सितंबर 19, 2014

लिखना, तब से लेकर आज तक

सबसे मूलभूत सवाल है, हम लिखते क्यों हैं? यह लिखना इतना ज़रूरी क्यों बन जाता है? मोहन राकेश अंदर से इतने खाली-खाली क्यों महसूस करते हैं? उनके डायरी लिखने में अजीब-सी कशिश है। बेकरारी है। जिन सपनों को वह साथ-साथ देखते चलते हैं, उनके अधूरे रह जाने की टीस है। वह अंदर-ही-अंदर सब जज़्ब करते जाते हैं। टूटने से पहले, बिखर जाने तक। किसी से कुछ भी कहते नहीं। बस चुप रहते हैं। यह उनके निजीपन में ‘अंतर्मुखी’ होने का प्रमाण है। क्या दुनिया में जितने भी लिखने वाले हैं, सबको इस साँचे में डाला जा सकता है? इसी वक़्त यह सवाल ख़ुद से भी पूछ लेने का मन करता है। हम कहाँ से शुरू हुए थे? कल रात लिखते हुए सबसे जादा उन दिनों को याद कर रहा था, जब हम सवालों से, उन्हे पूछ पूछकर लिखना सीख रहे थे। अभी भी उसी प्रक्रिया में हैं, पर छूट गया है सवाल पूछना। छूट गया है, उनका मेरे मन में इतनी सघनता से अंदर घर कर जाना। इन सालों में आज ऐसी जगह से पीछे देखने पर चीज़ें थोड़ी और साफ़ दिख पड़ती हैं। उन्हे और बारीकी से जान पाने के मौके बनते देख कभी लगता है, पीछे जाकर फ़िर वहाँ से गुज़र पड़ते। पर अगले ही पल ख़ुद को सोच नहीं पाता। बस लगता है, तब इस तरह यहाँ कभी भी नहीं हो पाते।

यह अफ़सोस बनने से पहले ही वापस लौट जाने की तरह है। कठफ़ोडवे के लकड़ी के पास वापस लौट जाने से बिलकुल अलग। शायद उसके बिलकुल उलट। सबको उलटकर रख देने वाले ही तो साल थे। अजीब से। कमज़ोर। बेकार। उबते। ख़ुद को साबित कर लेने लायक औज़ार जुटा लेने जैसे। क्या हम सब उमर के इस पड़ाव पर एक हद तक इसी तरह ख़ुद को बुन रहे होते हैं? हमारे पास सैकड़ों सवाल थे, जिसके जवाब हम इस लिपि के सामाजिक, सांस्कृतिक संरचनाओं में ढूँढ रहे थे। अब लगता है, हम हिन्दी नहीं, कुछ और ही पढ़ रहे थे। सच में हिन्दी वंचितों की भाषा है। इसने हमें ताक़त दी। हमें लगता हम एमए में किताबों को पढ़ते-पढ़ते, किसी और ही दुनिया में आ गए हैं। हम सवाल उठाने लायक हो रहे थे। हम ‘विखंडन’ की प्रक्रिया से गुज़र रहे थे। हमें बिन दिखे, हमारा व्यक्तित्व टूट रहा था। जहाँ दो फाँकें अभी भी लिखने में साफ़-साफ़ दिख जाती हैं। विचार सामूहिकता के आग्रह के साथ आता है। दूसरी तरफ़ भावुकता अत्यंत निजी क्षणों का गुंजलक होती है। यह उसके अनुपात में उतनी ही 'वैयक्तिक' होती है। विचारधारा कोई भी हो, वहाँ किसी भी निजी अभिव्यक्ति का कोई अवसर, कोई स्थान नहीं होता। यह बात एकदम से समझ नहीं आई। आते-आते हम काफ़ी आगे निकल आए। यहाँ से लौटने की बात तब न दिमाग में थी, न ही ऐसा कोई ख़याल मन में आया था।

विचारधाराएँ इसी रूप में हमें ‘अमानुषिक’ करती जाती हैं। वहाँ कोई खाली जगह नहीं होती, एक पंक्ति का भी अवकाश नहीं होता, जहाँ अपने मन की भी कुछ कह पाएँ। उन दिनों जितना ख़ुद को समझता, तब भी गलत जगह होने के एहसास से भरा रहता। कहता नहीं, पर दिल में कहीं किसी कोने में यही सोचता। अगर किसी लड़की से प्यार भी करता होता, तो उसे अपनी ताक़त बनाने से पहले, ख़ुद को मज़बूत करने वाली बात पर अटक जाता। यह द्वंद्व था। मेरे अंदर की छटपटाहट थी। चाहकर भी न कह पाने की कसक थी। उस लड़की से प्यार करता हूँ, इसके लिए कारण ढूँढ रहा था। आख़िर ऐसा क्या है, कि उसकी तरफ़ खिंचा चला जा रहा हूँ। ऐसा तो नहीं कि यह पूंजीवादी सौंदर्य का आकर्षण हो? वह इतनी गोरी नहीं है, रंग साँवला है। फ़िर भी कहने से पहले, इतने सारे सवालों से ख़ुद को पार ले जाना था। वह सब मुझे ठीक से उस दरिया में उतरने भी नहीं दे रहे थे। यह इतने पर कहाँ रुकने वाले थे, एक रात यहाँ तक पहुँच गया कि कहीं हो न हो मैं उसकी देह की तरफ़ आकर्षित हूँ। और इस रूप में मैं ‘विशुद्ध पुरुष’ था। मेरी सम्पूर्ण चेतना, स्त्रीवादी विचारों में केवल इस कारण को पाकर थोड़ा और निराश हो गयी। सोचने लगा, स्त्री को भोगने का विचार मेरे मन में कैसे आया होगा? इस तरह न जाने कितनी तरह से ‘बौद्धिक प्रेम’ कर रहा था, उससे। पर कभी उसे एहसास नहीं होने दिया। इसे इस तरह ही घटित होना था शायद। एक दिन आया, वह मेरी आँखों के सामने से हमेशा के लिए जा रही थी और मैं कहीं ‘आउटलुक’ में कश्मीर को लेकर अरुंधति राय के विचारों को मथ रहा था। वह कविता से गुज़रती रही और एक दिन सचमुच बाहर हो गयी।

