जुलाई 31, 2014

मुर्दहिया: एक ज़िन्दगी की याद

गाँधी जयंती के ठीक एक दिन बाद। साल दो हज़ार बारह। राजकमल, दरियागंज जाकर कई किताबें साथ ले आया। उसी में एक किताब थी डॉ. तुलसी राम की ‘मुर्दहिया’। किताबें इत्मीनान माँगती हैं। थोड़ा रुककर साथ चलने का धैर्य। आहिस्ते से आमने सामने बैठने का खालीपन। मुड़कर वापस लौट आने की हिम्मत। किताब जब जिन्दगी की साँसों से बनी हो तब फ़िक्रमंद आँखें चाहती है। वैसे भी ख़ुद को मैं कभी  राकेश की तरह कहीं भी बीच से पढ़ डालने वाले कौशल से संपन्न नहीं पाता। इसलिए मन ऐसी किताबें ढूँढ़ रहा है, जिन्हे कहीं से भी शुरू करने पर वह शुरू हो जाएँ। किताब जो किसी बंधन की तरह न लगे। जो मुक्त करे। प्रमोद सिंह की ‘अजाने मेले में’ वह हो सकती है। जैसे राजेश जोशी की ‘किस्सा कोताह’।

बहरहाल। उस सुबह तय वक़्त से पहले न अरुण आता, और न मैं उसे ‘मुर्दहिया’ पढ़ने की बात कहकर नीचे नहाने जाता। शायद किताब छूटने का कोई डर उसे नहीं था। ज़रा सी देर में पच्चीस पन्ने पढ़ गया। यह उसके कई बार देखे आजमगढ़ की बात थी। जहाँ तुलसीराम अपनी पाँचवी तक की पढ़ाई पूरी करते हैं वह शेरपुर कुटी। टंडवा के परभु चौबे। चिरैयाकोट थाना।

सब उसे कितने पास लगने लगा। लगा धरमपुर कहीं सामने ही है। कुछ भी इधर से उधर नहीं हुआ। सब वहीं हैं। जिसे अपनी यादों में वह अभी भी वैसा बनाए हुए हैं। बिलकुल वैसा। सोच रहा है कभी जेएनयू जाकर उनसे मिल आएगा। कुछ बातें करेगा। मेरे मन में भी यह सवाल काफ़ी पहले का है कि शाकाहार को हम किस रूप में भूमि पर स्वामित्व से जोड़कर देख सकते हैं? कालांतर में जो भी शाकाहारी हुए उनके पास अनाज उगाने के लिए जमीन उपलब्ध थी। मुर्दहिया इस तरह भी इस विचार को और निकटता से देखने के लिए बाध्य करती है। जहाँ बड़े-बड़े जमींदार अकाल के दिनों में भी अनाज को छिपाये रहते थे और भूमिहीन दलितों के माँगने पर ‘डेढ़िया’ पर देते थे। वहीं उन्हे सन् सत्तावन-अट्ठावन के भीषण सूखे के दिन खेतों में जाकर चूहे के बिलों में पानी डालकर उन्हे बाहर निकलने पर मजबूर करते थे। ताकि उसे पीट-पीटकर मार देने के अलावे उन बिलों में से बाली (मक्का) भी निकालने का अवसर मिल जाये। यह जिजीविषा है या उसका विद्रुप प्रहसन। या शायद उनके जिंदा रहने की कमज़ोर सी कोशिश ?

ऐसा नहीं है कि इनमे संवेदनशीलता का किसी भी तरह से अभाव था। कुछ भी हो जाये वे लोग पोखर में एक टाँग पर खड़े बगुलों को कभी मारने की नहीं सोचते। वे उतने ही भावुक थे, जितना कोई और इंसान दावा कर सकता है। उनके घर में ‘बुढ़ऊ दादा’ जैसे बूढ़े बैल के प्रति अजीब तरह का लगाव था। मुन्नर चाचा ने चमड़ा छुड़ाकर कहा सियारों को पास नहीं आने देना। क्योंकि वे बुरी तरह नोच नोचकर माँस खाते हैं। शाम तक गाँव के चरवाहों के साथ तुलसीराम उन्हे खदेड़-खदेड़कर भगाते रहे। इन सबके बीच गिद्धों ने बुढ़ऊ दादा के माँस पिंड को कंकाल में बदल दिया। आखिर में वे अपनी चौधरानी चाची के कहे अनुसार उस कंकाल से दो बड़ी-बड़ी तलवारनुमा पसलियाँ लेकर घर लौट गए। यह स्मृतिचिह्न है। इन्हे देख-देखकर ही वह उनकी यादों में ज़िंदा रह लेंगे। 

