सितंबर 15, 2014

इन पुरस्कारों का होना..

इसे किस तरह लेना चाहिए, पता नहीं। सब यही कहेंगे, इस पर कुछ नहीं कहना चाहिए। पर कहीं अंदर से लगता है, बात होनी चाहिए। गंभीरता से होनी चाहिए। हम नहीं करना चाहेंगे, फ़िर भी। थोड़ी झिझक के साथ। थोड़े छिपकर। कुछ नाम के साथ करेंगे। कुछ नाम नहीं लेंगे, सिर्फ़ संकेत या सूत्र वाक्यों में निपट जाएँगे। क्या सच में इसपर कोई बात नहीं होनी चाहिए? लगता है बात न करना, चुप रहकर किसी भी तरह से ‘चुप्पी की संस्कृति’ का हिस्सा बन जाना है। इसलिए बात ज़रूरी है। यह किसी भी तरह से शहीदाना पोस्ट नहीं है। न इसे किसी पहाड़ के पीछे पड़ने वाले अरुण कमल की तलाश में निकले सहयात्री खोज पूरी हो जाने के उत्सव की तरह देखा जाना चाहिए। शुरू में ही कह दूँ, यह कुछ भी हो जाने से पहले इस माध्यम के बारे में संवाद शुरू करने की एक छोटी-सी कोशिश भर है।

कल हिन्दी दिवस पर एक चैनल ने हिन्दी उत्सव का आयोजन किया। यह एकसाथ हिन्दी भाषा की संभावनाओं को तलाशता, टटोलता, उसके आने वाले भविष्य की साझी पड़ताल तो था ही, साथ में इस भाषा में लिखने वाले दस ब्लॉगरों को चुनकर उन्हे सम्मानित भी किया गया। एक गैर-परंपरागत माध्यम के लिए ऐसी परंपरा का अनुशीलन स्वयं में अंतर्विरोधी बात है। जहाँ ऐसे पुरस्कारों और सम्मानों की विश्वसनीयता कितनी रह गयी है, वाला सवाल कोई मायने नहीं रखता। उनके द्वारा नियुक्त निर्णायक मण्डल में सुधीश पचौरी, कुमार विश्वास, गीतकार प्रसून जोशी और नीलेश मिश्र थे, जिन्होने इन ब्लॉगरों को चुना। इस चतुर्दिक मण्डल का इस गैर-परंपरागत माध्यम की ‘सैद्धांतिकी’ से परिचित होना और उसे ‘व्यवहार’ में लाना दो अलग-अलग बातें हैं। और शायद यह मात्र संयोग ही है कि इनमें से किसी भी व्यक्ति के नाम कोई ‘ब्लॉग’ कहीं पंजीकृत नहीं है।

सुधीश पचौरी हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता आदि दैनिक अख़बारों में लिखने को इस विधा के अंतर्गत मानते हों, इसका भी कोई प्रत्यक्ष संकेत वे अपने गरिष्ठ ललित निबंधों, लेखों में कभी नहीं करते हैं। हाँ, उनके दिल्ली विश्वविद्यालय में पदासीन रहने के बाद भी आर्ट्स फ़ैकल्टि, स्पिक मैके कैंटीन के बगल वाली किताबों की दुकान ज़रूर अभी तक गायब है। कहीं नज़र नहीं आ रही। प्रसून जोशी फ़िल्मी गीतों और विज्ञापनों के लिए शब्दों को लयबद्ध करने के साथ-साथ, कभी-कभी इतवार के नवभारत टाइम्स में हिन्दी के चेतन भगत बनने की असफल कोशिश करते दिख जाते हैं। पता नहीं इनकी 'वॉट यंग इंडिया वॉन्ट्स' कब तक प्रकाशित होकर आती है? नीलेश मिश्र एफ़एम रेडियो पर एक ही टोन में स्वरबद्ध कहानियों के साथ अपना यादों का इडियट बॉक्स लेकर आते रहे हैं। वे कहानियाँ किसी ने भी लिखी हों, जो दो किताबें फ्लिपकार्ट पर इसी नाम से हैं, उसपर इनका ही नाम है। जैसे दिलीप मण्डल अभी अपने फ़ेसबुक स्टेटस पर भीम राव अंबेडकर की किताब के नाम के साथ समानता बता रहे हैं, बिलकुल वैसे ही। और आख़िर में बचे कुमार विश्वास। इतने बड़ी कवि हैं कि हवाई जहाज से लेकर सारा ख़र्चा इनके प्रायोजक उठाते हैं। अभी के लेटेस्ट खुलासे में उन्होने बिग बॉस को उघाड़ा है। कह रहे हैं, सब फ़िक्स होता है। मेरे डायरी लेजाने की शर्त मान ली गयी थी। पर नहीं गये। नहीं जायेंगे। पिछले दिसंबर तक 'आप' के साथ थे, अब नरेंद्र मोदी की तरफ़ अपना रुझान प्रकट कर चुके हैं। इस तरह यह सब हिन्दी के प्रबुद्धजन सिद्ध होते हैं, इनके हाथों, कंधों, पैरों, ज़ेबों, कुर्तों में इस भाषा का भविष्य सुरक्षित ही नहीं दीर्घजीवी भी है।

