सितंबर 13, 2014

कश्मीर की बाढ़ का एक पाठ

यह ‘जम्मू’ से ज़्यादा ‘कश्मीर’ में आई बाढ़ है। ऐसा मैं नहीं कह रहा, ऐसा टीवी चैनल दिखा रहे हैं। कई प्रबुद्धजन बीते सालों में आई बाढ़ों के ब्योरों के साथ तय्यार हैं। कोई उन्हे किसी बहस में बुला ले बस। ऐसे भी लोग हैं, जो इस आपदा काल में सेना की रचनात्मक और सकर्मक भूमिका की सराहना कर रहे हैं। कल जनरल वीके सिंह के फ़ेसबुक पेज पर किसी पुल पर लेटे चीनी सैनिकों की तस्वीर को भारतीय सेना के जवानों के रूप में दिखाया जा रहा था। विवाद के बाद उस तस्वीर को वहाँ से हटा लिया गया। एक दूसरा ख़ेमा मणिपुर, कश्मीर से लेकर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के उदाहरणों को उद्धृत कर रहा है। दोनों तरह की बातों के बीच वहाँ नावों पर स्थित कैमरे इस बाढ़ को अभूतपूर्व घोषित कर रहे हैं। साठ सालों में पहली बार इस तरह की स्थिति देखी गयी है।

पिछले साल केदारनाथ, उत्तराखंड की त्रासदी को अभी तक अपवाद माना जा रहा था। हमारे मौसम विभाग के विशेषज्ञ अभी भी उसे, इस बाढ़ की तरह ‘असाधारण’, ‘अप्रत्याशित’ कह रहे हैं। दूसरी तरफ़ आज सुनीता नारायण ने बिना किस शोर शराबे ‘नगरीकरण’ के ‘नवउदारवादी प्रारूप’ को राजनीतिक प्रश्रय देने की आत्मघातक प्रवृत्ति को रेखांकित करते हुए अपनी बात कहती हैं। कैसे नियमों को ताक पर रखकर कश्मीर के उन निचले इलाकों में पॉश कालोनियाँ बसायी गईं, जिसके कारण पानी निकासी का स्वभाविक मार्ग अविरुद्ध हुआ। हमें ज़मीन सिर्फ़ इमारतों के लिए नज़र आती है। वहाँ बाढ़ के इलाकों में घर बनने दिये गए। बरसात का पानी डल झील और नागीन झील तक कभी पहुँच ही नहीं पाया और जल भराव की समस्या ने इतना विकराल रूप ले लिया। अभी हमने इस तरह से सोचना शुरू नहीं किया है। हम अभी भी इन विषम परिस्थितियों को पश्चिमी विक्षोभों व मौनसून के परस्पर मिलने की घटना बता रहे हैं। हमें इससे आगे बढ़ना होगा।

इसी बिन्दु पर ध्यान से देखें तो, एक बारीक-सी रेखा भी खींच दी गयी है, जिसमें बार-बार टीवी पर प्रसारित छवियाँ, किन्ही छिपे अर्थों की तरफ़ भी ले जा रही हैं। वह इतने छिपे न भी हों, तो भी धुंधले ज़रूर हैं। जो साफ़ है, उनमें स्पष्ट रूप से इसका उपयोग, दो सरकारों की कार्यशैलियों के बीच अंतर रेखांकित करने के लिए किया जा रहा है। कौन आपदा के समय कितनी तत्परता से राहत कार्य कर रहा है? यह ‘अच्छे दिन’ के मुहावरे की तरह अख़बारों से लेकर सोशल मीडिया में छाया हुआ है। सबके बीच, दोनों त्रासदियों के चित्र तुलनात्मक अध्ययन के लिए सहजता से उपलब्ध कराये जा रहे हैं। यह ‘साख’ बनाने का खेल है। यह साफ़ तौर पर दिख भी रहा है। यह अपने उत्पाद को बेहतर बताने की कवायद ज़्यादा लगती है। सरकारें इसी रूप में होड़ लगाती हैं।

