सितंबर 02, 2014

दादी नहीं रहीं..

शनिवार तीस अगस्त, शाम साढ़े छह बजने के आधे घंटे बाद, लगभग सात बजे। उधर से छोटे जन का फ़ोन आया। दादी नहीं रहीं। दिमाग ठीक रहे, तब वाक्य भी ठीक आयें। पर ख़ैर। उनके ठीक होने का कोई मतलब नहीं रह गया, जिनको ठीक होना था, वो अब चली गईं। मंगलवार उन्हे लखनऊ से वापस ले आए। डॉक्टरों ने घर वापस भेज दिया। कहा होगा, अब कुछ नहीं हो सकता। इस ‘अब कुछ नहीं हो सकता’ सुनने से पहले, उसी सुबह किसी ‘सुलभ शौचालय’ के बाहर नहाने-धोने की बारी का इंतज़ार करते, पैंट की जेब में दस हज़ार रुपये रखते, किसी ‘ज़रूरतमंद’ ने देख लिए होंगे और मौका देखते ही मोबाइल के साथ पैंट लेकर चंपत हो गया। उसकी जरूरतें भी हमारी तरह कभी खत्म नहीं होंगी। वह फ़िर किसी कोने से छिपकर दाँव लगाएगा।

हर तरह के समाजों में इन्ही सबसे ‘ज़रूरतमंदों’ को ‘चोर’ कहकर पुकारा जाता है। उसने अपनी आवश्यकताओं के लिए यह क़दम उठाया होगा। पैसा किसी की ज़िंदगी से बड़ा थोड़े है। वह अपनी ज़िन्दगी बचा रहा है। यह उसकी जिजीविषा है। उसके जीने की ललक है। उसे तो किसी ‘डॉक्टर’ ने ऐसा कोई जवाब नहीं दिया। वह ज़िंदा रह सकता है। ऐसे ही ज़िंदा रहेगा। लेकिन इस तरह बड़ी निर्ममता से बुआ-फूफ़ा के वहाँ रुके रहने का आर्थिक आधार भी चला गया। चाय पीने के रुपये भी नहीं बचे। और इसतरह अब लखनऊ से भी उन अधूरी उम्मीदों के साथ खाली हाथ वापस लौट आए। दादी अब कभी ठीक नहीं होंगी। कह रहे हैं, दादी ‘पीजीआई’ में डॉक्टरों के एक सूई लगाने के बाद से कुछ भी नहीं बोली। बस पूरा-पूरा दिन सोती रहतीं। शरीर में कोई हरकत नहीं। सब ‘कोमा’ की तरह बताते रहते। पता नहीं कैसी दवाई थी। यहाँ गोण्डा, फैज़ाबाद होकर लखनऊ पहुँचने के दरमियान कुछ-कुछ बोलती रही थी। कुछ कह भी देती होंगी। पर वहाँ से मृत्यु की छाया में लौटना कितना असहनीय होगा। हम चाहकर भी सिर्फ़ दादी को मरता देख सकते हैं। कुछ कर नहीं सकते। कैसे चुप सब चहरे उन दादी की तरफ़ देखते होंगे। 

हारी-बीमारी में जो कुछ कर सकते थे, उन्हे हम सब ‘डॉक्टर’ कहते हैं। बहराइच में उन सबने क्या किया? अपनी जेबें भरी। क्या कभी वह सोचते भी होंगे, क्या कर रहे हैं। जो मरीज़ उनके सामने है, सिर्फ़ वही मरीज़ नहीं है, उसके इर्दगिर्द जितने भी उसे घेरे खड़े बैठे हैं, जितने भी छोटे-बड़े हैं, सब बीमार हैं। उस एक ‘स्त्री’ के ठीक हो जाने पर सब यकबयक ख़ुद ठीक हो जाएँगे। वो जो पैसा कर्जा काढ़कर लिया है, उसे दुगनी ताकत के साथ चुकाने के लिए ‘जंगलिया बाबा’ से लेकर ‘बेरिया’, ‘पाटन’ तक कोई मेला नहीं छोड़ेंगे। ‘अंडगवा’ से ‘रत्नापुर’, ‘गुधड़िया बाबा’ में झंडी लगा लगाकर कमाई करेंगे। इसबार तो ‘दरगाह मेला’ बीत गया, पर अगली बार रात-दिन एक करके, उस एक डंडे पर टिकी दुकान से पैसा बनाएँगे। और ऐसा करते करते चार पाँच साल बीत जाएँगे, फ़िर भी पैसा नहीं उतरेगा। तब एक तरक़ीब काम आएगी। एक से मांगेंगे दूसरे को चुका देंगे। और कर्ज बदस्तूर सिर पर वैसा-का-वैसा बना रहेगा। फ़िर एक साल आएगा, जब लड़की की शादी करनी होगी। तब उसी ‘पहले’ से उसी पैसे को उधार माँगकर कन्धों पर रख लेंगे। कि कभी ऐसे ही चुका देंगे। उधार से उधार चुका देने वाला गणित, ज़िन्दगी की किताब का सबसे मुश्किल अध्याय है।

