अगस्त 24, 2014

'रानी' की कहानी 'क्वीन' बनकर

कई दिनों से फ़िल्मों पर लिखना टाल रहा था। बस करता क्या था? ‘टॉरेन्ट’ पर लगाकर भूल जाओ। देखता कौन है? किसके पास इतना वक़्त है? पर मन नहीं मानता। चुपके से किसी दोपहरी छत वाले इस कमरे में हैडफ़ोन लगाकर बैठ जाता। एक किश्त में एक। ‘क्वीन’ और ‘हाइवे’ आगे पीछे देखीं। दोनों को ‘स्त्री दृष्टिकोण’ से देखने के आग्रह बार-बार दिमाग में घूम रहे थे। पता नहीं कितनी बातें लगातार सुन रहा था। पर कहीं किसी ‘वैबसाइट’ पर जाकर कोई ‘रिव्यू’ नहीं पढ़ता। किसी साथी ने भी ठीक से कोई टिप्पणी नहीं की, इसलिए एकबारगी देखना ज़रूरी था। यही सोच बैठ गया। जब दोनों फ़िल्म देखे महिना भर हो रहा है, तब आज इतवार सब ब्लॉगों की तलाशी ले रहा था। आलोक ने ‘हाइवे’ पर लिखा है, पर इतने महीन होकर नहीं। उसने अपने संदर्भों में देखा है। रघुवेन्‍द्र सिंह के ब्‍लॉग ‘अक्स’ पर विकास बहल के बारे में पढ़ा, पर फ़िल्म के बारे में वहाँ भी नहीं है।

इस पूर्वपक्ष के बाद, अब सीधे आते हैं, दोनों फ़िल्मों पर। कोई क्रम नहीं है, दोनों आपस में आवाजाही भी कर सकती हैं। रात से दिमाग में तो कर भी रही हैं। अगल बगल नहीं ऊपर नीचे होकर। पर कह नहीं सकता कितना किसे साध पाऊँगा। आगे देखते हैं, क्या होता है..!!

कितने शानदार तरीके से ‘क्वीन’ शुरू होती है। ‘बिग फैट इंडियन वैडिंग’ है। तय्यारियाँ ज़ोरों पर हैं। उम्र से बेदख़ल बूढ़ी महिलाएं संगीत के लिए ‘कॉकटेल’ के गाने पर डान्स की प्रैक्टिस कर रही हैं। एक महिला कोरियोग्राफ़र इसी काम के लिए उनके साथ है। बाहर टेंट वाले लाइट की व्यवस्था देख रहे हैं। दिल की कटिंग वाले थर्माकोल पर दूल्हा-दुल्हन के नाम लिखे हैं। लड़की के हाथों में मेंहदी लग रही है। और जैसा की होता है, हम सबकी तरह वह लड़की भी, अपनी ज़िन्दगी के इतने बड़े अवसर पर, अपनी सारी यादों को तस्वीरों में तब्दील कर लेने के ख़यालों से अंदर तक भरी हुई है। उसे तस्वीरें ‘फ़ेसबुक’ पर अपलोड करनी हैं। पर उसका भाई कहीं गायब है। जैसे उसकी सहेली अभी तक नामुदार नहीं हुई है। उसकी शादी में वे सब सहेलियाँ घंटों तक नाचती-गाती रही थीं। वह कितनी परेशान है कि मम्मीजी ने कपड़े अभी तक नहीं बदले हैं। पापाजी ने मिठाई की दुकान दुल्हन की तरह सजाई है। यह सब बातें जो उसके मन के भीतर घटित हो रही हैं, हमें कँगना की आवाज़ (वॉइसओवर) बताती चलती है। उसमें जानबूझकर कितना कच्चापन रख छोड़ा है। फॉर्मेट कितना रफ़ है। आवाज़ में कसक नहीं है, फ़िर भी पहली रात को लेकर घबराहट होंठों से लेकर चेहरे पर दिख जाती है। वह ख़ुद भी इस सब के भीतर उतरकर सबके साथ नाचने लगती है। ख़ूब नाचती है। वह झिझकती नहीं है।

