जुलाई 11, 2014

इन दिनों..

वहीं हैं, जहाँ हम थे। यहीं अपनी दिल्ली में। कहीं गए नहीं हैं। जिसका अपना कोई मौसम नहीं। जिसकी जमा पूँजी अब सालभर गरमी ही रह गयी है। किसी काम लायक नहीं छोड़ती। अलसाए से दिन। उतनी ही बोझिल-सी रातें। बीच में शामें तपते सूरज से बचाती कम, उमस में लिपटे तौलिये जैसे निचोड़ती जादा हैं। बाल्टियों के पेचें खोलती गरम हवा। अभी छत से भाग आया हूँ। कागज़ पर मन नहीं किया। वहाँ रहता तो पंखा चलने नहीं लगता। फ़िर हाथ से रिसता पसीना डायरी भी गीला कर देता। उसके भीग जाने पर लिख भी नहीं पाता। वैसे, दिन जैसे बीत रहे हैं लिखने के क़ाबिल भी नहीं रहूँगा। सिर्फ़ इसके क़ाबिल था। अब शायद वो भी नहीं। धीरे-धीरे अंत की तरफ़।

तीन दिन पहले ड्राफ़्ट में इतना लिख छोड़ दिया था। आगे कह ही नहीं पाया।

तो मैं अभी भी यहीं हूँ। खिड़की के किनारे। काँच के शीशे लगे हैं। बाहर तपती छत उतनी ही गरम है, जितना अंदर बैठा मेरा दिमाग। इसके अलावे और कुछ नहीं होता पूरा दिन। पहले सूरज चढ़ता है। खोपड़ी के ऊपर तक। फ़िर धीरे-धीरे उतरना शुरू होता है। सिवाए इंतज़ार के यहाँ कुछ नहीं है। आसमान बिलकुल कोरा है। सफ़ेद सा। ज़रा सा नीलापन भी नहीं। न उसमें कहीं भूरा सा कोई टुकड़ा। बादलों की रूई अभी तक आई नहीं है। मन मार इस चलती गरम लू को मॉनसून की हवा मानने को होता भी हूँ, तो भी नहीं मान सकता। सारा वक़्त लगता रहता है, करने को जैसे कुछ नहीं है। पर मेज़ किताबों से अटी पड़ी है। कभी गिनी नहीं। पर ढेर में यही कुछ सत्तर-अस्सी किताबें तो निकल आएंगी। पर नहीं। पढ़ना बिलकुल नहीं है।

ऐसे ही एक शाम मन किया स्कैच बुक ले आया। फ़ोर बी से लेकर ऐट बी की पाँच-पाँच पेंसिलें। एक ‘नॉनडस्ट’ इरेज़र। एक शार्पनर। और तब से लेकर उसके पहले पन्ने पर उतरकर क्या आया? एक अधूरा खड़ा अजनबी-सा बिन टहनियों का पेड़। बगल में दो पहियों वाली टूटी-फूटी साइकिल। और बहुत बड़ा खाली-सा सपाट मैदान। जिसपर तब से टहलने भी नहीं निकला। सुबह यहीं सैर कर लिया करूँ? पर नहीं। यहीं उबासियाँ लेता, पसीने से तरबतर होता रहा हूँ। घड़े से पानी पीने नीचे भी नहीं जाता।

पीछे इतवार पसीने में भीगता दरियागंज हो आया। कमीज़ के अंदर चींटियों-सी रेंगती पसीने की बूंदें। रमेशचंद्र शाह की डायरी पर नज़र पड़ी। ‘अकेला मेला’ के बाद वाले खंड पर। ‘इस खिड़की से’। नाम शायद पहले का कभी याद रह गया होगा। पर जैसा सोचा था, सुना था, वैसी बिलकुल नहीं है। वहाँ मन नहीं है, बुद्धि है। खयाल नहीं, विचार हैं। दिल की परतें, मन की उलझनें सिरे से गायब हैं। छटपटाहटें नहीं हैं। किसी के छूट जाने की टीस नहीं है। कोई याद घूम घूमकर वापस नहीं आती। कोई गली, कोई चौराहा फ़िर-फ़िर नहीं टकराता। यह अंदर नहीं घूमती। बाहर घुमाती है। लगता अजीब-सी दिमागदारी उसके हर पन्ने को आरपार चीरती जा रही हो जैसे। ख़ून से रिसते भाव भी नहीं हैं। सब अजनबी सी बाते हैं। यह वह बेतरतीब टिप्पणियाँ हैं, जो अशोक वाजपेयी के ‘कभी-कभार’ की तरह, किसी अख़बार का हिस्सा कभी नहीं बन पायीं। कोई इन रंगे बेजान से पन्नों को कोई डायरी कैसे कह सकता है?

