सितंबर 12, 2014

मनमर्जियाँ..

थोड़ी देर झूठ बोलना चाहता हूँ। कहीं से भी कोई आवाज़ सुनाई न दे। सब चुपचाप सुनते रहें। कहीं से छिपकर मेरी आवाज़, उनके कान तक आती रहे। उन्हे दिखूँ नहीं। बस ऐसे ही छिपा रहूँ। पता नहीं यह कितनी रात पुरानी रुकी हुई पंक्ति है। इसे लिखना चाहता था, ‘रोक दी है’। जैसे, इतने दिनों बाद, आज शाम एकबार फ़िर उसी जगह ख़ुद को खड़ा पाता हूँ कि अब नहीं लिखना चाहता। कुछ भी नहीं लिखना चाहता। किसके लिए लिख रहा हूँ? ख़ुद के लिए? तब तो यह ख़ुदसे सबसे बड़ा धोखा है। तब तो इन्हे यहाँ होना ही नहीं चाहिए। यह सारी बातें तो कितनी ही तरहों से मेरे अंदर उमड़ती-घुमड़ती रहती हैं। उन्हे अंदर ऐसे होते रहने देने का मौका लिखने से भी काफ़ी मुश्किल है। असहनीय है। मेरी कागज़ वाली ‘डायरी’ इससे कहीं जादा बेतरतीब है। वहाँ कोई ‘टैग’ नहीं है। कोई ‘लेबल’ नहीं है। कोई ‘ड्राफ़्ट’ नहीं है। जो जैसा है, उसे वैसा ही रहने दिया है। लिखकर फ़िर कभी पढ़ता नहीं। वहाँ लिखने के लिए हिम्मत नहीं चाहिए, मन चाहिए। फ़िर यहाँ मेरा है ही कौन? यह कितना अच्छा है के ख़ुद ही पलट-पलट अपने उन पन्नों पर लौट-लौट पहुँच नज़रभर देख लेता हूँ। 

सब वैसा ही है। कुछ भी नहीं बदला। कुछ भी नहीं। जैसे मन में है, वैसे ही वहाँ भी है। कई सारी फ़ालतू की बातें मन में घूमे जा रही हैं। उन्हे लिख-लिख कर काटे जा रहा हूँ। पर यही डायरी में होते, तो काटने की हिम्मत नहीं करता। वहाँ जो है, वह सबसे शुद्धतम रूप में न भी हो, पर उन ‘भावातिरेकों’ का संकुल है, जिनके बहाने वहाँ लिखने बैठ जाता हूँ। उस वक़्त यह नहीं देखता, क्या लिख रहा हूँ। बस जो मन में है, उसकी परछाईं कागज पर उतर जाती है। थोड़ा-सा भी इधर-उधर नहीं होता। उसके पढ़े जाने के ख़तरे को भी जानता हूँ, पर अब शुरवाती दिनों वाला डर नहीं लगता। जो कहना है, कह देता हूँ। पर यहाँ, इधर, एक बारीक-सा परदा है। बहुत ही सीमित अर्थों में उन सीमाओं का अतिक्रमण कर, यहाँ वह सब लिखने की हिम्मत कर पाता हूँ। पर फ़िर दूसरे ही पल यह भी सोचने लगता हूँ, कि किसके पास वक़्त है, मेरे इस मन को पढ़ने की। थोड़ा-थोड़ा उस सीमा को इतने सालों में बढ़ाता ही रहा हूँ। पर उतना ही, जितने के भीतर सिर्फ़ ‘मैं’ टूटूँ। ‘वह’ नहीं। जिसकी बात हो रही है। जो वहाँ कहीं है ही नहीं। 

मृणाल ने मुझमें इतनी सारी बातें भर दीं, जिन्हे धीरे-धीरे इतने सालों बाद अब सोचता हूँ, तो सिहर उठता हूँ। वह मुझपर, मेरे अवचेतन पर इस कदर हावी रही कि कभी भी कुछ भी टूटने-बिखरने की परवाह नहीं की। सब कुछ तोड़ते हुए भी उसने नहीं माना कि वह ऐसा कुछ कर रही है। मैं भी यही समझता रहा जो इस टूट-फूट में बचा रहेगा, उसमें ही बचे रहने की ताकत होगी। कितना ख़तरनाक है, किसी का इस तरह सोचना। यह किसी भी तरह रचनात्मक विचार नहीं हो सकता। यह उसका प्रेम नहीं था, मुझमें, मेरे अंदर उसका मेरे अंदर आना था। पता है, वह ऐसी ही है। पर मैं तो कभी ऐसा नहीं होना चाहा। मेरा दिल ऐसा क्यों हो गया? तुमने मुझे ऐसा क्यों किया, बताओ? आज पूछ रहा हूँ। पता है, तुम फ़िर कुछ नहीं कहोगी। इधर देख रहा हूँ, यहाँ सब झूठ बोलते हैं। तो मैंने सच बोलने की कौन-सी कसम खाई है? सब झूठ है। इन लिखी पंक्तियों की तरह। इन अँग्रेजी से लिखे हिन्दी शब्दों के जैसे।

किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं कि जैसा लग रहा है, उसे वैसा ही कह पाये। उनके कहने का ढ़ंग बेमानी है। जबकि इधर झूठ बोलना थोड़ा कम आता है। जो है सब ‘बिसलेरी’ की बोतल के पानी की तरह साफ़ है। छुपाना कभी नहीं सीखा। सीखा होता, तो कभी लिख नहीं पाता। वो लोग और होंगे, जो छिपा भी ले जाते हैं और उसे लिख भी लेते हैं। सच कहूँ तो इन सारी बातों का मेरे बाहर किसी और के लिए कोई मतलब नहीं है। अगर कहीं किसी बिन्दु पर हो जाता है, तो वह मात्र संयोग ही होगा। इस तरह मेरा लिखा हुआ हर वाक्य मुझसे शुरू होता है और मुझ तक ही वापस लौटता है। इसलिए एकबार फ़िर कह रहा हूँ, यह आख़िरी साल है। इसके बाद यहाँ से अलविदा। इस ‘मीडियम’, इस ‘फ़ॉर्म’ के लिए इतना ही वक़्त लेकर आया था। जो यहाँ कह पाया, जो छिपाये रखा, उन सबकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी है। दोस्त कुछ कम बने, पर कोई गम नहीं। उनकी जगह दिल में हमेशा बनी रहेगी। बस यही टीस उठती रहेगी कि ‘प्रवीण पाण्डेय’ कैसे बना जाता है? यह नहीं सीख पाया। और बाक़ी कभी, ऐसे ही।

बस इन सारी बातों के बीच लिखने बैठता, तो ध्यान बार-बार इस तरफ़ चला जाता। एक गाना है। रात जब ढल रही होती, झींगुर जब थक जाते, तब कहीं चाँद की छाव में, उसकी ठंडी-सी परछाईं में बैठ इसे सुनता रहता..

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