सितंबर 18, 2014

करनी चापरकरन: यह चौथी सालगिरह: मेरे मन की दुनिया

तारीख़ अट्ठारह सितंबर। साल दो हज़ार चौदह। एक साल और बीत गया। इसे ‘जुड़ गया’, कहने का मन था। फ़िर भी क्यों नहीं कह पाया, पता नहीं। इस दुनिया में हमारी भी गलियाँ, कई खिड़कियों से गुजरते दृश्यों को ‘स्थिर’ कर सामने रख देती होंगी। किसी विचार के भीतर घूमते, किसी याद को याद करने के दरमियान, कहीं किसी मोड़ पर दो पल रुकते, कोई पेड़ याद आ जाया करता होगा। कहीं से झींगुर की अनसुलझी झंकारों को सुन, हम आराम से कोहनी के बल गर्दन टिकाकर, वहीं से, चुपचाप, अबोले, सबकुछ देखते रहे होंगे।

लगता है, पूरे साल इसी तरह की भाषा के साथ खेलता रहा। इसे शायद ‘खेलना’ ही कह रहा हूँ। इसे ठीक से न समझने के कारण भी ऐसा हो सकता है। लगता है, यही सच है। इसमें हद दर्ज़े का बनावटीपन है। एक अपनी दुनिया रच लेने की ज़िद है। जहाँ कोई नहीं है। कोई नहीं। बस इन्ही शब्दों से बने मड़हे के नीचे, उस टूट गए गिलास में चाय पीते, कोई ख़याल आकर ठहर गया है। असल में यह ठहरना ही है। यह किसी आने वाले कल के आने से पहले, अपने फटे पजामे से बने झोले को उठाकर चल देना है। इंतज़ार करने से मना कर देना है। पहले जब जेब में शब्द थोड़े कम पड़ जाते थे, तब राह चलते किसी बड़े कवि के गले पर हसिया रख, उन्हे लूट लिया करते थे। यह हमारी रचना प्रक्रिया को उघाड़ देने जैसा है। मेरे हिस्से यह कवि ‘मुक्तिबोध’ पड़े। ‘उदरभरि बन अनात्म बन गए, भूतों की शादी में कनात से तन गए’। चेतन अवचेतन में बराबर उपस्थित। इस तरह इन बीते सालों में, मैंने इन्हे अपने अंदर से बेदख़ल करने की कितनी कमजोर-सी कोशिश की है। कोशिश की कि यह फ़िर कभी याद न आयें।

अब मेरे दिल में राजेश जोशी हैं। विनोद कुमार शुक्ल हैं। थोड़ी उनकी कविता है। थोड़े उनके गद्य हैं। मन भी कभी-कभी इन्हे दोहरा लेता है। गुनगुना लेता है। फ़िर भी लिखना, ‘जो मेरे घर कभी नहीं आयेंगे, मैं उनसे मिलने, उनके पास चला जाऊँगा’ जैसी इन पंक्तियों को मन में दोहराने जितना असान नहीं रहा। वह ख़ुद को बराबर तोड़ने जैसा है। अपनी पड़ताल करने जैसा। उसमें हर जगह हम ही हैं। और हम कहीं नहीं हैं। हमने कभी बुधई की तरह जामिन मियाँ से पेड़ लगाने के लिए ज़मीन नहीं माँगी। इस जगह को, इसकी डालियों के अँखुआये मुलायाम नाज़ुक से पत्तों को अपने दिल के अंदर हमेशा वैसे ही रहने दिया। किसी को उन्हे छूने नहीं दिया। फ़िर कितने ही सवाल अंदर-ही-अंदर उमड़ते घुमड़ते रहे हैं, उनका कोई हिसाब नहीं। कहीं किसी जगह दर्ज़ होने लायक बनने से पहले ही वह सूरज की गर्मी में पिघल गए। उमस में न सूखने वाले पसीने की तरह छा गए। छा गए किसी बादल की तरह।

मैं इतनी अजीब तरह से क्यों लिख रहा हूँ? इसका कोई जवाब मेरे अंदर से बाहर की तरफ़ नहीं निकल रहा। क्यों नहीं मैं भी थोड़ी देर ‘नॉस्टेलजिक’ होकर उन पीछे बीत गए दिनों की यादों में डूब जाता? जहाँ से हम शुरू हुए थे। अभी कितनी संभावनाओं को टटोलना बाकी रह गया है। कितनी हदबंदियों को तोड़ना है। कितनी ही तरहों से अपनी बातें कहनी है। क्या इस दिन कहने लायक कोई बात मेरे अंदर बची नहीं रह गयी है? शायद अवचेतन कहीं और खो गया है लगता। वह ‘रिसपॉन्स’ नहीं कर रहा। यह एक तरह का ‘ब्रेकडाउन’ है। मुझे भी सड़क किनारे खड़ी डीटीसी बस की तरह ‘रिकवरी वैन’ की प्रतीक्षा करनी चाहिए। या सबसे जादा यह उस आख़िरी साल की बात सोच-सोच बैठा जा रहा है। वह भी तो अपने आप को कितना मानता होगा। यहाँ आने के लिए। यहाँ से जाने के बाद।

यह सब बातें इसे, इस जगह को, इस तरह से गढ़ती रही हैं, शायद इससे बाहर कहीं नहीं हो सकती थीं। यह मेरे भीतर की दुनिया है। मेरे सपनों की दुनिया। उसे रचने वाला सिर्फ़ और सिर्फ़ मैं हूँ। वह जैसी भी हैं, मेरी सीमाओं के दायरों में बनती बिगड़ती रहीं हैं। यह बड़े आहिस्ते से, अनछुए, नाज़ुक से मकड़ी के धागों से बने घर की मंज़िलें हैं, जिनपर इससे पहले कोई चहलकदमी नहीं थी। विचारों का आग्रह इन बीतते सालों में धीरे-धीरे कम होता दिख रहा है। उनका रूमान उन शुरुवाती दिनों की तरह नहीं रह गया। यह फेफड़ों के बीच धड़कते दिल की दिमाग पर बड़ी ही भावुक-सी जीत है। इसे एक दिन ऐसे ही हो जाना था। जैसे-जैसे हम उमर के सालों में बड़े होते जाते हैं, वैसे-वैसे हम अपने मन की दुनिया ढूँढने लगते हैं। धीरे-धीरे यह ‘ब्लॉग’ मेरे मन की दुनिया में तब्दील होता जा रहा है। जो जहाँ है, जैसा है, मेरे मन का है। इस तरह यह मेरे दिल की बाहर से दिखने सबसे कोमलतम अभिव्यक्ति है।

{तारीख़ इन पिछले बीते सालों में कभी सत्रह कभी अट्ठारह होती रही हैं। इस साल से पहले की कड़ियाँ यहाँ दिये दे रहा हूँ। पहली सालगिरहदूसरी सालगिरहतीसरी सालगिरह। इस पाँचवे साल के बाद क्या कोई और साल नहीं जुड़ेगा ..पता नहीं .. }  

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