इस तरह ‘इंट्रोवर्ट’ ऑबलिक अंतर्मुखी दिखने वाला ‘मैं’, प्यार में हार रहा था। यह वह क्षण थे, जब धीरे-धीरे वहाँ तक पहुँच गया, जहाँ इस एक कमरे वाले घर को, उससे फ़िर कुछ न कहने वाली बात के लिए बहाना बना लिया। असल में सबसे पहले समझने वाली बात ही कभी समझ नहीं पाये। हम सब सबसे पहले एकअदद धड़कने वाले दिल के हक़दार होते हैं, पर उसे कभी महसूस ही नहीं कर पाते। दिल धड़कने के लिए कभी पूछता नहीं है। यहाँ आने, इस ब्लॉग को बना लेने के बाद, अपनी सब पढ़ी हुई बातों, किताबों को भूलने की शुरुवात हुई। यह मेरे अंदर से बाहर आने जैसा है। यहाँ अभी जितना सुचिन्तित, क्रमबद्ध लिख रहा हूँ, मन के अंदर न जाने कैसे सब दोहराते हुए, कहने लायक भाषा में तब्दील कर रहा हूँ। मेरी कागज़ वाली डायरी भी इतनी तरह, इतनी बेतरतीब है। बिखरी हुई है। कभी भी किसी भी याद को लिख उदास हो जाने की आदत से मज़बूर। इधर उन परतों को अंदर उघाड़ रहा हूँ। यहाँ उतना कहने की हिम्मत नहीं है या अभी वक़्त नहीं आया है, कह नहीं सकता। हो सकता है, इस लेकर आए आखिरी साल में वह उन कागज़ों से निकल कर यहाँ आ जाये? पर अभी नहीं। ख़ुद को इंतज़ार करने दे रहा हूँ। पता है एक दिन आएगा।

जैसे एक दिन तुम आई। तुम न आती, तो न जाने, कितना और बिखरता। यह अंदर से टूटना दिख रहा था। इसका सतह पर आ जाना सबसे ख़तरनाक है। शायद उसी दौर की सबसे जटिल संरचना में तुमसे मिला। यह उन सबको भूल जाने की कोशिशों वाले दिन थे। तुम मेरे लिए फ़िर से सपनों में जीने का बहाना बनकर आई। तुम्हारे लिए ख़ुद को बदल रहा हूँ। कभी-कभीतुम्हारे लिए ’ थोड़ा मुश्किल हो जाता हूँ, पर उन ख़तों में लिखी हर बात, हर रंग, हर ख़ुशबू इस ज़िन्दगी भर देना चाहता हूँ। उन ख़्वाहिशों को हम साथ वहीं उस लोहे के बैंच पर बैठे देख रहे हैं। हम वहीं उन बहती हवाओं में साँसों से अपनी दुनिया बना रहे हैं। कभी तुम्हारे कानों में पहनी बालियों को देख कहीं तुम्हें लेकर खो जाने का मन करता है। कभी उन अबोली चाँदनी रातों में हाथों में हाथ लिए उन गुलाबी जुगनुओं के पीछे भागने को होते हैं। तुम्हारे पायलों की झंकार दिल की धड़कनों की जगह धड़कती हैं। कुछ भी न बोलो तब भी सुन लेता हूँ, तुम्हारी आवाज़। आहिस्ते से कानों में खिलखिलाना। तुम्हारे लिए हर जगह को सपनों से भर दिया है। उन ओस की बूँदों पर चलते हुए तुम्हारी कही हर बात यहाँ लिख देना चाहता हूँ। उन सबको अंदर ही अंदर रात में कितनी ही बार दोहराता रहता हूँ। उस साड़ी के लाल लाल फ़ाल की तरह। तुम्हारे आने के बाद सच में उन दिनों जैसा बिलकुल भी नहीं रहना चाहता था। तुम्हारी मुलायम सी उँगलियों को थामें, वहाँ से निकल इन सपनों की दुनियाओं में हम दोनों हैं। और उनमें से एक सपनों की दुनिया यह भी है।

{यादगारी के लिए उस कुर्सी-मेज़ की तस्वीर लगाए दे रहा हूँ, जिसपर बैठ अब तक इन सपनों को बुनता रहा। }

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