जुलाई 22, 2014

हमारा समय, विवाह, प्रेम, समाज और उसका पुनुरुत्पादन

पिछली पोस्ट पर श्वेता को ‘जेंडर डिस्कोर्स’ की संभावना दिख रही होंगी, लवकेश पीछे पन्नों पर उकड़ू बैठ उन्हे पढ़ रहा होगा। करिहाँव दर्द करने लगे होंगे। राकेश फ़ोन करने की सोच रहा होगा, पर सिर्फ़ सोचता रहेगा। कर नहीं पाएगा। वह भी कुछ सोच रही होगी। पर कुछ कह नहीं पाएगी। इन सबके भीतर यह मानवीय सम्बन्धों में जीवंतता का विषय है। फ़िर सतह पर यह जितना भावुक दिखता है, अंदर भीतरखाने यह उतना ही जटिल है। इसकी संरचना उनती ही क्लिष्ट है जितना कि यह समाज। जिन संसाधनों पर उनका एकाधिकार है, वह शायद ही कभी रिसकर हमारी हथेलियों का पसीना बन पाये। यह कब्ज़े ही ‘सांस्कृतिक पूँजी’ हैं, जो हमारे हिस्से के परिवारों में कभी जुट नहीं पायी।

देखा कितनी आसानी से अपनी तमाम विफलताओं, नाकामयाबियों, कमजोरियों को सैद्धांतिक जामा पहनाकर उससे ख़ुद को अलग कर लिया। यह कितना निर्लिप्त भाव है। लेकिन असल में जितने भी और जैसे भी हम हैं, उसकी ज़िम्मेदारी हमारी नहीं, उन इराज़ेदार औजारों पर नियंत्रण करने वालों की है। हमने कभी उस नियंत्रण को चुनौती नहीं दी। ख़ुद को हारा हुआ मान अपने आप किनारे खिसक गए। इस शोषणकारी व्यवस्था के दमनचक्र में इसलिए पिछड़ते गए। यह हमारे जन्म से भी पहले उन सबके पूर्वजों की चालाकियाँ हैं, जो जाति, धर्म से लेकर हर उस यथा-स्थितिवादी व्यवस्था को बचाए रखने की साज़िश है, जिससे इस पूरे तंत्र पर उनकी पकड़ ढीली न पड़ जाये। 

सोचिए एक ब्राह्मण पिता सिर्फ़ इसलिए अपने बेटी को जाति के बाहर प्रेमविवाह नहीं करने देना चाहते क्योंकि शादी में जो दहेज़ वे देंगे, उसके जाति से बाहर जाते ही उस दूसरी तरफ़ ‘सामाजिक गतिशीलता’ के कुछ चिह्न दिखने लग जाएँगे। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी होते ‘सांस्कृतिक पुनुरुत्पादन’ में बाधक की तरह दिखाई देता है। इससे उनके पुरोहिताई के एकाधिकार की बाड़ेबंदी, कलई की तरह धीरे-धीरे खुलने लगेगी। प्रेमविवाह उनके समाज को विघटित कर देगा। उन सारी संस्थाओं को सिरे से ख़ारिज कर एक नयी व्यवस्था के लिए वह ख़ुद को कभी तय्यार नहीं कर पाते। तभी तीन साल से अपने बेटे को जाति बाहर शादी करने से रोके हुए हैं। ‘रक्त शुद्धता’ बनी रहनी चाहिए। खाप पंचायतें इस अर्थ में समाज को किसी भी संभावित विघटन की त्रासदी से बचाए रखने के लिए प्रयासरत हैं। इस रूप में स्त्री पुरुष केवल किसी तरह ख़ून को बचाए रखने और अपनी स्थिति को पदानुक्रम में ऊपर रखने के औज़ार भर हैं।