बहराइच में जितने भी डॉक्टरों के महलनुमा घर हैं, उनमे, इन्ही जैसे न जाने कितनों के ख़ून-पसीने से माँगे, कर्ज़ों का पैसा लगा है। इसका कोई हिसाब नहीं कि उनके यहाँ कितनी ज़िंदगियाँ सही सलामत घर पहुँची। और कितनों की लखनऊ? लखनऊ यहाँ के लोगों के लिए अभी सपनों का शहर नहीं है। जो जितना कम पढ़ा लिखा है, वह उसे उतना डराता है। शायद हर शहर का ढाँचा कमोबेश उनके लिए एक-सा रहता हो। यहाँ ‘प्राइवेट क्लीनिक’ में पता ही नहीं चल पाया कि क्या परेशानी है? वह सही ‘डायग्नोज़’ नहीं कर पाये। बस अंदाज़े से दवाई देते रहे। ऐसा नहीं है कि वे सब कुछ कम डॉक्टर हैं। अपनी इसी क़ाबिलियत के दम पर हर शनिवार रात लखनऊ के लिए चल पड़ते हैं। इतवार हमारे बहराइच में किसी डॉक्टर ढूँढ़ना हो, तब पता चले, यहाँ कोई नहीं है। सब बड़े शहर चले गए हैं। जिसे मरना हो, एक दिन छोड़कर मरे। इन डॉक्टरों की जेब भरकर मरे। वह सब हर जुमेरात बाराबंकी में पाये जाने वाले ‘हकीम एम शाकिब’ हो जाते हैं। पता नहीं, अगर यहाँ ‘जिला अस्पताल’ न होता, तब कितने डॉक्टर, इस पिछड़े से जिले में स्वेच्छा से ‘प्रैक्टिस’ करने के लिए रुकते। उन्हे रोकने का कोई भी कारण यहाँ तो दिखता भी तो नहीं है।

लखनऊ के अस्पताल ने भी यहाँ की तरह हाथ खड़े कर दिये। पर उनके सामने दोषी थी, बहराइच के ‘क्लीनिक’ में दी गयी दवाइयाँ। कहने लगे सिर में जो मवाद, दिमागी बुखार के बाद बनना शुरू हुआ था, वह बनना रुका नहीं। अब हालत यह है कि वह पूरे शरीर में फैल गया है। इसके असर को इतने दिनों बाद पलटा नहीं जा सकता। हम अब कुछ नहीं कर सकते। आप इन्हे वापस घर ले जाइए। इतना सुनकर सब चुपचाप घर वापस लौट गए। कोई और चारा नहीं था। हम लोग यहाँ ‘गोमती एक्सप्रेस’ से वहाँ दादी को देखने की बात कर रहे थे। पर शायद हमने देर कर दी। उनके पास इतना वक़्त नहीं था। उस मड़हे के नीचे पड़ी चारपाई पर दादी भी दूसरी चारपाई की छाया बनकर लेट गईं। कोई हरकत नहीं। जिस करवट लिटा दो, उसी करवट लेटे रहतीं। कुछ भी नहीं बोलती। बिलकुल चुप। आँख खोल एकबार भी नहीं देखा, नेपालगंज से गुड़िया बुआ के साथ सीलू भी बगल में बैठी हैं। मंजू और संतोस बुआ भी साड़ी के पल्लू मुँह में दबाये कुछ-कुछ याद कर रही हैं। सारे फूफ़ा भी कभी अंदर कभी बाहर हो रहे हैं। कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करें? गाँव के लोग बारी-बारी दादी को देखकर जा रहे हैं। पापा ने चार तारीख़ का टिकट बनवा लिया था। सीट नहीं मिली थी। किसी तरह जाते, देख आते। सब एकबार फ़िर आख़िरी उम्मीद में वापस बहराइच ले गए। डॉक्टरों ने भर्ती करने से मना कर दिया। पर पता नहीं कैसी उम्मीद के सामने, एक रात रखने के लिए तय्यार हो गए। ‘जिला अस्पताल’ में आँख खोल शायद आख़िरी बार अपने आस-पास देख लेना चाहती थीं। उस देख लेने के बाद, उन्होने कभी आँख नहीं खोली। शाम साढ़े छह बजे वह चली गईं।

दादी तब थीं, वो पन्ना..एक वो जो सड़क थी, एक वो जो पेड़ था ।

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