इससे अधिक जटिल वह संरचना है जिसके भीतर हम यह पाते हैं कि यह वही केंद्रीय सरकार है, जिसके कई और राज्य इससे भी अधिक त्रासद जल आपदाओं के बीच, अपनी जिजीविषा के बल पर अपने को ज़िंदा रखे हुए हैं। वहाँ कई-कई दिनों तक बाकी देश से किसी भी तरह का संपर्क नहीं बन पाता। दोनों जगह बहुत सी खाली जगहें हैं, जिन्हे भरा जाना है। जैसे जिस तत्परता से टीवी चैनलों के रिपोर्टर और उनके कैमरे घाटी से लगातार फ़ीड भेज रहे हैं, उन्ही में से एक चैनल एनडीटीवी भी है, जिनके कमाल ख़ान अपने इसी चैनल के बलबूते एक घाघरा नदी पार नहीं कर पाये थे, उन्ही के मित्र कितनी सहजता से सेना की बचाव नौका पर बैठे-बैठे उस बाढ़ग्रस्त घाटी से रिपोर्ट कर रहे हैं। सेना के हेलिकॉप्टर से भी कई ‘पीटीसी’ उतार रहे हैं। पर इस चैनल पर पिछले साल असम में आई बाढ़ के समय कोई टिकर नहीं चलता। बिहार-उड़ीसा के जलमग्न हिस्सों से ऐसी ‘मानवीय’ रेपोर्टिंग नहीं होती। कोई ‘उदय फाउंडेशन’ जैसी संस्था आगे नहीं आती। एक नाम पट्टी लगातार, इलाक़ावार बताती रही कि कौन व्यक्ति कहाँ कितने दिनों से फँसा हुआ है? चैनल पर अपील के साथ यह भी लिखा जाता है कि ‘पुराने कपड़े देने के बजाय आप चेक़ और अनाज हमारे ग्रेटर कैलाश वाले दफ़्तर में जमा करा सकते हैं’। यहाँ ‘सरकार’ और ‘चैनल’ दोनों एकमेक हो गए हैं। भले गुणात्मक रूप से दोनों की प्रकृति में थोड़ा अंतर हो, पर ऐसे मौक़ों पर वे स्पष्ट रूप से इस तरह आते हैं। इसे और किस तरह विखंडित किया जाना चाहिए?

क्या वहाँ सेना की उपस्थिति ने इन चैनलों के लिए इस तरह ख़बरों के लिए जमीन तय्यार की? लेकिन यह इस स्थिति का बहुत ही सरलीकरण है। भारतीय सेना पहले भी इसी तरह की भूमिकाएँ निभाती रही है। फ़िर बारीक नज़र से देखने पर पता चलता है, इस तरह वर्तमान भारत सरकार, कश्मीर को ‘री-क्लेम’ कर रही है। राजनीति विज्ञान में जिसे इस तरह कहा जा सकता है कि एक राष्ट्र-राज्य इस क्षेत्र पर बहुत ही मज़बूती से पुनः ‘दावा’ का रहा है। अख़बारों में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लिए मदद देनी की इस सरकार की पहल पर देश-विदेश में भूरी-भूरी प्रशंसा और सराहना की ख़बरें लगातार आ रही हैं। यह वही कश्मीर है, जहाँ से लगातार अलगाववादी स्वर उठते रहे हैं। अभी पिछले दिनों, दोनों पड़ोसी देशों के बीच सचिव स्तर की बातचीत इसी कारण रद्द भी हो चुकी है। यह वही सरकार है जिसके बुद्धिजीवियों के चिंतन का एक प्रस्थान बिन्दु, धारा ‘तीन सौ सत्तर’ भी है। वह इस बाढ़ के बहाने पूरे देश में यह संदेश देना चाहते हैं, कि कश्मीर की ‘अभिन्नता’ के लिए वे इसी तरह आगे भी जो क़दम उठायेंगे, वह इतनी सघनता के साथ ‘मानवीय’ एवं ‘सराहनीय’ होंगे। आप किसी अरुंधति रॉय की बात पर विश्वास मत कीजिएगा। वह विभाजनकारी तत्व हैं। और दुर्भाग्य से तब हमारे इन चैनलों के लिए वहाँ इतनी सहजता से प्रवेश संभव नहीं हो पाएगा। जो चैनल आज इस ‘ब्राण्ड मेकिंग’ में लगे हुए हैं, सब चुप हो जाएँगे। सबकी ‘लाइव फ़ीड’, ‘फ्रीज़’ हो जाएँगी। कोई ख़बर बाहर नहीं आएगी।

{इस पोस्ट का छोटा सा टुकड़ा कल, सत्रह सितंबर को दैनिक हिंदुस्तान में आया है। पेज नंबर दस। जगह ‘साइबर संसार’। पेज दस। लिंक यही है, इसी पर चटकाएँ। तस्वीर फ़िर कभी। }

1 टिप्पणी:

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