जुलाई 24, 2014

लखनऊ में वो जो एक रूमी दरवाज़ा है

हर शहर में कुछ-कुछ हम होते हैं। हमारी साँसें हमेशा बहाने बनाकर उधर ही खिंचती रहती हैं। हवाओं में उड़ती पतंगों की डोर की तरह, आसमान में अपनी मर्ज़ी से नाचती रहती हैं। ढील देते उँगलियों के बीच फँसे मँजे की तरह। धड़कनें हर धड़कन के साथ वहीं ले जाती हैं। हम कहीं खोई-खोई सी दिशाओं में गुम हो जाते हैं। कभी वापस न आने के लिए। ऐसे हर शहर अपनी तरह से हमें बुनते हैं। वहाँ की सड़कें, आवाज़ें, लोग, कपड़े, गलियाँ, गंध, चौक, बाज़ार, इमारतें सबमें हम ख़ुद को थोड़ा-थोड़ा रख आते हैं। के अगली बार आएंगे, तो फ़िर मिलेंगे। कुछ इस तरह अजनबीपन कम होते-होते एक दिन ख़त्म हो जाएगा। इस तरह हम भी वहाँ की हवा में अपनी देह की गंध को महसूस कर सकेंगे। कह सकेंगे कि यह शहर भी हमारा है। इसकी याद हमारी है। हम भी इसे थोड़ा जानते हैं। यह भी हमें थोड़ा पहचानता है।

ऐसे ही दो साल पहले वहाँ रूमी दरवाज़े को छोड़ आया। बुलंद दरवाज़े की तरह इसमें कोई दर्प नहीं है। चुपचाप खड़ा है। कितने करिने से इसे बुनने वाले ने बुना है। आहिस्ते-आहिस्ते। जैसे कोई मोहब्बत में आगे बढ़ने में झिझक रहा हो। जैसे दोनों के अंदर एक-दूसरे को छूने की ख़्वाहिश तो है, पर थोड़ा डर भी है। अनवर की याद बीच-बीच में मुझे ऐसे ही कर जाती है। दोनों कैसे एक-दूसरे से छिप रहे हैं। भागते-भागते उन मेहराबों के बीच से गुज़रता स्पर्श मुझे भी छू जाता है जैसे। मैं वहीं गुम-गुम सा उन्हे ऐसे ही देखता रहता। पायलों की झंकार गीत की तरह कानों में बजने लगती। उन सीढ़ियों को उन्ही की परछाईं में ढूँढने की कोशिश करता, पर वे कहीं नहीं मिलते। शायद कहीं किसी कोने में छिपकर मुझे देखते रहते होंगे। पता नहीं कितने साल पहले यही मेरी इन तीनों से पहली मुलाक़ात थी। मेहरु, अनवर और रूमी दरवाज़े से। हर बार इन तीनों से ऐसे ही मिलता रहा। मिलने से पहले कभी सोचता नहीं। बस ऐसे ही कमरे में अकेले बैठे, उधर खिड़की वाले आसमान में उगते चाँद की तरह, पहले प्यार की कशिश से घिरता रहा हूँ।

शायद इमारतें ऐसे ही हमारे अंदर हमेशा ज़िंदा रहने के बहाने ढूँढ लेती हैं। वह ढूँढ लेती हैं कि कोई उन्हे उन्ही की तरह प्यार करने वाला है। वह उन यादों को दिल के कोनों में संभाल कर रखेगा। वह कभी गुम नहीं होंगी। वहीं रहेंगी। नसों में ख़ून की तरह। पता नहीं इसमें क्या है कि इसे देखते ही न जाने कितने ख़यालों में खो जाता हूँ। कितनी बातें हरारत से भर देती हैं। यह रूमानी कर देने वाले पल हैं, जब ख़ुद पर काबू नहीं रहता। बस किसी बे-ख़याली में बहता सा रहता। रेत में तैरने की तरह। वहाँ, उन सीढ़ियों के पास, दोनों आपस में बात नहीं करते, फ़िर भी एक-दूसरे अनसुनी बात सुन लेते हैं। दिल की आवाज़ धड़कनों में कानों से ऐसे ही घुलती जाती हैं। उनमे मिशरी की मिठास दसहरी आमों से गुज़रकर देह में घुलती रही हैं। दोनों का लखनऊ यहीं से शुरू होता है। मेरा लखनऊ भी यहीं से शुरू हुआ। यह इस शहर से मोहब्बत की शुरुवात थी। नए-नए खिले सूरजमुखी के फूल की तरह। कोमल से सरसो के फूलों वाले रंग सा। जब दोनों साथ होते, तब ऐसे ही दमकते। दोनों की आँखें ऐसे ही चमकती। चमकती रहती।

