सितंबर 29, 2014

एक बनती हुई पोस्ट का बिखर जाना..

मुझे नहीं पता इन आगे लिखी जाने वाली पंक्तियों को किस तरह लिखा जाना चाहिए। बस दिमाग कुछ इस तरह चल रहा है, जहाँ यह समझना बड़ा मुश्किल है, क्या चल रहा है? दो साल पहले की कोई बात है, जिसके आसपास यह सब घटित हो रहा है। यह ख़ुद को दोहराने जैसा है। किसी तरह अपने अतीत को फ़िर से सामने देखने की तरह। पर सच इतना होते हुए भी वह मेरी तरह बिलकुल नहीं है। कुछ-कुछ समानतायें सतही तौर पर हो सकती है, पर उसे देखकर लगता है, इस ‘पैटर्न’ को ट्रेस किया जा सकता है। जहाँ कुछ-कुछ बातें हम सबमें समान होती ही होंगी। ‘वॉट्स एप’ से उसके बचपन की तस्वीर को यहाँ इस पोस्ट के साथ इस्तेमाल करने की बात करते हुए कहा था, कुछ लिखुंगा तब उसके साथ लगा लूँगा। पर ऐसा सच में नहीं करने वाला।

इसे किसी दोस्त के साथ हुई पहली मुलाक़ात की तरह याद नहीं कहा जा सकता। ‘अध्यापक’ और ‘विद्यार्थी’ कभी मिलते नहीं हैं। वह अपनी भूमिकाओं में कभी दोस्त नहीं हो सकते। इस अर्थ में वह कक्षा में एक-दूसरे के विपरीत होते हैं। इसे विलोम अवस्था भी कहा जा सकता है, जिनकी शास्त्रीय व्याख्याएँ बहुत पीछे तक जाती हैं। मैं आज तक नहीं समझ पाया कि हमलोग उस सरकारी स्कूल में दो साल पहले क्या कर रहे थे? यह मात्र संयोग ही था कि उस वक़्त, रोज़, बारहवीं कक्षा की हिन्दी की घंटी में जाता रहा। मनोज खन्ना तब वहाँ नहीं थे। जब तक वे वापस आते, तब तक कक्षा के विद्यार्थी मुझमें उनकी छवि ढूंढ़ने में व्यस्त रहे। यह मेरे लिए त्रासद स्थिति थी कि मैं खन्ना जी की तरह पढ़ाने में बिलकुल असमर्थ था। उनके पास तुलना के लिए एक मास्टर थे, जिनको पढ़ाते वक़्त मैंने कभी नहीं देखा था। वह ‘मिथक’ की तरह मेरे व्यक्तित्व के इर्दगिर्द उपस्थित रहने लगे। उनकी सबकी इस अपेक्षाओं के बीच मेरा कक्षा में टिके रहना, बीती रात देखे बुरे सपने में तब्दील होता गया। और इस तरह हम उन दीवारों के भीतर किसी भी तरह ‘शैक्षिक’ कहे जाने लायक ‘अनुभवों’ से हम गुज़रने में असमर्थ थे।

वह विरोधाभासों से भरे दिन थे। बिलकुल आज की तरह। कहीं से भी कोई संगति नहीं बैठती दिख रही थी। इन सबके बीच वहाँ एक लड़का था, जो अपनी कवितायें मुझे दिखाता। इसे संवाद की पहली कोशिश भी कह सकते हैं। हम वहाँ कक्षा के भीतर किन रूपों में अपनी छवि छोड़ रहे हैं, पता लगना बहुत ही मुश्किल है। पर कोशिश रहती थी कि कुछ संभावनाओं को हमेशा अपने पास, अपने अंदर बचाए रखें। वह ऐसी ही एक संभावना था, जो अवसर मिलने पर आगे बढ़ सकता था। बस, हम यहीं तक सोचकर बैठ जाते। आगे कुछ भी करने में असमर्थ। निरीह। असहाय। आज वह दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में ‘हिन्दी ऑनर्स’ द्वितीय वर्ष का छात्र है। यहाँ उन पीछे रह गयी किसी याद में ऐसा कुछ नहीं दिखता, जिसमें उसके इस दाख़िले में इस विद्यालय की किसी भी तरह की रचनात्मक भूमिका को रेखांकित किया जा सके। हम ‘अध्यापक’ भी कहीं नज़र नहीं आते। आज दो साल बाद, इन सारी बातों को याद करने का कोई मतलब रह गया है? शायद यादें ऐसे ही पीछे ले जाकर उनके नए अर्थों से हमें भर देती होंगी। इन्ही यादों के किसी छूट गए पन्ने पर देख रहा हूँ, तो समझ नहीं पाता उसने हिन्दी जैसे कोर्स में दाख़िला लेकर गलती कर दी।

इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे कहने लायक माना जा सकता हो। फ़िर भी कह दूँ कि हिन्दी इन बनते दिमागों के लिए नहीं है। कम-से-कम इसके ‘साहित्य’ के लिए तो कही सकता हूँ। यह दिमाग को किसी भी तरह से खोलता नहीं, एक बंद गली की तरफ़ लाकर पटक देता है। यह ‘विषय’ के रूप में ‘विचारधारात्मक’ रूप ले चुका है, जो अपने पाठक के रूप में, किसी भी तरह से संस्कारित करते हुए, एक ठीक-ठाक व्यक्ति बना लेने की काबिलियत से भी चुकता रहा है। इसपर सिलसिलेवार तरीके से सोचने की ज़रूरत है। हिन्दी वंचितों की भाषा है। इस पिछली पंक्ति को फटे जूते की तरह कितनी बार घिस चुका हूँ, याद नहीं आता। सच, जब उसने मुझे यह बात बताने लायक समझी कि वह हिन्दी पढ़ रहा है, तो किसी भी तरह से दिल बाग बाग नहीं हुआ था। वह एकदम सूखकर काँटा हो गया। एक सरकारी स्कूल से पढ़ा हुआ लड़का इस जैसी मारी हुई भाषा में कहाँ तक बढ़ सकता है, कोई नहीं बता सकता। अर्थशास्त्रीय दृष्टि से इसकी उत्पादकता शून्य पर जा पहुँची है। अनुवादक भी वही बन सकता है, जो दूसरी औपनिवेशिक भाषा पर कुछ अधिकार रखता हो। फ़िर स्क्रिप्ट लिखने का शास्त्र भी अंगरेजी में स्थित है। विज्ञापन को तो जाने ही दो।

मैं इसे इस तरह लाकर ख़त्म नहीं करना चाहता था। किस तरह से अंदर-ही-अंदर यह लगातार चलती रही है। इसमें वह लड़का तो कहीं नज़र ही नहीं आया। लगता है, मेरे दिमाग पर अभी भी, भाषा के इस रूप को लेकर बहुत से संदेह बने हुए हैं, जो लगातार इसी तरफ़ ढकेल देते हैं। वह मन को किसी भी तरह से मना नहीं पाती। उसकी सारी प्रत्याशाओं में कहीं व्यक्तित्व का विभाजन, लगातार इतना गहरा होता जाएगा कि कुछ समझ नहीं आएगा। इस पोस्ट को एक दिन फ़िर दोबारा से लिखुंगा। और तब कोशिश करूँगा कि इस छाया से बाहर निकल, उसके इन दिनों को कह पाऊँ। यह द्वेष कुछ कम हो जाये। अभी नहीं कह पाया, एक बार फ़िर मन वहीं घिर गया। काश ऐसा न होता। इसे पढ़ने के बाद लगता है, यह शुरू से ही बिखर कर टूट गयी थी, इसे संभाल नहीं पाया.. ख़ुद को इसके एक ‘टेक्स्ट’ के रूप में पढ़ने की ज़िद इसी तरह खुदबुदाती रहती है। शायद यह एक स्थायी ग्रंथि का आकार लेती जा रही है। इससे बचने की कोशिश भी नहीं दिखती। पता नहीं लगता है यह कितनी ख़तरनाक है। आगे कभी देखते हैं। क्या होता है।

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