जुलाई 21, 2014

रात, जब चाँद भी ढल गया..

रात के एक बज रहे हैं। यहाँ क्या कर रहा हूँ? पता नहीं। ऐसे ही बैठ गया। कई सारी बातें किसी उदास ख़याल की तरह दिमाग से दिल की तरफ़ उतरती, धड़कनों से ख़ून में घुलने से कुछ देर पहले वापस दिमाग की तरफ़ लौट गईं। कुछ वहीं रुकी रहीं। उनके होने-न-होने से कोई फ़रक नहीं पड़ने वाला। दिमाग के बाहर उमस कुछ जादा है। पसीना सूख नहीं रहा। जेब भी सिली नहीं के नोट रुक सकें। इधर इन दिनों को अपनी ज़िंदगी के सबसे कमज़ोर दिनों की तरह महसूस करते रहना तोड़ रहा है। खुश रहने की कोशिश करता हूँ, पर पल भर बाद ही कहीं से कोई गुलाब के काँटे-सी चुभती बात एड़ी में गड़ जाती हैं। ख़ून नहीं निकलता, बस दर्द होता है। बहोत मन होता है, बात करने का। पर किसी भी पुराने बीत गए दोस्त पर उँगली नहीं रख पाता। 

सब अपनी ज़िंदगियों में मसरूफ़ हैं। जो काबिल हैं वो भी, जो काबिल नहीं हैं वो भी। कोई किसी कंपनी में इतने सालों से बैठा है, जब हम अपनी नौकरी के लिए सोचना शुरू करने वाले थे। कोई अपने पिता की दुकान संभाल रहा है। किसी के शादी के बाद दो अजीब से नाम वाले बच्चे हैं। कोई रोज़ अपने स्टेटस में चिंतित सी दिखती है, पर असल में वह है नहीं। उसने समाज को अपने सरोकार के दृष्टिबाधित दोष से देखना शुरू कर दिया है। इधर ख़बर लगी कुछ कम पढ़े, कम समझदार लोग 'डॉक्ट्रेट' पाने वाले हैं। उनका रंग गोरा है। उनकी देह गोरी चमड़ी वाली है। फ़िर जो गोरे नहीं हैं, उनके पास हमसे अलग भाषिक औज़ार हैं। उनकी भाषा में हमारी तरह भावुक नहीं हुआ जाता। अपनी अति भावुकता के बदले रविंदर सिंह, चेतन भगत, रॉबिन शर्मा हुआ जाता है।

हम हारे हुए लोग हैं। हमारी मुट्ठी से पल पल सपने रेत की तरह फिसलते रहे हैं। यह किसी कहानी या आत्मकथ्य से उठाई गयी पंक्ति नहीं है। यह हमारी ज़िंदगियों का सच है। हम इसे बेचने लायक कौशलों से विपन्न हैं। सबकी साठ पैंसठ साल की ज़िंदगी है, पर कितने अलग-अलग रंग हैं सबके। हमारे हिस्से तो उजले रंग कम ही पड़ गये हों जैसे। शायद यह हमारा भ्रम है कि हम ख़ुद को इंसान माने बैठे हैं। हम तो कुछ और ही हैं। किसी को दिखाई न देने वाले। अभी हममें से कई तो ऐसे हैं जिन्होंने शादी के बाद अपनी बीवी के साथ ठीक से हगनी गढईया भी नहीं देखा, दूसरी तरफ़ लोग बिदेस टहर के लौट रहे हैं। जितना साफ़ पानी हमारे गिलासों में नहीं, उतना चमकदार पानी वहाँ के समंदरों का है। एक नाव है, दूर, उसपर भी बैठ आयें हैं। अब यहाँ किनारे से देख रहे हैं। लड़का-लड़की बाहों में बाहें डाल ऐसे फ़ोटो खिंचवा रहे हैं, जैसे उनके बगलों-काँखों से गायब बालों की तरह रिज़ॉर्ट में रखे झोलों-सूटकेसों में कोई दुख नहीं है। वहाँ सब इत्ता तरल-चिकना है, जैसे अमूल मक्खन की तरह उनकी पत्नियों की बाहें। हम उन चेहरों पर किसी भी परेशानी को माथे पर शिकन की तरह नहीं देख पाते। सब कुछ कितना सुंदर है। दृश्य से लेकर जीवन तक। 