पर प्यार को नज़र जल्दी लगती है। कई नज़रें एकसाथ उन्हे देखती रहती हैं। हरबार वह बाहर निकलने से पहले अपने कान के पीछे काला टीका लगाना भूल जाती। भूल जाती के बाहर निकल रही है। दोनों के लिए यह एक दूसरे से गुज़रते रहने का एहसास था। दोनों यहीं इतने इतमिनान से एक-दूसरे के अगल बगल बैठते। एक दूसरे को देखते रहते। उन्हे क्या पता, अगले ही पल, यहीं उनकी मोहब्बत दफ़न होने वाली है। दोनों वहीं सीढ़ियों के पास केसर के फूल बन जाते हैं। दोनों ढलते हुए सूरज के रंग में ढल जाते हैं। छिप जाते हैं। दोनों फ़िर कभी नहीं मिल पाएंगे। कभी नहीं। इश्क़ के कई बेस्वाद अनमने ज़ायक़े गले में फँसते रहने के बावज़ूद अंदर तक उतरते जाते हैं। यह रूमी दरवाज़ा उनकी क़ब्रगाह है। इसने इन यादों को बुरादा बनती ईंटों में संभाले रखा है। लोगों को उन क़दमों की आहट कभी सुनाई नहीं देती। कोई वहाँ जाता नहीं है। सब दूर से देखते हैं। परछाईं में इन्हे ढूँढते हों जैसे।

कभी सोचता हूँ, किसी रात सपने में उन दोनों से मिल आऊँ। अनवर, तुम इतने निर्दयी कैसे हो गए? ये कैसा इश्क़ है, जिसमें तुम इस हद तक चले गए। मास्टर पाशा ने तुम्हें कुछ नहीं बताया? वह कैसे अपनी मोहब्बत में ख़ुद को मिटा देता है? एक गाड़ी आती है और काम ख़त्म। तुम बेरहम हो अनवर। तुम्हें मालुम नहीं, इश्क़ हमेशा साथ के लिए नहीं होता। उसे चले जाने भी देना होता है। मेहरु जा रही थी। तुम्हें उसे जाने देना था। वह तुम्हारी किरायेदार थी। उसने तुम्हें अपना दोस्त चुना था। उसने अमीनाबाद से लाये तुम्हारे झुमके भी तो पहन लिए थे। तुम्हारे साथ कैसे बक्शी के तालाब तक हो आई थी। साइकिल पर तुम दोनों कितने अच्छे लग रहे थे। एक दूसरे की तरफ़ झुके-झुके से। उस ढलते सूरज में तुम दोनों की परछाईं इसी रूमी दरवाज़े में समा जाती है। कम-से-कम इसका ख़याल तो रखना था। पर तुम नहीं माने। तुम्हें पहले उससे पूछ लेते। पर मुझे पता है तुम गोली लग जाने के बाद सबसे जादा इसे ही याद कर होगे। रिसते ख़ून से तुमने असफ़-उद-दौला नहीं लिखा होगा। तुमने मेहरु लिखने की कोशिश की होगी।

बस, वहाँ से दोनों की एकबार की बात ले आया हूँ। सुनने का मन हो तो..

1 टिप्पणी:

  1. कल लिखने के बाद, पूरी रात सोचता रहा, कुछ है, जो छूट गया है। सुबह से इसी को ढूँढ रहा हूँ। नीचे से दूसरे पैरा में एक जहाँ एक जगह लिखा है, 'यह रूमी दरवाज़ा उनकी क़ब्रगाह है'। शायस सबसे जादा यही बात खटक रही थी लगता। बार-बार इससे गुज़रता रहा, पर तीन घंटे बाद भी निकल नहीं पाया हूँ। कुछ हिस्सों के हिज्जे दुरुस्त किए हैं। जहाँ मन का नहीं लग रहा था। कुछ कम अभी भी है पर.. ज़रूरी नहीं कि वह सब कुछ कह दिया जाये या वह वैसा ही उतर आए जैसा अंदर चल रहा है। कुछ तो हमेशा छूट ही जाता है। वो इस बार भी है।

    पर 'कब्रगाह' लिखने के बाद यही लग रहा है जैसे रूमी दरवाजा थोड़ा नाराज़ है। पर क्या करूँ हमदम, इस बार की याद ऐसे ही सही.. तुम तो मेरे दिल में हो.. वहीं जहाँ हम पहली बार मिले थे..

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