अगस्त 22, 2014

पीछे छूट गए दिनों की कुछ बातें..

अगस्त बाईस तारीख। दिल्ली में बारिश, बारिश कहने लायक भी नहीं हुई है। उमस कम है पर आसमान से बूँदें भी नहीं गिर रहीं। सब इंतज़ार में हैं। पेड़, बिरवे, मोर, चिरिया, पंछी, मिट्टी, घास, भूत परेत सब। महिना ख़त्म होने को है और करने के लिए कुछ नहीं है। ऐसा मन सोचता है, पर कई सारे काम बोझ की तरह वहीं लदे-फंदे हैं। सुबह जल्दी नहा लिया हूँ। और आकर यहाँ बैठ गया हूँ। नई सड़क से जो दो ‘फाउंटेन पैन’ लाकर फूलकर बड़ा कुप्पा हुआ जा रहा था, अब लिखने बैठता हूँ, तब पता चलता है कि स्याही जादा निकलने लगती है। कागज़ पर बूँदें छपने लगती हैं। सोख्ता अगली बार के लिए बचा रह गया है। तबीयत तेरह-चौदह अगस्त से ही नासाज़ मालुम पड़ रही थी, पर खींचे जा रहा था। नाक तो दिन भी पूरा नहीं हुआ, बहने लगी। एक शाम मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन हो आया, पर सरवन भवन का डोसा अभी भी बचा रह गया है। दिमाग एकसाथ कई-कई सारी चीज़ें करने को हो रहा है। पर हाथ सही ‘सेलेबल’ नहीं चुन पा रहे। दिमाग ‘दिमान’ हो गया था, लगती ‘लगटी’ बन रहा था। ऐसे ही न जाने क्या-क्या? सब एक दूसरे में हैं। और कहीं नहीं हैं। फ़िर भी बहुत कुछ यहीं हैं। यहीं आस-पास।

यह इसबार नई सड़क जाने से पहले की बात है। तब अकेले नहीं, अजय के साथ गया था। खड़ी दोपहर तबभी थी। जिसे कहते हैं, ‘बदरिया घाम’। सीधे खोपड़ी से अंदर। मारवाड़ी कटरे से आगे ‘मालीवाड़ा’ है। वहीं उसी गली में आगे ख़ूब अंदर जाकर कचौड़ी-ब्रैडपकौड़े की दुकान बायीं हाथ पर पड़ती हैं। और इसी के सामने जो गली दक्खिन दिसा की तरफ़ जाती दिखती, हम उसी में दाख़िल हो जाते। दस कदम भी नहीं चलते कि सीधे हाथ पर बिलकुल खड़े जीने के साथ जो सीढ़ियाँ दिखती, वही हमें ‘गंगा भोजनालय’ तक पहुँचा देतीं। पर इसबार वहाँ एक बोर्ड दिखा। गंगा भोजनालय आगे है। और तीर के निशान के पीछे-पीछे हम अब भी पहली मंजिल पर थे। जगह बहुत छोटी हो गयी है। खिड़की के ही बगल में कूलर लगा है। कमरा जितना बड़ा है, उसके आधे से भी जादा हिस्से को रसोई ने छिका लिया है। कुर्सी-मेज़ भी पिछली जगह से काफ़ी कम दिख रहे थे। उदासी इस तरह सबतरफ़ तारी थी। चेहरों से लेकर कमीज़ के बटनों तक में। चलने के ढ़ंग में भी किसी अपनी जगह के छूट जाने का दुख उतर आया था। सबसे जादा उदास तो वो व्यक्ति लग जो हमारा ‘ऑर्डर’ लेने आया था। उसका रोम-रोम अपनी ज़मीन से बिछुड़ जाने की कहानी कहता रहा। उसकी कमीज़ का रंग ऐसा पहले से ही था या रात रोने से ऐसा हुआ होगा? पता नहीं। उसने बताया नहीं। हम कभी सोच भी नहीं पाये थे कि वह जगह इन लोगों ने किराये पर ली होगी। और एक दिन उसका मालिक उसे ऊँची कीमत पर बेच भी सकता है।

