सितंबर 24, 2014

मन की बात..

अँधेरा जल्दी होने लगा है। ठंड इतनी नहीं है। धीरे-धीरे बहुत सी तरहों से सोचने लगा हूँ। कई बातें लगातार चलती रहती हैं। पीछे लगतार अपने लिखने पर सोचता रहा। एक बार, दो बार, तीन बार । पर कहीं भी पहुँच न सका। ख़ुद की बुनावट में कई चीज़ें इस तरह गुंफित हैं कि वह इतना आसान लगती भी नहीं है। ख़ुद को थोड़ी दूर से देखने की कोशिश में लगता है, अपने आप से ही पूर्वाग्रस्त होता गया हूँ। मेरी अपने बारे में ऐसी कितनी ही बातें हैं, जिनसे इंच भर भी पीछे नहीं हटता। वह जैसी दिमाग में बैठ गयी हैं, उनमें लगता भी नहीं है कभी कुछ नया जुड़ता होगा। यह ख़ुद को बंद कर लेने जैसा है। अपने लिए उन मौक़ों को ख़ुद ही किसी बंद गली में लाकर अधपकी मिट्टी की तरह पटक देना है।

शायद हम सबके साथ ऐसा ही होता होगा। हम ख़ुद को किसी ख़ास जगह से देखने के इतने आदि हो जाते हैं कि वह मन में बन रही छवि ही सब कुछ लगने लगती है। यह किसी भी तरह से ‘सामाजिक निर्मिति’ न होकर हमारे अपने मन के भीतर निर्मित होते गए ‘संप्रत्यय’ होते हैं। हम ख़ुद को गढ़ रहे होते हैं। हम मान रहे होते हैं कि हम हो न हो कुछ-कुछ इसी तरह के हैं। यह शीशे में अपनी परछाईं देखने से बिलकुल अगल प्रक्रिया है। वह भी हमारे मन में निर्मित होते भावों, विचारों, आग्रहों को हम पर लाद रहा होता है। हमें दूसरे कैसे देखना चाहते हैं से अधिक महत्वपूर्ण हमारी यही छवि होती है। जिसके भीतर हम बन बिगड़ रहे होते हैं।

तो, अब सवाल यह है कि मैं दूसरों को कैसा दिखना चाहता हूँ? या वे मुझे कैसा देखना चाहते हैं। मेरे पास इसका कोई एक जवाब नहीं है। न किसी के पास हो सकता है। हम अलग-अलग जगहों, व्यक्तियों, घटनाओं के लिए उतनी ही विविध तरहों से तय्यार होते हैं, जितनी विविधता उनमें स्वयं होती हैं। तब इस प्रश्न के संभावित उत्तरों में यह ‘लिखना’ भी आता है। जहाँ प्रत्यक्षतः मेरी छवि इन शब्दों के माध्यम से दूसरी तरफ़ बैठे मनों पर पड़ रही होती है। यह कितनी आरोपित है और कितनी वास्तविक(?) के निकट इसके बीच बड़ी बारीक-सी रेखा है, जो सब कुछ कह देती है। या हो सकता है, ऐसा कोई विभाजन कहीं हो ही न। जैसा अंदर से महसूस करता हूँ, यहाँ उसे उसी रूप में कह जाता होऊँगा। या बड़ी चालाकी से ख़ुद को यहाँ ढक लेता हूँ।

हो सकता है और जिसकी पूरी-पूरी संभावना है कि इस सच और झूठ के बीच ही हम सब बन रहे होते हैं। अभी भी मैं कुछ भी सीधे तौर पर कहने से बच रहा हूँ। ऐसा क्यों हैं? कह नहीं सकता। यहाँ लिखने के लिए बैठने से पहले कुछ भी सोचा नहीं था। बस कमरे में बड़ी देर से लैपटॉप लेकर बैठा रहा कि कुछ लिखना है। हो सकता है, मन को खुलने में कुछ देर और लगे। पर तबतक इस तरह बैठे रहकर दीवार पर चिपकी छिपकली को बार-बार भागने का काम नहीं करते रहना चाहता। कुछ ऐसी बात हो, जिससे ख़ुद को समझ सकूँ। जैसा सोचता रहा हूँ, उससे कुछ अलग बात कहीं से टकरा जाये। पर अभी कहा न हम सब बहुत बंद दिमागों वाले हैं। इतनी आसानी से इसमें कुछ घुसता नहीं है। हो सकता है जिसे लिखने कि ज़िद में यहाँ बैठा हूँ, उस पर साल भर बाद कुछ-कुछ समझ बनती दिखे। सबकुछ दो मिनट में एक्ट टू ‘पॉपकॉर्न’ या मैगी बना लेने जितने ‘इंस्टेंट’ नहीं होते। देर लगती है। इंतज़ार करना पड़ता है। परतें इतनी गहराई तक घर कर जाती हैं कि उनकी तहों में पहुँचने में साल लग जाते हैं। 

इस लिखने के अंदर और बाहर जितना भी ख़ुद को समझा है, वह कुछ-कुछ यहाँ आता रहा है। जो नहीं है, वह मन के दिल के किसी हिस्से में छिपा रखे हैं। कभी उन्हे इकट्ठे पढ़ने की कोशिश नहीं कर पाया। पर, अब लगता है, इस तरह भी सोचने के मौके बनते रहने चाहिए। कुछ देर के लिए उन संरचनाओं की गतिकी को समझने की तय्यारी अब करनी चाहिए। इस लिखने ने मेरे सम्पूर्ण व्यक्तित्व को इस तरह ढक लिया है, जहाँ इसके बाहर कभी सोच नहीं पाता। मेरे यहाँ हर बात लिखने लायक है। भले वह कभी बोलकर कही न जाये, उसे लिखकर अपने पास रख लेता हूँ। उन्हे इस तरह कागज पर, मन में, दिल की धड़कनों में लिख लेना चाहिए। मेरे लिए यहाँ सबसे ज़रूरी सवाल, इसतरह ‘लिखना’ नहीं है। इससे आगे जाकर उनका ‘इसी तरह’ लिखा जाना है।

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