इन दृश्यों को देखने से तुरंत पता लग जाता है, यह पारंपरिक उत्तर भारतीय शादी है। जिसमें इत्तेफाक से लड़का-लड़की उनके परिवारों की तरह एक-दूसरे को पहले से जानते भी है। और अगला सीन इसी लड़के के हिस्से का है। वह कहीं दिल्ली के किसी कोने में बड़ी सी दुकान में बैठा कॉफ़ी पीते हुए लड़की का इंतज़ार कर रहा है। उसके मन में भी कई सारी बातें चल रही होंगी, जिसे वह मोबाइल पर क्यों नहीं कह सका यही सोच सोच लड़की परेशान है। अपने भाई के साथ आई है। भाई बाहर ही रुक गया है। लड़का शादी को सिरे से मना कर देता है। भाई छोटा है पर शीशे में उस लड़के को मुक्का दिखाता है। दर्शक के रूप में हम स्तब्ध हैं और पृष्ठभूमि में गाना बज रहा है। हम सोच रहे हैं के आगे के हिस्से में कौन सी कहानी है? जबकि यहाँ शादी की सारी तय्यारियाँ अपने अंतिम दौर में चल रही हों, तब हम, इस ‘पोस्टमॉडर्न ट्विस्ट’ के साथ क्या करें? विकास बहल अब क्या कहेंगे? लड़की क्या करेगी? उसके परिवार वालों का क्या ‘रिएक्शन’ होने वाला है? जैसा कि लड़की को डर था, पापजी इस बात को सुनते ही ‘हार्टअटैक’ से मर जाएँगे, वह गलत साबित होती है। सारा परिवार लड़की के साथ है। इधर लड़की ने ख़ुद को, अपने मोबाइल फ़ोन के साथ, अंदर से कुंडी लगाकर, कमरे में बंद कर लिया है। उसे उम्मीद है कि वह विजय, जो वहाँ, मेज़ पर गिर गयी सूखी मेंहदी को निर्ममता के साथ नीचे फेंक रहा था, फ़ोन ज़रूर करेगा। ख़ुद भी फ़ोन ट्राय करती है पर मोबाइल स्विच ऑफ़ है। पर फ़ोन आएगा नहीं।

मेरे लिए फ़िल्म यहीं ख़त्म हो जाती है। या इसके थोड़ी देर बाद। जब लड़की अकेले ही अपने ‘हनीमून’ पर जाने का निर्णय करती है। उसका जहाज हिंदुस्तान से उड़ा और मन में ‘दी एंड’। उसने अपने पैसों से टिकट बुक कारवाई थी। शादी के दूसरे दिन वे दोनों पैरिस जाने वाले थे। आगे की कहानी क्या है? रानी अंततः क्या निर्णय लेगी, इसका पूर्वानुमान लगभग सभी को है। पर ज़रूरी है, घंटे, डेढ़ घंटे बाद इस निर्णय पर पहुँचने की प्रक्रिया क्या होने वाली है? क्या इसे ही ‘स्त्री मुक्ति’ की कहानी कहते हैं? यह भारतीय ‘पितृसत्तात्मक समाज’ में उसके स्वतंत्र होने का घोषणापत्र है? यदि वह बंधनों से मुक्त होना चाहती है, तो क्या उसकी स्वतन्त्रता की परिभाषा पुरुषों द्वारा किए गए कृत्यों की पुनरावृति ही होगी? सरल शब्दों में क्या इन बंधनों को तोड़ने के लिए उसे पुरुष हो जाना पड़ेगा? क्या उसके पास कोई और नक्शा नहीं है? यदि नहीं है, तो यह उन ‘सिद्धांतकारों’ की विफलता है, जो ‘स्त्री विमर्श’ के ठीहे सजाकर बैठे हैं। जो भारतीय संदर्भों, इसकी विविधताओं को न देखते हुए कहीं और मुखापेक्षी हैं। उनके आदर्श कहीं, किन्ही और समाजों में निर्मित हुए हैं। या फ़िर हम अपनी ज़िन्दगी किसी किताब को पढ़कर नहीं जीते, बस जी लेते हैं?

कितनी बार अनुराग कश्यप की यह बात मानकर बैठ जाया करें कि ‘यह कई सारी कहानियों में से एक कहानी है’। रानी वापस लौटकर विजय से शादी करने से इंकार कर देती है। क्या इस अंत की तरफ़ पहुँचने के लिए ज़रूरी था, हम विदेश प्रवास को ढाल बनाएँ? उसमें ऐसे कौन से गुणात्मक परिवर्तन होते हैं, जिससे उसके व्यक्तित्व में आत्मविश्वास का संचार होता है? हम एक समाज के भीतर उत्पन्न प्रश्नों के संभावित उत्तरों के लिए, उसी समाज की पैमाइश करने से डरते क्यों हैं? कभी हमने अपने अंदर यह कोशिश की हो, नज़र नहीं आता। क्योंकि हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक ‘विमर्शों’ में स्वतन्त्रता के मानक आयातित हैं, इसलिए इसके जवाब भी हम वहीं से लेते आएंगे। दिक्कत यह नहीं है कि लड़कियों का शराब पीना बुरी बात माना जाता है। लड़की अगर शराब पीकर ही स्वतन्त्रता महसूस करती है, तब हमारे यहाँ हर छोटी-बड़ी सड़क के किनारे, सरकारी ठेके क्या कम उग आए हैं? वह यहाँ के पुरुषों के साथ उस भीड़ का हिस्सा क्यों नहीं हो सकती, जो कल ‘ड्राइ डे’ होने की वजह से वहीं झगड़ रहे हैं? शायद निर्माता-निर्देशक वह हिम्मत नहीं दिखा पाते। या वे अपनी कहानी को ‘वास्तविकता’(?) के निकट ले जाने के लिए यहाँ से चले गये हैं? अगर वह ऐसे किसी तनाव से बचना चाहता है, तब भी हम अपने इसी देश में, नवउदारवाद के बाद ऐसे विदेशी ‘पबों’ की नक़लों को अपने यहाँ के बड़े-बड़े होटलों में बड़ी सहजता से देख सकते हैं। लेकिन यह बाद की कहानी भारत में क्यों ‘स्थित’(‘सिचुएट’) नहीं है? यह गंभीरता से पूछे जाने लायक सवाल है। क्या इन परिस्थितियों में कहानी का अंत यह नहीं हो सकता था? 

