। वो तस्वीर पचान में नहीं आ रही थी। पता नहीं मन बेतरह भाग रहा है। कहीं ठहर नहीं रहा। कितनी ही यादें हैं, जो खींच रही हैं। अपनी तरफ़। पर आज नहीं। हर बार मेरे साथ यही होता है। कहीं रुककर इत्मीनान से देख भी नहीं पाता। सब गड्डमड्ड होता रहा है। पर अभी नहीं। अभी बात को वापस लौटाकर बड़की मामी की तरफ़ ले जाता हूँ।

यह भी हमारी दादी लगीं। जब दिसम्बर में असोक चाचा के साथ दिल्ली आयीं, तो यह पहले की तरह आने जैसे नहीं लगा। जब भी हम इन्हे देखते पैर ज़रूर छूते। यह उस उमर के लिए उन जिये सालों में झेले उन अनुभवों के लिए होता, जो हमारे हिस्से नहीं कभी नहीं आए। न आ पाएंगे। हम इस क्षण के अलावा इनके इतने पास कभी नहीं हो पाते। पता नहीं, यह हमारे बारे में क्या सोचती होंगी। इन्होने कभी बताया नहीं। हम भी यह कभी पूछें, इसकी संभावना कभी नहीं लगती। इसबार जो सबसे अजीब बात लगी वह यह कि पहली बार हमने इनकी आँखों में हमसे बात करते चमक देखी। शायद उमर दराज़ आँखें हमेशा से ही ऐसे देखती होंगी। छोटी सी। काली-काली सी। पता नहीं क्यों मैं जाकर इनके बगल में बैठ गया था। न जाने क्या सोचकर? अचानक धीरे से कान के पास आकर बोलीं: अब कब अइयहो गिलउला? उतने ही धीरे से बोला, अप्रैल में। इसके बाद हमने कोई बात नहीं की। 

अभी पिछले साल मई में जब शादी में गया था, तब तो ऐसी कोई बात नहीं लग रही थी। इधर कुछ महीनों से इनके गले से कोई भी ठोस आहार नीचे नहीं जा रहा था। पान डली सुपारी अब बिलकुल बंद। खाना बंद। सिर्फ़ तरल पदार्थ। राम मनोहर लोहिया के डॉक्टरों ने गले का कैंसर बताया। कहा, ऑपरेशन करने में रिस्क है। इतनी बूढ़ी देह में अब जान कहाँ? एनेस्थीसिया तो दे देंगे, पर क्या पता वे कभी उठ ही न पायीं तब। पता नहीं उन्हे पता भी होगा कि नहीं। पर बुला रही थी। कहने लगी साथ चलो। यह चलना उनके हमेशा के लिए चले जाने के पहले साथ उनके घर चलना है। पता नहीं वो कौन सी याद रही होगी, जिसे वह हममें फ़िर से देख लेना चाहती होंगी? हमें कुछ बोलती नहीं थीं, पर हर साल हम मई-जून में जाते ज़रूर थे। जबतक कि छोटे थे। एक रात इनके यहाँ रुककर नानी के यहाँ। अब कई सालों से वहाँ कोई नहीं रह गया। इसलिए यहाँ जाना भी बंद सा था। कोई बहाना नहीं रह गया था, उसके घर का। वो अंगूर की बेल भी तो न मालुम कबकी वहाँ से गायब हो गयी। जिसे हमारी छोटी आँखें बड़े अचरज के साथ देखती। कभी उस पर अंगूर लगेंगे। तब आएंगे। पर हम कभी लौटकर देखने नहीं आए। सोचता हूँ क्या उन्होने कभी इंतज़ार किया होगा?

शुक्रवार जब फोन पर चाचा ने बताया, बस एक दो दिन की बात है। कब प्राण निकाल जाएँ, कह नहीं सकते। तो पता नहीं कैसा कैसा होता गया। मरने से पहले हम क्या सोचते होंगे। कितनी ही यादों में से किसके सिराहने लेते उसका इंतज़ार कर रहे होते हैं। क्या उन्हे अपनी अंतिम क्षणों के आने की आहट सुनाई दे गयी थी? या यह सब फ़िजूल की बातें हैं। सबको पता है, सब एक दिन मर जाएँगे। वे क्या सोच रही होंगी? अपने हाथ से बनाकर सबको खाना तो नहीं खिलाना चाहती होंगी? या हमारा इंतज़ार तो नहीं कर रही थी? अप्रैल में वहाँ जाना हुआ भी तो इनसे नहीं मिला। अब मिलना कभी नहीं होगा। कभी नहीं। और अब आज इस वक़्त उस तस्वीर में सिर्फ़ ताजमहल बचा है। बाकी सब गायब हो गए हैं। धीरे-धीरे सब चले गए। कुछ-कुछ चीज़ें छोड़ छोड़कर। और यहाँ लिखते-लिखते सिर्फ़ यही सोच रहा हूँ, अब उनका सरौता कहाँ होगा? उन बची रह गयी डलियों को कौन संभाले रखेगा? वो ऊपर वाला कमरा अब कैसा बन जाएगा। उनके होने के चिन्ह धीरे-धीरे वहाँ से मिटते जाएँगे। कुछ बचा भी रहेगा। शायद जो अपने आप बच जाये वो। इधर उनकी सबसे नयी याद में अस्पताल में कराये एक्स-रे यहाँ अलमारी पर रखे हैं। चूहों ने लिफ़ाफ़ा थोड़ा कुतर दिया है। बाकी सब साबुत है। साबुत है मेरे हिस्से की वो तस्वीर। कभी न मिटने वाली याद की तरह।

{यह तस्वीर, वह वाली तस्वीर नहीं है। असली तो अभी भी, उस लकड़ी वाली अलमारी में, सबसे ऊपर वाले ताखे पर रखे, किसी अल्बम में लगी होगी। बिलकुल वैसी ही। पीछे ताजमहल, और आगे सब। ये जो ऊपर है, वो तो 'नेशनल ज्योग्राफीक़ चैनल' की वैबसाइट से उड़ाई है। लिंक पीछे कभी मिला तो लगा दूंगा। }

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