क्या 'ब्लॉग' सिर्फ़ भाषा का मामला है? चैनल की वेबसाइट इस हिन्दी उत्सव पर कहती है: 'इन सब के बीच एक नई हिन्दी का जन्म हुआ है। यह नई हिन्दी है, इंटरनेट पर ब्लॉग लिखने वाले तामाम ब्लॉगर्स की। इस नई हिन्दी की अपनी एक नई दुनिया है। यह नई दुनिया हिन्दी के लिए बेड़ी बनेगी या पंख यह अभी तय होना बाकी है'। उन्होने ब्लॉग को सिर्फ़ भाषा माना है। हम उसे क्या माने, अभी तक तय नहीं किया है। जितने लिखने वाले हैं, यह उतने ही तरहों का है। इसकी कोई चौहद्दी नहीं है। कोई नहीं कह सकता कि यही ब्लॉग है। हमने लगातार इसकी सीमाओं को तोड़ा है। इसका अपना मिज़ाज है, जिसे समझने के लिए सिर्फ़ भाषा एक कमज़ोर औज़ार है। इसे पढ़ने वाला कितना समझ रहा है, उस बारे में लिखने वाला क्या सोच रहा है? कभी इसपर हमने बात शुरू नहीं की। पर कभी-कभी लगता है, इसे इस तरह भी जानने की कोशिशें शुरू होनी चाहिए। जितनी जल्दी हो सकें, उतनी जल्दी।

और शर्तिया यह उक्त प्रबुद्ध हिन्दी टाइप लोगों से तो होने से रहा। यह हम लोगों को ही शुरू करना होगा, जो इस गैर-परंपरागत माध्यम में ही पहली बार ख़ुद को व्यक्त कर रहे थे। कर रहे हैं। यह ख़ुद को कहने का पहला और आख़िरी माध्यम था। अभी भी है। इन पुरस्कार वितरण संस्थाओं की समझ का आलम यह है कि जो पत्रकार अख़बारों में प्रकाशित टिप्पणियों को संग्रह की दृष्टि से ब्लॉग पर पोस्ट कर रहा है, उनके लिए यह गंभीर ब्लॉग लेखन की श्रेणी में आता है। वे ख़ुद एक पोस्ट बनाकर वहाँ गर्व से कहते हैं: 'This blog is awarded by ABP news on the occasion of Hindi Diwas. असल में यह सम्मान उन सभी दोस्तों का है जो उन्हे पढ़ते है, सहयोग करते हैं, उत्साह बढ़ाते हैं। उनके ब्लॉग पाठकों का है। यह सम्‍मान उस छतरपुर का है, जहाँ उन्होने जमीनी पत्रकारिता सीखी और आज भी इनके लिखने में वह बरकरार रहती है।' जाइए देख आइए, कितना उन्होने इस माध्यम के लिए लिखा, और तब वह किसी अख़बार में प्रकाशित हुआ। पूरा ब्लॉग कतरनों से भरा हुआ है। कोई ऐसी पोस्ट नहीं जिसे स्वतंत्र रूप से ब्लॉग के लिए लिखा गया हो। और वहाँ कितनी अश्लीलता से उनकी तस्वीर वहाँ लगी हुई है। वह इतना भी नहीं कह पाये कि इस इनाम के वे हक़दार नहीं है। शायद उनकी समझ में हिन्दी भाषा में और ब्लॉग पर लिखना दोनों एकमेक हो गए होंगे।