वहीं से एक शायर की किताब लेता आया। वारिस किरमानी की ‘घूमती नदी’। देवा शरीफ़ से शुरू होती। अभी पढ़ना शुरू नहीं किया है। ऐसे ही सिराहने रखे हुए हूँ। वहाँ घाघरा नदी में मिल जाती गोमती है। अवध की ख़ुशबू है। दसेहरी आम के जैसे महकते किस्से हैं। आज़ाद होते हिंदुस्तान की कहानी है। उसके बनने बिगड़ने का दर्द है। शायद असल किताब उर्दू में रही होगी। यह उसका तर्जुमा है।

कई दिनों से मन है सर को फ़ोन करूँ। पर हरबार सोचकर रह जाता हूँ। वक़्त भी थोड़ी देर रुककर सोचने नहीं देता। मन था केंद्रीय सचिवालय से मंडी हाउस तक बढ़ गयी मेट्रो देख आऊँ। एनएसडी की तरफ़ नया गेट खुल गया है। फ़िर सोचता हूँ एक शाम क्नॉट प्लेस, सरवन भवन जाकर डोसा खाकर आया जाये। तब शायद कुछ ‘मूड’ बने। इसके अलावा अपने हिस्से कुछ नहीं है। इस गर्मी में बहुत-सी पोस्टों को या तो लू लग गयी या उनके ‘नोट्स’ ‘ड्राफ़्ट’ में रह गए। कुछ दो तीन हिस्से किसी ‘रजिस्टर’ में दर्ज़ कहीं बंद पड़े हैं। कभी मन उनको लिखते वक़्त जैसा होगा, तो लौट पड़ेंगे। पर अभी तो कोई उम्मीद नहीं दिखती। कोई चांस नहीं है। जैसे बरसाती हवाएँ पीछे खिसकती रही हैं, वैसे हम भी खिसकते रहेंगे। और अभी जैसे हालात हैं, उनमें हमारा चुप रहना ही ठीक हैं। पर पता है, एक दिन चुप्पी टूटेगी ज़रूर। चुप रहना, छिपे रहना मेरे बस की बात नहीं। कभी तो कुछ कहूँगा।

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को ब्लॉग बुलेटिन की आज कि बुलेटिन प्राण साहब जी की पहली पुण्यतिथि और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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    1. तुमने लिंक लगाया, शुक्रिया।

      पर ये कमेंट में लिंक कैसे बनाते हैं? यह भी बताते चलते अच्छा रहता। हम तो थक गए, पर अभी तक समझ नहीं पाये। हर बार उलझ जाते हैं।

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  2. उत्तर
    1. :)

      इस स्माइली में छिपी मुस्कान ही नहीं, चेहरा भी मेरा है।

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  3. मुकेश सुना बहुत सालों बाद जैसे वाह साधुवाद :)

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    1. थोड़ा और विस्तार से आप कहते तो समझ में आ जाता। ख़ैर, ..

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  4. इतना तो कहा , और कहेंगे वह भी सुनेंगे !!
    आत्मकथ्य सा लेखन भी कहता सुनता रहता है !!

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    1. कभी वह ख़ुद से कहता है, कभी वह ख़ुद से सुनता है !!
      कुछ-कुछ ऐसा सुनाई दे रहा है, शायद आप यही कह रही हैं !!

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