यहीं उनके जीवन में सन् सत्तावन का भादो महिना आता है। जब अमिका पांडे ने पतरा देखकर ‘खरवांस’ के बचे पंद्रह दिन के कारण सुदेस्सर पांडे की माता का दाहसंस्कार टाल देने को कहा। यदि ऐसा न किया गया तो माता जी नरक भोगेंगी। इस कारण मुर्दहिया में ही एक जगह कब्र खोदकर लाश को गाढ़ दिया गया। लाश जल्दी न सड़े इसलिए टोटकावश कफ़न के एक कोने में सोने की मुनरी अँगूठी गठिया दी। लाश को सियारों से बचाने के लिए ऊपर से अकोल्ह की कंटीली झाड़ियाँ डाल दी गई। जैसे-तैसे खरवांस के पंद्रह दिन बीते और लाश को बाहर निकालने का दिन आया। सुदेस्सर पांडे दो चार फावड़ा मिट्टी हटाकर दूर खड़े हो गए और अब बारी आई मुर्दहिया के असली वारिसों की। लाश की दुर्गंध से वहाँ खड़े होना दूभर था। फ़िर भी जैसे तैसे उस लाश को अपने हाथों से पकड़कर पिता पुत्र चिता पर रख देते हैं। यह दुर्गंध उनके लिए भी उतनी ही दुर्गंध थी जितने कि एक एककर वहाँ से भाग लिए सभी लोगों के लिए। फ़िर भी वे दोनों वहाँ हैं। वे भाग नहीं सकते। उन्हे वहीं रहकर उस चिता को पूरा जलाना है।

ऐसी पता नहीं कितनी अमानवीय अनुभूतियों से ‘मुर्दहिया’ की ज़मीन भरी पड़ी है। पता नहीं कितने हृदय-विदारक क्षण यहाँ प्रत्यक्ष हैं। यहाँ का जीवन जीवन नहीं अभिशाप है। फ़िर भी मनुष्य को किसी ‘जाति विशेष’ में जन्म लेने के कारण उसे जीने के लिए अभिशप्त होना पड़ता है। यह कहानी उन स्थितियों का अस्वीकार है। उन क्षणों में जीने का नकार है। यह प्रतिरोध की गाथा है, जहाँ उन्हे पजामा पहने देख गाँव के ब्राह्मण ‘अणकुटवा’ कहते। ऐसे ही इस ‘राम’चरितमानस के ‘केवट प्रकरण’ के बाद वह बारह साल की लड़की कभी स्कूल दिखाई नहीं दी। इतनी छोटी होने के बावजूद अनहोनी का भय इतना भयानक था कि साल भर के भीतर ही उसकी ससुराल ढूँढ ली गयी। डोली में बैठते वक़्त पंडित की बेटी रो-रोकर कहती रही कि ‘हमार पढ़ाई छूटि गयल हो बाबा’।

बस यहाँ तक आते-आते याद आ रही है किसुनी भौजी की चिट्ठी। कोयलारी में उनका पति काम करता है:
“हे खेदन के बाबू! हम कवन-कवन बतिया लिखाई? बबुनी बहुत बिलखइले। ऊ रोइ-रोइ के मरि जाले। हमरे छतिया में दूध ना होला। दूहै जाईला त बकेनवां लात मारै ले। बन्सुवा मजूरी में खाली सड़ल-सड़ल सावां दे ला। उप्पर से वोकर आंखि बड़ी शैतान हौ। संझिया का रहरिया में गवुंवा क मेहरिया सब मैदान जा लीं, त ऊ चोरबत्ती बारै ला। रकतपेवना हमहूं के गिद्ध नाई तरेरैला। चोटवा से पेटवा हरदम खराब रहै ला। हम का खियाईं, का खाईं कुछ समझ में ना आवैला। बाबुनी के दुधवा कहंवा से लिआईं? जब ऊ रोवैले, त कब्बो-कब्बो हम वोके लेइ के बहरवां जाइके बोली ला कि देख तोर बाबू आवत हऊवै, त ऊ थोरी देर चुप हो जाले। तू कइसे हउवा? सुनी ला की कोइलारी में आगि लागि जालें। ई काम छोड़ि दा। गवुंवै में मजूरी कइ लेहल जाई। सतुवै से जिनगी चलि जाई। येहर बड़ी मुसकिल से बीतत हौ। अकेलवै जियरा ना लागैला, उपरा से खइले का बड़ा टोटा हौ। हो सकै त बीस रुपया भेजि दा। जब अइहा त तुलसी बाबू के एक जिस्ता कागद जरूर लेहले अइहा, ई है सब कर चिठिहा लिखै लं। ई बड़ा तेज हउवै। अउर का लिखाई हम? थोर लिखना, ढेर समझना”।
नेहरू की मृत्यु के साल तुलसीराम अपना गाँव छोड़ते हैं। फ़िर कभी वापस नहीं लौटते। पता नहीं उनकी दादी के जमीन में गाढ़े चाँदी के ‘बिस्टौरिया’ सिक्कों का क्या हुआ होगा? उनकी याद में वह कैसे आते रहे होंगे। उनकी कहानियों में उनका पोता भी एक किंवदंती बन गया होगा। अम्मा की ‘रतौन्ही’ वाली आँखें, कैसे पोखर एक पास बैठी वापस लौटने की राह देखती रही होगी। ख़ुद ‘मुर्दहिया’ कैसे उन्हे याद करती रही होगी। नटिनिया वहाँ कब तक खड़ी रही होगी? उस चुरा लाये अम्मा के बक्से का क्या हुआ होगा? उस बेकना भैंस ने फ़िर किसे अपनी सवारी करने दी होगी? वो छीन ली गयी फाउंटेन पेन की याद कैसा कर जाती होगी? पता नहीं ऐसी कितनी ही बातें जिनको वह याद नहीं करना चाह रहे होंगे, तब भी लिखते वक़्त वह सारे दृश्य आँख के सामने दिख जाते होंगे।

2 टिप्‍पणियां:

  1. किताब जब जिन्दगी की साँसों से बनी हो तब फ़िक्रमंद आँखें चाहती है।

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