मन ऐसे ही छलनी हो जाता होगा। दिमाग घूमने लगता है। कुछ जगहें दिल में जगह बना लेती हैं, पर उनको एक वक़्त के बाद उखड़ जाना होता है। हमारी यादें भी कुछ इसी तरह हैं। इस देश काल में यदि हम ‘अतीतजीवी’ हुए हैं तब इसकी गंभीर पड़ताल की ज़रूरत है। हमारा समय क्या इतना क्षणभंगुर है कि हम उन बीते दिनों में लौट जाना चाहते हैं? जहाँ हमारा वर्तमान बीत रहा है, क्या वह सारी ‘संरचनाएं’, ‘निर्मितियाँ’ लगातार अपनी ‘गतिकी’ में इतनी जल्दी परिवर्तित होती रही हैं के हमारे देखते ही देखते वह अपने रूप (‘फ़ॉर्म’) को बदल लेती हैं। लेकिन हम कहीं वहीं किसी डाल पर कुछ कतरन छोड़ आते हैं। हम बदलने से मना कर देते हैं। मना कर देते हैं आगे बढ़ने से। हम वहीं अरझे रहते हैं। उलझे रहते हैं। यह हमारा सामानांतर ‘प्रति-संसार’ हैं। इसे हम अपने अंदर ही बसा रहे हैं। इसमें जी रहे हैं। यह हमारा इस वर्तमान से प्रतिरोध है। पता नहीं दिमाग के अंदर यह सब क्या है? पर इस सवाल पर थोड़ी देर ठहरना चाहिए। हम सबको। हो सकता है हम सबके जवाब अलग-अलग हों। पर ज़रूरी है, इन जवाबों का होना।

कल रात फ़ोन पर बात हुई। दादी ‘ट्रॉमा सेंटर’, डॉलीगंज, लखनऊ में भर्ती हैं। इलाज चल रहा है। डॉक्टर दवाई दे रहे हैं। पूरा-पूरा दिन सोती रहती हैं। सब वहीं हैं। वह गाड़ी गोण्डा से भी लखनऊ नहीं जा पायी। उसे फैज़ाबाद से घूमकर जाना पड़ा। इतना घुमना के रास्ता ही दुगना पड़ गया। रास्ता काटे नहीं कट रहा होगा। सब इंतज़ार कर रहे होंगे। पर आखिरकार अब वह अस्पताल में हैं। बात लखनऊ नहीं, बहराइच हुई। बड़े जन फूफा के साथ कल ही वहाँ के लिए निकले हैं। उनका फ़ोन बंद आ रहा था। छोटे जन ने तफ़सील से सारी बातें बतायीं। पता नही, जब लखनऊ पहुँच गए, तो फ़ोन क्यों नहीं किया? हम यहाँ पता नहीं क्या-क्या सोचने लगते हैं। बेसिर पैर। फ़िजूल। बकवास। फ़ालतू। कल जब लिख रहा था, तब उसपर एक उदास-सी छाया है। उदासी का कोई नाम नहीं है, पर वह है। उदास। शान्त। वीभत्स होने से पहले रौद्र। बस वो ठीक हो जाएँ, बस। इससे जादा कुछ नहीं। यह बस छोटी-सी उम्मीद है।

