अगस्त 21, 2014

एक वो जो सड़क थी, एक वो जो पेड़ था

बाढ़ कैसी होती है? इसके रेणु के 'ऋणजल धनजल' जैसे कई जवाब हो सकते हैं। फ़िर इसके बाहर यह कैसी भी होती हो, पर गौरव सोलंकी के फ़ेसबुक कवर पर लगी तस्वीर और वहाँ लिखी कविता की तरह बिलकुल नहीं होती। तस्वीर धुंधली है, पर लड़की दिखाई दे रही है। बगल में झोला दबाये, एक हाथ से छाता थामें। दूर, इतनी दूर नहीं, वहीं एक लड़का उस तरफ़ ही ताक रहा है। और वह पंक्तियाँ हैं, 'वहाँ जो एक पेड़ था और वो जो सड़क थी, नदी हो जाना चाहती थी'। विनोद कुमार शुक्ल की कविता के जैसे। शायद कहीं कुछ हिस्से हों भी। पर जो बात परसो से अंदर-ही-अंदर उमड़-घुमड़ रही है, वह यह कि पाँच हज़ार में बुक करायी गाड़ी, गोण्डा घूमकर बहराइच से लखनऊ कब पहुँची होगी, पहुँच भी पायी है या बीच रास्ते में कहीं वापस मुड़ गयी? कोई खोज-ख़बर दिल्ली में हम तक नहीं है।

गाड़ी में दादी हैं। बीमार हैं। बहुत बीमार। पापा की सबसे छोटी काकी। पापा 'काकी' नहीं कहते, चाची कहते हैं। पर अपने चाचा को 'काका' कहते हैं। शायद यह 'अवधी' में आत्मीयता प्रकट करने का तरीका हो? पता नहीं। परसो सुबह से ही बुआ-फूफा सारी तय्यारियों में जुट गए होंगे। क्या ले चलें, किसकी ज़रूरत पड़ सकती है। किसे नहीं ले चलते हैं। किसे न ले जाने से काम चल जाएगा। किसे नहीं। सबसे बड़ी तय्यारी है पैसे की। पैसा न होने पर ज़िन्दगी, त्रासदी की जोंक बनकर पीठ पर चिपकी रहती है। यह हमारी ज़िन्दगी को चूसती है। धीरे-धीरे। आहिस्ते से। बिन बताए। कितने असहाय हो जाते हैं हम। कुछ भी नहीं कर पाते। कुछ भी नहीं सोच पाते। सारी सोच यहीं से शुरू, यहीं पर ख़त्म। रुपया यहीं ज़िन्दगी से बड़ा लगने लगता है। शायद इस दुनिया में होता भी है।

घरवाले दादी को बहराइच जिला अस्पताल नहीं ले गए, जहाँ इकौना के विधायक भगौती प्रसाद अपनी अंतिम साँसों तक ठीक होने के लिए जूझते रहे। वहीं के किसी प्राइवेट अस्पताल में हफ़्ताभर चुपचाप पड़ी रहीं। अपने चेहरे पर चारों तरफ़ से गढ़ी आँखें देख रही हैं, पर कुछ भी याद नहीं। पीछे कुछ नाम लेती रहती थीं पर अब बड़बड़ाना बंद है। यह यादों के साँसों में घुल जाने जैसा है। उनके गुम हो जाने की तरह। यहाँ फ़ायदा न होते देख दूसरे में गए और वहाँ डॉक्टर ने लखनऊ ले जाने को कह दिया। तीस-चालीस हज़ार रुपयों का हासिल लखनऊ का अस्पताल। इतना पैसा कहाँ से जुटाया होगा? किन-किन से ठीक हो जाने पर उतार देने की मेहरबानियों से ख़ुद को समेट लिया होगा। पता नहीं। पता नहीं जिन-जिन से पैसा लिया होगा, उन्होने क्या-क्या कहकर पैसा दिया होगा।