आप पैरिस से कुछ दूर किसी गाँव में पड़ने वाले ‘रेड लाइट एरिया’ को बड़े ‘ग्लैमरस’ तरीके से महँगे-महँगे कैमरों में उतार सकते हैं। अब तो आपके पास फ्रेंक हूजर की किताब ‘सोहो’ का संदर्भ भी है। वहाँ भारतीय समाज अनुपस्थित है। कोई रोड़ा नहीं है। वरना क्या यहाँ दिल्ली में ‘जीबी रोड़’ नहीं है? बंबई का ‘कमाठीपुरा’ क्या कम पड़ गया था? ‘सोनागाछी’ जादा दूर है, तो मेरठ के ‘कबाड़ी बाज़ार’ तक ही चले जाते। पर शायद यहाँ के चेहरों से लेकर लटकते स्तनों में हमारे अवचेतन में निर्मित, पाश्चात्य देह का जादू नहीं दिखाई देता। पहाड़गंज, शीला सिनेमा की तरफ़ से रेलवे पुल से नीचे उतरने वाला सीन इतना ‘फ़ोटोजेनिक’ नहीं बन पाता। यह पुरुषवादी ‘देव डी’ की कहानी नहीं है। फ़िर इसमें दिक़्क़तें भी कई होती। वहाँ स्त्रियाँ देह व्यापार को स्वेच्छा से अपनाती हैं या नहीं यह शोध का विषय हो सकता है, पर यहाँ, इनकी आँखों का नमक कुछ और ही कहानी कहता। उन्हे छिपाने लायक तर्क गढ़ने पड़ते। फ़िर इन देशज शहरों में सार्वजनिक रूप से ‘सेक्स टॉयस्’ की दुकाने नहीं हैं, जहाँ जाकर हम उन खिलौनों को खरीद सकें। कहीं किराये पर ऐसी सराय भी नहीं हैं, जिसमें लड़के-लड़कियाँ एक साथ, एक छत के नीचे, सरलता से कई-कई दिन रह सकें। सिर्फ़ अँग्रेजी से उठाए गए हिन्दी शब्दों ‘कौमार्य’ और ‘यौन सम्बन्धों’ को अँग्रेजी पारिभाषिक शब्दावलियों में ‘वर्जिनिटी’, ‘प्री-मैरिटियल सेक्स’ कह देने भर से या किसी अपरिचित विदेशी को चूम लेने मात्र से आप ख़ुद को ‘अपनी परिधियों’ में ‘स्वतंत्र’ महसूस कर रहे हैं, तब आपने ‘चोर दरवाज़े’ ढूँढ़े हैं। यह मात्र भ्रम है। यदि किसी अन्य परिवेश, समाज और संस्कृति की जीवनशैली की नकल ही आधुनिक अर्थों में ‘मुक्ति’ है, तब यह आपकी और मेरी समझ का मूलभूत अंतर है। इसे किसी भी अर्थ में स्वीकार नहीं किया जा सकता। शायद तभी नायिका का नाम ‘रानी’ होने के बावजूद, फिल्म का नाम ‘क्वीन’ है।

{पोस्ट जादा बड़ी भी हो गयी और ‘गझिन’ भी, फ़िर अचानक आकर ख़त्म भी हो जाती है, पर कुछ सीमाएँ मेरी भी हैं। वैसे समझ में कहीं कुछ मतभेद हो, तो उसका स्वागत है। और वो जो ‘हाइवे’ पर अपनी बात कहनी है, उसपर इधर जल्द ही लौटूँगा..}

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