सितंबर 20, 2014

क़बूलनामा: मृणाल मेरी प्रेमिका नहीं है

उस इमारत का रंग लाल है। अंग्रेजों के जमाने की। अभी भी है। ख़स्ताहाल नहीं हुई है। उसकी देखरेख करने वाले हैं। किसी लॉर्ड ने इसका शिलान्यास किया होगा। आज़ादी से पहले। कई बार उसे पत्थर को पढ़ा है, पर अभी याद नहीं है। यहाँ ख़ूब बड़े-बड़े कमरे हैं। जीने भी शानदार सीढ़ियों के साथ हैं। मुझे स्थापत्य कला का एक अक्षर भी नहीं पता, वरना इसपर बारीकी से ख़ूब लिखता। कविता भी करनी नहीं आती। वरना कितनी ही बार ‘आर्ट्स फ़ैकल्टी’ पर लयबद्ध पंक्तियाँ लिख चुका होता। इन बीते सात सालों में न जाने कितनी ही बार वह सपनों में आई होगी, पर कभी दिल में नहीं उतर सकी। कहीं रात को अचानक उठ जाने पर प्यास लगने की तरह।

इसकी पहली मंज़िल पर हिन्दी विभाग के दो कमरे थे। हम कमरा नंबर उनसठ में बैठा करते थे या अट्ठावन में? याद नहीं। रोज़ यह कमरा, नीचे लगे नोटिस बोर्ड की तरफ़ से सीढ़ियाँ चढ़ने पर दाएँ हाथ पर पड़ता। दिल बायें हाथ पर था। रोज़। इस तरह उस वक़्त हम दिल्ली विश्वविद्यालय, एमए हिन्दी के विद्यार्थी थे। ‘हंस’ का पहला अंक उसी जनवरी में ख़रीदा था। मीडिया विशेषांक था। ‘ज्ञानोदय’ ने शायद फरवरी-मार्च में उर्दू रचनाओं पर समग्र निकाला था। साहित्य में बड़े-बड़े नामों को सुनकर वहाँ आए थे। नौकरी का सवाल तब तक सतह पर नहीं था। कहीं नीचे दबा होगा। इस तरह दिखाई नहीं देता था। या हमें दिन वाली रतौंधी रही होगी।

विभाग ने इस यथा-स्थितिवादी हिन्दी भाषिक संरचना के भीतर परिवर्तन के लिए चुन-चुनकर ऐसी कृतियाँ पाठ्यक्रम में निर्धारित की थीं, जो इन सामाजिक-सांस्कृतिक मानकों पर प्रश्न-चिह्न लगाती थी। उनके बने बनाए ढाँचे हमारी आँखों के सामने भरभरा कर गिर जाते। अभी तक समझ नहीं पाया हूँ कि यह असल में अपनी वैधता को बनाए रखने की कोई युक्ति थी या कोई विरोधाभासी स्थिति। या शायद मेरा दृष्टिभ्रम? प्रेमचंद, भारतेन्दु, निराला, मुक्तिबोध के नामों से क्या होता है? यह बिलकुल ज़रूरी नहीं कि जिन विचारों, प्रति-विचारों, प्रतिबद्धताओं, भावों, बिंबों, प्रतीकों को हम वहाँ पढ़ रहे थे, वे उन कृतियों को पढ़ने में हमारी मदद करने वाले अध्यापकों के जीवन में भी परिलक्षित होते। पर इनसे, इन अध्यापकों से अपेक्षित अपेक्षाओं की बात करने तो आया नहीं हूँ। मुझे कहनी है, अपनी बात। जो बात कितने ही सालों से मेरे दिल में चुभती रही है। बात है, हमारे मनों की। वह सारी किताबें कैसी भी रही हों, उनका हमारे व्यक्तित्व पर क्या असर पड़ रहा था। हमारा दिल कैसे उन सब कही बातों को अपने अंदर समेटे जा रहा था। वहाँ लिखी एक-एक बात कैसे उन पंक्तियों से बाहर निकाल कर अपनी ज़ेबों में भर लिया था। असल में सबसे पहले यह पड़ताल ख़ुद की है। ख़ुद से शुरू करके अपने भीतर देखने की छोटी-सी कोशिश है। वरना मौका ही कहाँ मिलता है, इस तरह लिखने का।