ख़बरें लगातार आ रही हैं, उत्तर प्रदेश में बहराइच सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित जिला है। श्रावस्ती, गोण्डा, बलरामपुर कितनी बार इन जगहों को टीवी पर इस तरह देखते रहें। जनजीवन अस्त-व्यस्त है। नहरों के किनारे वाले गाँव रतजगे कर रहे हैं। फ़सलें चौपट हो गयी हैं। कुछ भी करीने से नहीं है। कोई कुछ नहीं कर पा रहा। एनडीटीवी पर आज सुबहकमाल ख़ान की रिपोर्ट देख रहा था। कहीं बहराइच-बाराबंकी की सीमा पर बने सरकारी स्कूल से बोल रहे थे। वह भी घाघरा नदी पार नहीं कर पाये। चार दिन से वह महिला अपने परिवार के साथ यहाँ आई है। किसी ने सब्जी भिजवाई है वही कढ़ाई पर पका रही है। कल जनसत्ता में था भी। कि लखनऊ से बहराइच को जाने वाली बसें नहीं चल रही हैं। परिवहन सेवाएँ स्थगित हैं। कई जगह सड़कों और नदी में फ़रक ही नहीं रह गया। कोई कहीं न आ सकता है, न जा सकता है। बस ऐसा करने की सोच सकता है। इसबार बरसात इतनी नहीं हुई, जितना नेपाल से छोड़े गए पानी ने तबाही मचाई है। महसी से लेकर शारदा नदी के पाट सब जगह एक ही सूरत। हर तरफ़ पानी पानी। और कुछ नहीं।

पता नहीं बाढ़ के पानी से तरबतर सड़क पर दौड़ती गाड़ी दूर से कैसी लग रही होगी। उन भीगे पेड़ों की छाया में भागती। उसे कहीं रुकना नहीं है। कहीं किसी ढाबे पर भी नहीं। बस वे बच जाएँ। हमारी तरफ़ 'लखनऊ' ले जाने का मतलब है, आख़िरी उम्मीद। जो शायद इसबार थोड़ी कमज़ोर है। कमज़ोर हैं उनकी साँसों की डोर। सब फ़ोन पर बारबार यही कहते रहे हैं। बस अपने मन को, दिल को दिलासा देने के लिए वहाँ ले जा रहे हैं। दादी धीरे-धीरे हमसे दूर जा रही हैं, हम कुछ भी नहीं कर पा रहे। फूफा बोलते हैं दिमाग का एक्स-रे करवाया, तब डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिये। अब ले जाना पड़ेगा बड़े शहर। अगर ले जाना चाहते हों, तब। वैसे लखनऊ से शायद ही कोई ठीक होकर वापस आया हो। चीज़ें पहले ही इतनी बिगड़ जाती हैं कि उन्हे संभालना मुश्किल होता है।

इसबार साध्वी सावित्रीबाई फुले वहाँ से भाजपा सांसद हैं। पता नहीं 'सांसद निधि' अब बढ़कर कितनी हो गयी है। कुछ जादा नहीं, पर हम क्या यह उम्मीद नहीं कर सकते कि उस जिला अस्पताल में भी कुछ जीवन रक्षक प्रणालियाँ स्थापित हो सकती हैं? इन सरकारी अस्पतालों की विश्वनीयता को फ़िर से विश्वसनीय बनाने का प्रयास किया जाये, ताकि उन निजी अस्पतालों के चंगुल से लोग बच सकें। जहाँ जिन्दगी का मतलब पैसा है। फ़िर दिल्ली से सात सौ किलोमीटर दूर रह रहे उन लोगों को क्या कुछ कम जीने का अधिकार है? क्या वहाँ हमारी तरह इंसान नहीं रहते हैं? या उनकी ज़िंदगियों की कीमत कुछ कम है? पता नहीं, दादी की ख़बर कब लगती है। मोबाइल भी नहीं लग रहा। सब बंद। बस मेरे सपनों में सड़क, पेड़ और वो अदेखी गाड़ी सब दौड़ते नज़र आ रहे हैं। 

2 टिप्‍पणियां:

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    1. आप अपनी मर्ज़ी से आते हैं, अपनी मर्ज़ी से चले जाते हैं। न आपके आने का कारण स्पष्ट हो पाता है, न किस खीज में आप अपना किया कमेंट ख़ुद ही डिलीट कर गायब हो जाते हैं।

      आपके 'ब्लॉग एग्रीगेटर' पर पहुँचा था, आपके कहे मुताबिक अपना ब्लॉग ढूँढ़ रहा था, नहीं मिला। अच्छा किया जो आप तत्क्षण प्रतियुत्तर न मिलने पर गायब हो गए। मनमर्ज़ी हूँ, मन करता है तो साल भर पहले कमेंट पर आज की तारीख़ में बात आगे बढ़ाता हूँ। आप अधीर थे, थोड़ा धैर्य रखना चाहिए था। आगे आपकी मर्ज़ी।

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