जुलाई 27, 2014

कुछ और बेतरतीब सी बातें..

जबसे वह चला है, तब से अब तक ट्रेन में सब सो चुके होंगे। वह भी गर्दन एक तरफ़ कर यहाँ के बारे में सोच-सोच उकता गया होगा। नींद अभी सिराहने से गुज़र वापस लौटने की तय्यारी में होगी। कि तभी एक हाथ उसके पास आकर, किनारे वाली बत्ती को जलाने वाला बटन ढूँढ रहा होगा। उन हाथों की मेंहदी अभी भी उतनी सुर्ख़ होगी, जितनी बीती रात जयमाल स्टेज पर थी। दूल्हा शेरवानी में नहीं था। वह लहंगे में थी। घुँघराले बालों वाला फ़ोटोग्राफ़र कैसे उसे देखता रहा था। शायद उसकी आदत ही रही होगी। हर लड़की में अपनी बीवी को ढूँढ़ने की। यह उनका सपना भी हो सकता है। उन मेहंदी वाले हाथों का, उस तस्वीर वाले का, मेरे दोस्त का। पर यहाँ मैं क्या कर रहा हूँ? शायद ऐसे ही घूमने की आदत वहाँ ले गयी होगी। पर मुझे लौटना होगा। उस खिड़की के बाहर बिजली के खंभों से गुज़र कर वापस आना होगा।

जब शाम इन्ही खिड़कियों से बाहर झाँकते वह अपने पुराने दिनों की तरफ़ लौट रहा था, तब वह बिलकुल अकेला था। जैसे वह आजकल कुछ जादा ही सोच रही है। अकेलापन जब अंदर से बाहर की ओर आता है, वह तब ऐसे ही निर्मम होता है। अतीत अंदर तक कचोटता रहता है। जैसे कोई नीम बेहोश किये बिन, कट गए हाथ को सिल रहा हो। ख़ून तब बहता नहीं, वहीं रुक जाता है। जैसे चलते-चलते घड़ी रुक जाती है। जैसे बारिश में भीगते कभी बूँदें वहीं आसमान में थम जाती हैं। वैसे ही आसपास सब रुक गया है। पता नहीं क्या है, जो इस खालीपन को और खाली कर रहा है। हम हमेशा सबसे घिरे नहीं रह सकते, तभी यह हूक दिल से होकर इन उँगलियों में चटकती रहती है। मेरी उँगलियों में पड़ गई गाँठें, कुछ-कुछ इसकी कहानी भी कहती हैं। पर मन नहीं करता। मन नहीं करता उनके पीछे जाकर किसी बात को करिने से लगा लूँ। बस वह भी वहीं खड़ी रहती है। जैसे अभी खड़ी है। 

सोचता हूँ, कुछ दिन उसे अपने शहर बुला लूँ। या ऐसा हो कि वह अपने इस पुराने शहर ख़ुद आ जाए। और एक दिन, एक पूरे दिन ऐसे ही साथ बेतरतीब घूमते रहें। बेमकसद। बेपरवाह। बेखयाल। बहुत सारी बातें उन अमलतास के पेड़ों के नीचे बैठ कर करते रहें, जहाँ अब अमलतास के फूल नहीं झरते। सेमर की रुई उड़ती है। उनका मौसम चला गया तो क्या, हम दोनों ऐसे ही बैठे रहेंगे। कुछ दोस्त ऐसे भी होते हैं। जिनके नाम नहीं होते। पर अगले पल ख़याल आता है..पता नहीं क्या..जो सोचो उसे लिख भी दो, तब भी क्या वह सब सच होने वाला है कभी.. पता है, ऐसा कुछ नहीं होने वाला। पता नहीं कैसी-कैसी बातें करने लगा हूँ। अजीब-अजीब सी। जिनका अपने में कुछ मतलब है भी या नहीं, कह नहीं सकता। पर सच, उससे मिलना कैसा होगा? जो कुछ-कुछ या बिलकुल वैसे ही अंदर से जैसे हम हैं। अंदर की छटपटाहट कुछ देर के लिए सही, हम सुन रहे होंगे। आहिस्ते से उन्हे बुन रहे होंगे। 

पता नहीं ऐसे कितने ही ख़यालों, बातों, ख्वाबों से उसके सपनें भर गए होंगे। उन्हें छूना नहीं है। दूर से देखते रहना है। ट्रेन से आते वक़्त वह बिलकुल अकेला नहीं है। सोच में भी वह ऐसा ही रहना चाहता है। कल सुबह नींद खुलने पर सपने कौन से हाथ लगने वाले हैं। हमारी हथेलियाँ उसका कोई सुराख़ भी नहीं छोड़ती। के उन चींटियों की गंध के सहारे, उन सपनों वाले देस हम भी पहुँच जाएँ। हम बस कुछ एहसासों से भरे रह जाते हैं। मुलायाम-सी छुअन की तरह। तब मक्खियाँ कटहल पर भिनभिनाती नहीं हैं। तब भँवरों के परों का संगीत गूँजता है। उन्हे कोई नहीं सुन पाता। हमारे कान भी नहीं। वह धुनें आहिस्ते से साँसों से होते हुए दिल में उतरती जाती हैं। वहीं, उन साथ के स्पर्शों में घुलते हुए हम स्मृतिकोशों में हमेशा के लिए दर्ज होते जाते हैं। हम कभी नहीं मिटते। कोई मिटाना भी चाहे तब भी नहीं। इनके कहीं न होने पर शायद हम भी कहीं नहीं रहेंगे। यह निशानियाँ आगे आने वालों के लिए नक़्शे हैं।

अभी देखा, गाड़ी चौदह मिनट लेट है। कानपुर वक़्त से नहीं पहुँच रही। उससे पहले कहीं पटरियों पर दौड़ रही है। दिल्ली चार सौ उनतालीस किलोमीटर दूर है। तुम अभी भी बहुत सारे सपने देख सकते हो। और तुम्हारे बहाने, इधर कई सारी अनकही बातें दोहराता, इस रात की उमस से बचने की कोशिश करता, आँखों में दर्द होते रहने के बाद भी सोने नहीं जा रहा। तुम आओगी तब बहुत सी बातें करेंगे। ‘गुड़िया’ पर नहीं पहुँच रहा, फ़िर भी तुम इंतज़ार करना। हम वहीं कहीं छत पर बैठे होंगे। अगल बगल। फ़ोन पर जो नहीं कह पाता, वहीं पास आकर तुम्हारे कानों में कह दूँगा। तुम भी जो नहीं कहती, ऐसे ही कहती जाना। हम सारी बातें सारी रात ऐसे ही चाँद की छाया में बैठे करते रहेंगे। तब इन सपनों की ज़रूरत नहीं होगी। इन्हे जेब में लिए रहूँगा बस। और कुछ नहीं।

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