हम उन दो सालों में जो किताबें पढ़ते हैं, पता नहीं उनका उसके बाहर कोई मतलब है भी या नहीं? उनको लेकर कभी इसतरह भी सोचा गया होगा? वह हमें क्या बना रही थी? हम किन दृष्टियों से सम्पन्न हो रहे थे? यह पंक्तियाँ उन पुस्तकों का किसी भी तरह अवमूल्यन नहीं करती, पर लगता है, इस तरह भी उन्हे देखना चाहिए। उन्होने स्वयं में किन मूल्यों विचारों को हम तक संप्रेषित किया इससे जादा ज़रूरी है उन्हे पढ़ने वाली घण्टियों में हमारा दिमाग किन तरहों से सोच रहा था। सुधीश पचौरी जिसे लड़कियों के लिए शादी से पहले का प्रतीक्षालय कहते थे, वहीं कई लड़के-लड़कियाँ जोड़बद्ध होकर रहने लगे थे। इस दरमियान ऐसा भी वक़्त आया जब बिना कसप  पढ़े, हम दिन में न मालुम कितनी दफ़े आगे लिखी बात को मन में दोहराते रहते। ‘वी फ़ील एंड फ़क इन द माइंड’। लड़के अपने दोस्तों से खाली कमरों की चाभियाँ माँगते रहे। उन्हे चाभियाँ मिलती रहीं। यह किसी परिघटना का साधारणीकरण नहीं है, उन बहुत सारी कहानियों में से कुछ कथाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह दैहिक निकटता सिर्फ़ विद्यापति को पढ़ने का परिणाम नहीं थी। उससे आगे जाकर यह कहीं भावनात्मक रिक्तता और मनोवैज्ञानिक शब्दावलियों में न फँस जाए, उससे पहले ही बता दूँ, यह मेरे हिस्से की कहानी कभी नहीं बनी। इसे किसी भी अर्थ में ‘नैतिक’ होने की थोथी कोशिश नहीं कहना चाहिए। यह ‘सुचिता’ का भी सवाल नहीं है। इनमें सबसे पहले यह झिझक को तोड़ने का पहला कदम है। प्रचलित अर्थों में बने बनाए खाँचों को तोड़ने की पहली घटना एकांत में लड़का-लड़की के मध्य घटित होती है। अंतर यह रह गया कि उन्होने व्यवहार से शुरुवात की और हमने विचार से। शायद ऐसे कहना चाहिए कि हमारी कोशिशे यहाँ दर्ज़ है और उनकी उनके मनों में कहीं छपी रह गयी होंगी।