और भी पता नहीं कौन-कौन सी बातें दिमाग में घूमती रही हैं। चेतन भगत का नया उपन्यास अक्टूबर में आ रहा है। ‘हाफ़ गर्लफ्रेंड’। 'यू-ट्यूब' पर इसके 'टीज़र ' की धूम मची है। माधव बिहार से है। अँग्रेजी कम जानता है। उसे यहाँ दिल्ली में किसी लड़की से प्यार हो जाता है। वह इस माधव की गर्लफ्रेंड बनने के बजाए, आधी गर्लफ्रेंड बनने को राजी हो जाती है। बस वहाँ इतना ही है। 'फ्लिपकार्ट' पर जा कर 'प्री-बुक' करवा आया हूँ। पता नहीं कैसा ट्रीटमेंट होगा। वहीं से आए, अनु सिंह चौधरी के कहानी संग्रह 'नीला स्कार्फ़' को भी पढ़ रहा हूँ। टीचर वाली कहानी में थोड़ा खो जाता हूँ। इस संग्रह में इसी नाम से जो कहानी है, उसी थीम परअजय नावरिया  की जबर्दस्त कहानी है, 'अनचाहा'। जिसके आगे कोई नहीं ठहरता। 'टर्म्स एंड कंडीशन अप्लाय' की भी पहली कहानी इसी के इर्दगिर्द है, पर कमज़ोर लगती है। इस इतवार दरियागंज से रविंदर सिंह की किताब, 'आइ टू हैड अ लव स्टोरी' उठा लाया। फ़िर लौटते ही हिन्दी अनुवाद वाले ऑर्डर को कैंसिल किया। चौबीस पन्ने पढ़ चुका हूँ। सोचा था अँग्रेजी में टेस्ट अलग होगा, पर मज़ा नहीं आ रहा। सब वैसा ही तो है, जैसा इस उम्र में आते-आते हम सोचने लगते हैं। 'खुशी' से फ़ोन पर बातचीत शुरू हो गयी है। और यह अपनी याददाश्त को कोस रहे हैं। रिशतेदारों के नाम भी याद नहीं हैं, इन्हे। उधर डॉ. तुलसीराम की 'मणिकर्णिका' अपनी पिछली किताब, 'मुर्दहिया ' के पेस की तरह नहीं है। जो उम्मीद लगाए हुए थे, उसमें शहर के इकहरे अनुभव कुछ और नहीं दे पाएंगे। फ़िर यह किताब उसके मुक़ाबले अधिक बौद्धिक भी है। दिमागी-वैचारिक अनुभवों से भरी। आख़िरी में प्रेम भी है, पर वह प्रेम की तरह नहीं है। 

और हाँ, 'वॉट्स एप' पर वापस आ गया हूँ। कई दोस्त वहाँ इंतज़ार करते-करते थक गए तो फ़ोन पर धमका कर वहाँ ले आए हैं। फ़ेसबुक की ऊब से बचने का चोर रास्ता। उससे कहीं जादा सरल-सहज लगता है। बस नंबर जोड़ते जाओ। लेकिन दोनों का मालिक एक ही है, मार्क ज़ुकरबर्ग। उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। फ़िर अपना एक 'ई-मेल अकाउंट' बंद करना कैसा होता है, उस मानसिक पीड़ा से भी गुज़र रहा हूँ। मेरा पहले के दिनों का साथी। सात-आठ साल तो साथ रहा ही होगा। बस कभी-कभी वापस उन गलियों में घूम आता हूँ। देख आता हूँ, कोई इंतज़ार तो नहीं कर रहा। कई पुराने ज़रूरी मेलों को सहेज कर रख लूँगा। वहाँ की बसावट को धीरे-धीरे दूसरे ठीहे पर खींचे ले जाना है। पर धीरे-धीरे यह बंद हो जाएगा। किसी दुकान के शटर की तरह। कभी वापस न खुलने के लिए।

{आज सत्ताइस अक्टूबर, 2014, बड़े दिनों बाद, आज यह पोस्ट जनसत्ता में आई है। शायद अप्रैल के बाद से अब, आज। पता वही है, अपना समांतर। बस एक बात कहनी है, मौसम बदल गया है। तब दादी थींअब कहीं नहीं हैं। }

1 टिप्पणी:

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