फ़िर भी लगता है, इन सब बातों के भीतर कुछ संभावनाएं बची रह गयी हैं। हम अभी भी कुछ-कुछ ज़िंदा हैं। थोड़ा बहुत साँस लेते हैं। हम रोज़ किसी-न-किसी बात पर झगड़ते हैं। कभी सच, कभी झूठ। कभी नमक कम है, तो कभी रोटी नहीं बनी। ख़ुद रसोई में साथ खड़े होकर उनके कुछ और पास रहते हैं। कभी पतीली में पानी गरम कर रहे होते हैं, कभी कनस्तर से आटा निकाल कर आजवाइन के डिब्बे को ढूंढ रहे होते हैं। पूड़ी जल न जाये इसलिए वहीं बेलते हुए, बराबर कढ़ाई पर नज़र बनाए रखते हैं। कभी गिलास में शर्बत लिए आटा गूँदने तक इंतज़ार करते हैं। हम रोज़ाना में जिस तरह इन अलग-अलग जगहों पर साथ होते हैं, क्या उन घरों में भी अमीर पतियों के साथ वे सब ऐसे ही मिल पाती होंगी। वे खाना बनाने वाली नौकरानी से झगड़ते नहीं, डाँटते हैं। उसके माथे पर पसीना देख अपनी बाँह से उसे पोंछते नहीं हैं। कभी खाने पर कोई नोकझोंक होती भी होगी? उन्हे क्या कभी गुस्सा भी आता होगा? क्या वे सब कभी झगड़ते भी होंगे। उनके संबंध इन खाली जगहों को कैसे भरते होंगे। शायद कर्लऑन के गद्दों पर सोकर उठने के बाद बिस्तर की चाय पर साथ होते होंगे। या उन महँगे-महँगे बाथरूमों में टब के अंदर या शावर के नीचे एकसाथ नहाते होंगे। यह सच है हम आज तक ख़ुद ऐसे घरों में नहीं गए, यह आज भी हमारे लिए सिनेमा के पर्दे से दिमाग में आए हैं। पर उन तस्वीरों से लगता यही है, उनकी ज़िंदगियाँ इससे अलग कुछ क्या होंगी। बेजान-सी, बिन धड़कनों-साँसों वाली।

{अगला ज़रुरी पन्ना: हमारा समय, विवाह, प्रेम, समाज और उसका पुनुरुत्पादन }

3 टिप्‍पणियां:

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  2. हूक समझते हो? बैरंग पर एक कहानी है, संवदिया...जा के जरा पढ़ो. इस दुनिया में ऐसे ही मिसफिट से भटकते रहना है शायद. इस किचन का हाल पढ़ कर पुराना एक कमरा याद आ गया है. एक पुराना कोई लड़का भी. उसके साथ बिना तवे, बिना चकला, बिना बेलना वाले किचन में कड़ाही, थरिया और गिलास से प्याज का पराठा बनाना भी. उसका आटा सानना भी कि कहाँ लड़की हो, इतना मेहनत करोगी. तुम्हें अजवाइन खोजते देख कर कुछ शाम की चाय भी याद आई है. दिल्ली के गुमशुदा सी गलियों में कुछ छोटे छोटे मोहल्ले होते हैं जहाँ जिंदगी रहा करती है. तुम्हें पढ़ कर हमेशा ही कुछ अलाय बलाय लिख देने का मन करता है जिसे क्यूँ लिखना है मुझे भी नहीं पता...तुम भी लिखते हो बहुत कुछ. तुमको पता होता होगा शायद.
    आजकल भटकाव का दौर है. कहीं भी खुद को तलाश नहीं पाती हूँ. कुछ पढ़ना अच्छा नहीं लगता. ऐसे में कभी कभी तुम ऐसा ही कुछ लिखते रहते हो...बिसरा हुआ...भटका हुआ. थोड़ी देर ठहरना अच्छा लगता है फिर.

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    1. हाँ वो कहानी देखी बैरंग पर। तुम्हारे ब्लॉग से कल पहुँचा था वहाँ। कि देखूँ सागर क्या कर रहे हैं। पीछे भी जब बारहवीं में पढ़ाई थी, दो साल पहले। पर अंदर तक अभी भी धँसी हुई है। इसे भूल जाना चाहता हूँ, फिर भी..

      पीछे छूट जाने का दर्द बड़ी बहुरिया के दिल में अकेले उन चारदीवारों में रिसता रहता है। हम भी कहीं पीछे रह गए हों जैसे। पर काश हमारे पास भी कोई एक संवदिया होता जिससे कुछ तो कहीं कहलवा लेते। अपना दर्द कुछ कम कर लेते। पर नहीं, हम उससे भी अकेले हैं। यहाँ कोरे पन्ने भर लेने की ज़िद हरगोबिन की जगह नहीं भर सकती। हमारे पास कोई भी नहीं है। यह खालीपन बहुत खाली है.. अकेला है..सब बेतरतीब है, बिखरा है..

      ख़ैर, इस पढ़े को अ-पढ़ा कर देना।

      हम सब इतने अकेलेपन में अपने तरीक़ों से भिड़ते रहे हैं। कई बार उनसे जीत भी गए हैं। इस बार भी भरसक निकल आएंगे। कोशिश छोड़ना मत। लड़ते रहना। सब साथ हैं। कभी पढ़े से कुछ रौशनी मिलती है, तो पढ़ना भी.. फ़िर कभी कुछ न लिखे होने के बाद के खालीपन से भी तो.. पर क्या करें यह बार-बार वापस लौट आता है.. आगे क्या कह देना है, पता नहीं..

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