मृणाल से मिलने का वक़्त बिलकुल यही था। उससे पहली मुलाक़ात उसी दायीं तरफ़ वाले कमरे में हुई। वह तब से ख़यालों में रहने लगी। यह ठीक-ठीक नहीं कह सकता कि वह मेरे सपनों में नहीं आती। जैसे कहीं से कोई यह नहीं बता सकता कि कितने लड़कों के मन में यह ख़याल आया और सामने वाली बैंच पर बैठी वह लकड़ी भी उन्ही तरहों से डूबी जा रही थी। मृणाल बिलकुल मेरी तरह लगी। चुप-चुप सी। शांत। किसी से कुछ नहीं बोलती। बिलकुल मेरी तरह खोई-खोई सी रहती। छत पर जाती तो पतंगें देखती रहती। वहीं ज़मीन पर आड़ी-तिरछी रेखाएँ बनाती रहती। वह धीरे-धीरे ख़ुद को तोड़ रही थी। एकबार उसकी गैर-मौजूदगी में हमसब बात करने लगे। वह कहीं धीरे से दिल में उतरने लगी। अपूर्वानंद बहुत अलग ढ़ंग से ‘त्यागपत्र’ पढ़ा रहे थे। उनका प्रस्थान बिन्दु पता नहीं क्या था? वे उन कक्षाओं में हमें किन तरफ़ों की ओर ले जाना चाहते थे? हम किन विशेष तरीकों से उनकी अनकही स्थापनाओं को जान जाएँ। प्रमोद की बुआ मृणाल। मेरी मृणाल। वह पता नहीं उन दीवारों से कब निकाल मेरे दिल की धड़कनों में समा गयी। वह कितनी बार कहती है, ‘मुझे कुछ नहीं तोड़ना। अगर यह समाज टूटेगा, तो हम किसके बीच रहेंगे?’ इसके बाद भी वह कोई ऐसा काम नहीं करती, जिससे यह समाज बचा रहे। मास्टर जी ने हमारा ध्यान, प्रमोद के अपनी बुआ की तरफ़ आजीवन बने रहने वाले आकर्षण की ओर भी दिलाया। वह कुछ ऐसा देख पा रहे थे, जो उनके सम्बन्धों को पुनर्पारिभाषित करने की माँग करने लगता। यह मृणाल ही थी, जिसने मेरे अंदर पहले पहल यह बात भर दी कि इस समाज में कुछ भी बचाए जाने लायक नहीं है। जो टूट रहा है, उसे टूट जाने दो। इसके भी इसके बाद बचा रहेगा, वही हमारा समाज होगा। जहाँ हम रहेंगे। कोई कुछ नहीं कहेगा।

आज अंदाज़ भी नहीं लगा सकता कि मृणाल ने मेरे मन को कितनी तरह से तोड़ा? वह मेरे अंदर, मेरी रगों में दौड़ने लगी। जो कुछ भी था, वह इसी भाव, विचार के इर्दगिर्द सिमट कर रह गया। पता नहीं इस लड़की से इस बात को लेना भी था या नहीं? इसके मेरी ज़िन्दगी में आने के बाद कुछ भी पहले की तरह नहीं रहा। इसके चरित्र ने इतना अपनी तरफ़ खींच लिया, जिसे आजतक समझ नहीं पाया हूँ। कभी-कभी सोचता हूँ, इतनी ही सघनता से उस कमरे में बैठे हुए, हम सबमें से और कौन-कौन मृणाल को इस तरह से अपनी ज़िन्दगी में ले आया होगा? शायद यह हमारे लिए चयन का प्रश्न कभी नहीं रहा होगा। वह जहाँ तक अंदर आ पायी, वह बिना किसी रोकटोक चली गयी। अवचेतन ऐसे ही काम करता होगा। बिन पूछे। ऐसी कितनी ही बातें हैं, जिन्हे अपने अंदर देख कर सोचने लगता हूँ। यह मेरे ‘असामाजिक’ होने की शुरुवात भी थी। सब कहते इतने खोये खोये से क्यों हो? तब उन्हे कुछ नहीं कह पाता। यह किसी भी ढाँचे को बनाए रखने की कोई कोशिश नहीं दिखती थी। पर यह भी पता है सिर्फ़ मृणाल नहीं, और भी बहुत सारे घटक होंगे, जिन्होने मुझे इस तरह बुना होगा। आज सबसे पहली याद में मृणाल का ख़याल आया। पता नहीं दिमाग में, दिल में, मन में और कौन-कौन कहाँ-कहाँ घर करके बैठे हुए हैं? यह पड़ताल ऐसे ही जारी रहेगी। कभी तेज़, कभी धीरे। कभी भूलते हुए, कभी याद करते हुए। हमने इस लिखने को किस तरह अपने अंदर पाया, इस सवाल का जवाब, हम सबके पास होना चाहिए।

2 टिप्‍पणियां:

  1. केवल सवाल ही हैं, पता ही नहीं इसके जबाब कहाँ किस बादल के पीछे छिपे होंगा

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    1. लगता कुछ ऐसा ही है। पर कहीं भी हों, हम उसे ढूँढते रहेंगे। ऐसे ही, या कुछ अलग तरीके से।

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