यह समझ का ही फ़ेर है। शायद मैं ही नहीं समझ पा रहा हूँ। पर सुनने में आया विजेंद्र जी (मसिजीवी हिन्दी), आप वहीं पार्क होटल में उपस्थित थे। हम कम-से-कम आप से यह उम्मीद तो करते ही थे कि इसपर आप ज़रूर कहेंगे। विनीत भले अपनी फ़ेसबुक वाल टीवी पर रंगते रहें, कभी इतनी उम्मीद नहीं रहती, वही हुआ भी। यह हिन्दी दिवस उनसे छूट गया। पर आप तो..शायद आप दोनों ही थोड़े व्यस्त होंगे। वक़्त निकाल के कहेंगे। कुछ पोस्ट वोस्ट तय्यार कर रहे होंगे। ख़ैर तो यह है कि प्रभात रंजन वहाँ से लौटकर अपने गुरु से पुरस्कार लेने के बाद इतने आत्ममुग्ध नहीं हुए। पर उन्होने भी कायदे से इसे लेना नहीं चाहिए था। वे ख़ुद को जानकी पुल का मॉडरेटर कहते रहे हैं। पर कहने के बाद भी पुरस्कार लपक लिया। हद है। सिर्फ़ इतना कहने से तो बात बनेगी नहीं कि मैं मॉडरेटर होने के नाते सभी की तरफ से सम्मान ले आया। 'जानकी पुल' के सभी पाठकों और लेखकों को बधाई! आपका लिखा जो आख़िरी बार पढ़ा था उसकी तारीख़ दो हज़ार ग्यारह तक जा रही है। मार्च ग्यारह। लिखना आत्मघाती पेशा है। शायद आप सही कह रहे थे।

{प्रमोद सिंह, सागर, 'असुविधा' वाले अशोक कुमार पाण्डेय, और 'सफ़ेद घर' के रहनवार सतीश पंचम से ज़रूरी हस्तक्षेप की अपेक्षा के साथ। और पूजा तुम भी कुछ कह ही दो अब तो.. और रवीश आप भी तो हमारे पुरखे हैं, कुछ तो बोलना बनता ही है। }

2 टिप्‍पणियां:

  1. भाई था तो मैं भी वहीँ। हाँ मैं कबाडखाना वाला नहीं। मेरा ब्लॉग असुविधा है और एक सामूहिक ब्लॉग जनपक्ष। आपने मुद्दा सही उठाया है।

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    1. चलिये, इस बहाने दो नामों से होने वाली तथ्यात्मक स्पष्टता बढ़ी है, आपका शुक्रिया।

      लेकिन फिर मेरा आग्रह यही है कि भले नाम गलत चला गया हो, पर आपसे अपेक्षा करना तो बनता है। जो फिलिस्तीन से लेकर इस्राइल पर दुनिया भर की टिप्पणियाँ करते हैं, बारीकी से उनके संदर्भों में पक्ष धरता रखते हैं, वे इस संदर्भ में भी वक़्त निकाल कुछ तो ज़रूर कहेंगे। शायद यह आपसे ज़्यादा की माँग कर बैठना है। थोड़ा तो हमें पता ही है कि इस माध्यम में आप सक्रिय रहते ही हैं। जैसे पीछे पुरुषोत्तम अग्रवाल जी की कहानी 'नाकोहस' आपने अपने विचार प्रकट किए थे। हो सकता है आप भी इस मसले पर थोड़ा वक़्त लेकर कुछ कहेंगे ज़रूर।

      इसी आशा, अपेक्षा, आग्रह के साथ पुनः ..

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