जून 22, 2014

तुम्हारा यहाँ से जाना

किसी का शहर छोड़कर जाना कैसा है? हमेशा के लिए। कभी लौटकर वापस न आने के लिए। कई दोस्त हैं जो अब यहाँ नहीं हैं। सब बारी-बारी अपने सपनों को समेटकर यहाँ से चल दिये। जिन बक्सों में वह इन्हे भरकर लाये थे, उनमें क्या ले गए होंगे, पता नहीं। उन्होने किसी को भी नहीं बताया। शायद उन खाली बक्सों का वजन और बढ़ गया होगा। कहते हैं शहर सपनों के सच होने की जगह है। पर जो चले गए इन सबके क्यों नहीं हुए? पता नहीं। ऐसा नहीं है सब ऐसे ही खाली हाथ गए। पर जिनके सपने हक़ीक़त में नहीं बदलते, वह कभी लौटकर नहीं आते। लौटकर आएंगे भी कैसे? जिन जगहों, लोगों, वादों, इरादों, शरारतों में वह ज़िंदा रहे होंगे, उनकी टीस कैसी कर जाती होगी? घुटन भरी। असहनीय। त्रासद। फ़िर वैसा कुछ भी नहीं रहता। कुछ भी नहीं। सब बदल जाता है।

तुम दस जुलाई को जा रहे हो। हमेशा के लिए। किताबें बैग में ही भर लोगे। नहीं तो कार्टन देख सब पार्सल करने को कहेंगे। क्या करोगे वहाँ पहुँचकर? अभी कोई प्लान नहीं है। देखते हैं क्या होता है। मम्मी-पापा अकेले रह गए हैं। सारे भाई अपनी-अपनी दुनिया में सेटल हैं। बस तुम ही हो जो उनके साथ रह सकते हो। अभी कल चाँदनी चौक से तुमने अपनी माँ के लिए फिलिप्स का तीन सैल वाला रेडियो खरीदा है। और अब क्या दे सकता हूँ उसे? तुमने शायद यही कहा था। पापा चारों धाम की यात्रा पर हैं। छन्नुमल की धर्मशाला से उनकी यात्रा शुरू हुई है। जब तक तुम पहुँचोगे, वह भी आ चुके होंगे।

पता नहीं यह कैसा भाव है? जितने भी दिल के पास हैं, वह सब एक-एक कर यहाँ की रिहाइश को छोड़ ख़ुद को समेट रहे हैं। यह शायद हमारी उमर का बढ़ता दबाव है। जो यहाँ से जाने को मज़बूर कर रहा है। हम वह नहीं हो पाये, जो होने यहाँ आए थे। और कितने दिन किस कीमत पर वह इन छोटे-छोटे कमरों में और रह सकते थे, कह नहीं सकते। जितने भी जैसे भी संबंध यहाँ बने होंगे, उन्हे ऐसे ही रहने देने की कोशिश होगी। पर तुम अब ज़िन्दगी को नए सिरे से बुनने को होगे। पहले जैसा कुछ भी नहीं रहेगा। दिल्ली में कमरा रखे रहने का कोई मतलब नहीं। उस शाम जब तुम ट्रेन में बैठोगे, तो वापस आने के लिए नहीं बैठोगे। न कभी चाहकर उन जगहों पर वैसे मौजूद रह सकोगे। मेरे लिए भी यह शहर कुछ-कुछ बदल रहा होगा। अब कोई बहाना नहीं रहेगा परमानंद कॉलोनी जाने का। कभी जीटीबी मेट्रो स्टेशन उतरना नहीं होगा। वहाँ से रिक्शा पकड़ कभी ढक्का गाँव नहीं जाऊँगा। एक दिन आएगा चौहान बुक डिपो वाली गली को भी भूल जाऊँगा। कैसे किधर मुड़कर तुम्हारे कमरे तक पहुँच जाता।

इतना आसान नहीं होता नए सिरे से ख़ुद को उधेड़ना। यह उधेड़ने की तरह ही तो है। आज जब तुम्हारे बारे में लिखने बैठा हूँ, तब बार-बार एक ही बात पर अटक जाता हूँ। तुम कहते रहे, कभी मेरे बारे में लिखना, तो नाम मत देना। पता नहीं इस बात को दिमाग ने किस तरह से लिया है? वह तुम्हारे बारे में ‘विज़वलाइज़’ ही नहीं कर पा रहा। किस छवि को सामने रखकर देखूँ? इतना आसान थोड़े है लिखना। सच, तुमने कितना मुश्किल कर दिया है। पता नहीं तुमसे कितनी ही बार, कितनी ही बार कहता रहा हूँ। पर तुम लगता है उस घनीभूत संवेदना को ओढ़कर बचते रहे। तुम्हें लगता तुम कहीं गहरे न उतरकर सतह पर चलने वाले उच्छवासों में उलझकर तो नहीं रह जाओगे। यह तुम्हारा निर्णय है। तुम स्वतंत्र हो। उन क्षणों को स्थायी मानकर ही हम कुछ कह सकते हैं। प्रेम से विरक्त कोई भी रचना या कृति नहीं हो सकती। भले वह किसी भी रूप आकार संरचना में हमारे सामने आए। तुम्हारे अंदर भी कितनी ही कृतियाँ आकार लेती रही होंगी। पर तुम उन्हे बाहर नहीं लाये। बाहर लाते तो शायद हम भी उसे देख पाते।

अब जबकि तुम यहाँ से जा रहे हो, तुम्हारी ही एकबात कहकर ख़त्म करता हूँ, के भले ऊपर से तुम कितने खुले लगो, पर अंदर से उन परतों के साथ तुम्हारा दिल, उसमें कहीं बैठा अवचेतन, तुम्हें सहज नहीं रहने देता। शायद हम सब ऐसे ही होते हैं। जटिल। असहज। अस्पष्ट। वह हमारा ‘कम्फ़र्ट ज़ोन’ है। जहाँ हम अकेले ही उन स्थितियों से लड़ रहे होते हैं। जीतने के लिए नहीं, लड़ने के लिए। ऐसी कितनी ही लड़ाइयाँ तुम्हारे अंदर घटित होते देखी हैं। तुम्हारे उस कमरे पर। चाँदनी चौक मेट्रो स्टेशन के उन बेंचों पर। उस पार्क की घास पर। अपने कॉलेज की सीढ़ियों के आसपास। हिन्दी डिपार्टमेन्ट, आर्ट्स फ़ैकल्टि की मेहराबों के दरमियान। इन सबमे शायद सबसे बड़ा सवाल जो तुम अपने साथ लिए जा रहे हो, वह तुम्हारे ख़ून के अंदर घुल-सा गया लगता है। तुम्हें आज फ़िर कहूँगा, यह डायरी तुम्हें ज़रूर पढ़नी चाहिए। शायद इसके बाद ख़ुद को दोबारा जानने की शुरुवात फ़िर हो सके। यह उन दिनों में ताक़त देती है जहाँ हम सबसे जादा अकेले होते हैं। पता है तुम ख़ुद से बाहर आओगे एक दिन। उस दिन तुम अकेले नहीं रहोगे।

{अचानक 26 की रात देवेश से पता चला। परसो। कि इसका एक टुकड़ा 'दैनिक हिंदुस्तान' में आया है। पेज नंबर दस, संपादकीय। स्तम्भ साइबर संसार। वहाँ पढ़ने के लिए 'लिंक '.. }

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