पैट्रिक फ्रेंच एक जगह लिखते हैं कि मुरलीमनोहर जोशी जब अपनी पिछली सरकार में गऊ संरक्षण की बात कहते हैं तो इसका एक तात्पर्य यह भी है निकलता है कि वह एक ऐसे जीव के संरक्षण की बात कर रहे हैं, जिसके मूत्र को दूषित व्यक्तियों पर छिड़ककर शुद्धता प्रदान की जाती है। और इस अर्थ में वे उन जातिगत ढाँचों और मजबूत बनाए रखना चाहते हैं, जिसके वर्चस्व में बाकी सबके अस्तित्व को आज तक नकारा जाता रहा है। बच्चन सिंह तुलसी के ‘रामचरितमानस’ पर बात करते हुए इस ओर ध्यान दिलाते हैं के उनका अभीष्ट सामाजिक रूप से एक ऐसी कठोर व्यवस्था को आदर्श रूप में स्थापित करना था, जिसमें किसी भी तरह का विचलन स्वीकार्य नहीं था। वहीं कृष्ण को अपना आराध्य मानने वाले सभी भक्तिकालीन कवि राम की स्तुति करने वालों की तरह सवर्ण नहीं थे। उनकी रचनाओं में कृष्ण का समाज अधिक उदारता से दूसरे के अस्तित्व को स्वीकारता है। उन्हे अपनाता है। दीपांकर गुप्ता क्रिकेट से उदाहरण लेकर बताते हैं कि कैसे इन स्वमान्य आदर्शों को हमने अपने अंदर इतने गहरे ‘आत्मसात’ कर लिया है। वे कहते हैं कि भारतीय टीम का क्षेत्ररक्षण आज तक इसलिए भी सुधर नहीं पाया है क्योंकि मिट्टी के साथ त्वचा का संपर्क हमारे समाज में एक वर्ण या जाति के साथ इसतरह सम्बद्ध है कि इस खराब क्षेत्ररक्षण का जातिगत विश्लेषण किया जा सकता है और हम पाएंगे कि हमारी भारतीय टीम किस तरह से सवर्णों का जमावड़ा है। हम चाहकर भी इससे खुद को बाहर नहीं निकाल पाये।

इन सबके बाद भी कई संरचनाएं हैं जिनकी जटिलताओं से लगातार जूझते रहे हैं। जैसे कोई हिन्दी भाषी लड़का दिल्ली आकर यहाँ पली-बढ़ी साथ पढ़ने वाली किसी अँग्रेजी भाषी लड़की के साथ प्रेम में हो, तब उस लड़के की सामाजिक स्थिति में किस तरह के परिवर्तन आकार लेंगे?  हाल ही में आई फ़िल्म ‘टू स्टेट्स’ की रौशनी में यह सवाल लाज़मी हैं कि इस तरह सम्बन्धों में आने के बाद उन दोनों के पारिवारिक गतिकी किस तरह बदलेगी? यह सांस्कृतिक रूप से दो भिन्न परिवारों के निकट आने के बाद उस परिवार में जन्में बच्चों को किन सहूलियतों से भर देगी? भाषिक रूप से उनके पास कौन से पैने औज़ार होंगे, जिससे आर्थिक रूप से बदलते परिदृश्य में वह ख़ुद को कहीं स्थापित कर पाने में कितने सक्षम होंगे? ख़ुद उन दोनों में से कौन सामाजिक रूप से ‘ऊर्ध्व गतिशीलता’ को प्राप्त होगा? क्या यह किसी भी तरह से समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से परखा जा सकता है, जहाँ लड़का उस अंचल से आता हो जहाँ सरकारी नौकरी के बाद उसकी कीमत में गुणात्मक परिवर्तन आ गया हो। पर लड़के की ज़िद हो कि वह शादी करेगा तो दिल्ली वाली लड़की से ही। दिल्ली नामक शहर की गतिकी में विवाह जैसी संस्था में प्रवेश को कैसे देखा जा सकता है?

{पीछे का पन्ना: रात, जब चाँद भी ढल गया..}

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