सितंबर 25, 2014

मोबाइल सेवा विज्ञापनों की एक व्याख्या

विज्ञापन मूलतः एक विचार है, जिसे कंपनी अपनी ‘ऍड एजेंसी’ द्वारा हर संभावित उपभोक्ता की तरफ़ संप्रेषित करती है। ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में’ कहने वाली मोबाइल कंपनी, कैसे इस विज्ञापन क्षितिज से गायब हो गयी, उसे जानना बहुत रोचक होगा। उनके पीछे हटने के कारण क्या हैं? क्या वह अब इस पूर्वधारणा से संचालित होती कि जो आज उनकी सेवाएँ नहीं ले रहे हैं, एक दिन उनके नेटवर्क से ज़रूर बात करेंगे? क्या उन्होने यह सोचना बिलकुल बंद कर दिया है कि इन विज्ञापनों से प्रभावित होकर मोबाइल प्रयोक्ता उनकी प्रतिस्पर्धी कंपनी को छोड़कर उनकी तरफ़ भी आकर्षित हो सकते हैं।

या यहाँ बात स्पेक्ट्रम की है? उन तरंगों की है, जिन्हे सुप्रीम कोर्ट ने इस देश के नागरिकों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण अनिवार्य संसाधन बताया, जितना कि यहाँ की नदियों का पानी और इस देश की ज़मीन। फ़िलहाल, यह विमर्श, इस संसाधन के लिए उतना ही अमूर्त बना हुआ है, जितना अमूर्त वह अपनी व्याप्ति में स्वयं है। पर अभी बात ‘रिलाइन्स’ और इस ‘स्पेक्ट्रम’ की नहीं, उनकी जो अभी भी यहाँ धमक के साथ विज्ञापनों में अभी भी बने हुए हैं। अपनी उत्पादों के साथ यहाँ मौजूद हैं।

भारत में प्रसारित होते विज्ञापन, अपनी प्रतिस्पर्धी कंपनी को सीधे चुनौती देने से लगातार बचते रहते हैं। जबकि योरप, अमेरिका के साथ अन्य पश्चिमी देशों में यह टकराव प्रत्यक्ष होता है। यहाँ धीरे-धीरे कुछ बदलाव आ रहे हैं, पर उनकी गति अपेक्षाकृत धीमी है। ‘द हिन्दू’ और ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के बीच लगातार एक तनाव की स्थिति बनी रहती है, पर वह सबपर ज़ाहिर नहीं होती। ‘सर्फ़’ और ‘रिन’ साबुन इसे जादा दिन चला नहीं पाये। ‘बॉर्नवीटा’ और ‘हॉर्लिक्स’ भी एक विज्ञापन के बाद पीछे हट गए। यह अपने आप में शोध का विषय है कि भारतीय मानस किस तरह के विज्ञापनों को पसंद करता है और उसके पीछे कौन से कारण काम कर रहे होते हैं? क्या यह पसंद उन उत्पादों के लिए बाज़ार में माँग के रूप में सहायक योगदान कर पाती हैं या नहीं?

आज यह कितना आसान दिखता है कि अब हम ‘एयरटेल’ और ‘वोडाफोन’ के विज्ञापनों में निहित एकरूपता को बड़ी आसानी से पहचानने लगे हैं। विज्ञापन ख़त्म होते-होते हम उस कंपनी का नाम मन में दोहराने चुके होते हैं। दोनों कंपनियाँ बड़ी बारीकी से हमारे मनों के भीतर अपनी छवियों को लगातार भेजते हुए यह काम कर रही हैं। यह मात्र संयोग नहीं है कि अब इन मोबाइल कंपनियों के विज्ञापनों की प्रकृति निश्चित-सी होती गयी है। हर विज्ञापन अपने पिछले पूर्ववर्ती विज्ञापन की अगली कड़ी लगता है। वे उस लक्ष्य उपभोक्ता के अंदर उत्तरोत्तर अपने ‘नेटवर्क’ की ख़ास छवि को पोषित करते रहते हैं। वहाँ कुछ ख़ास बातें छोड़ देते हैं, जिसे पकड़ हम उनतक पहुँच जाएँ। यह उनके द्वारा प्रयोग किए गए ‘रंग’ हो सकते, कुछ ‘धुने’ हो सकती हैं। वहाँ दिखाये गए दृश्यों का ‘ट्रीटमेंट’ हो सकता है। वह अपनी सेवा को ‘भावुकता’ में तब्दील करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। 

इधर ‘आइडिया’ अपने विज्ञापन ‘टाटा टी’ की ऍड एजेंसी से न भी बनवा रहा हो, पर आइडिया, उपरोक्त दोनों मोबाइल सेवा प्रदाताओं के मुक़ाबले, बड़ी स्थूलता से, अपनी ‘टैग लाइन’-एन आइडिया कैन चेंज यॉर लाइफ के इर्दगिर्द सभी विज्ञापनों को गढ़ लिया है। यहाँ किसी भी तरह से रचनात्मक बिम्बों का प्रयोग करने की कोई कोशिश नहीं दिखती। इसने अपने उपभोक्ताओं को किन मनोभावों की तरफ़ धकेल दिया है, यह शोध का विषय न भी बन पाये, फ़िर भी हम यहाँ उनके द्वारा अपने विज्ञापनों में अपनी मोबाइल इंटरनेट सेवा द्वारा महिला सशक्तिकरण पर विहंगम दृष्टि तो डाल ही सकते हैं। कैसे उनके यहाँ स्त्री की छवियों को निर्मित किया जा रहा है? वे वहाँ किन भूमिकाओं में नज़र आती हैं? आइडिया अपने द्वारा दी जा रही इंटरनेट सेवा को इनसे जोड़कर किन तरहों से सामाजिक परिवर्तन की कल्पना या भविष्य स्वप्न की रूपरेखा प्रस्तुत कर रहा है?

इन सारे सवालों के पहले हम देखें कि वहाँ दो तरह की लड़कियाँ हैं। पहले शहर की आत्मचेतस स्वतन्त्रता-कामी लड़की। वह एक रेस्तेरा में अपने पुरुष मित्र के साथ बैठी, अपने उस दोस्त से उसी क्षण, ‘फ़ेसबुक रिलेशनशिप स्टेटस’ को बदलने के लिए कहती है। यह उसका दबाव भी है। वह चाहती है कि इसके साथ ही वहाँ माजूद सभी मित्रों, दोस्तों, साथियों को एक बार में ही पता चल जाये कि वह उस लड़के की ‘गर्लफ्रेंड’ है। वह लड़की इस रूप में सतर्क दिखाई जा रही है कि उसने उस लड़के की चिकनी-चुपड़ी पुरुषोचित बातों में न फँसने की ठान ली है। वह अपने इस संबंध को किसी भी तरह से निजी परिधियों में बाँध कर भी नहीं रखना चाहती। उसकी इस इच्छा को बल मिलता है, एक सोशल नेटवर्किंग साइट से, जिसे उस जगह चलाने के लिए लड़की के मोबाइल में इंटरनेट सेवा पहले से मौजूद है। इस तरह लड़का उसे उल्लू नहीं बना सकता। लेकिन इस स्थिति के लिए लड़का तय्यार होकर नहीं आया है। ना-नुकुर करने पर लड़की, उसकी बात बिन सुने, उसे वहीं कुर्सी मेज़ के बीच छोड़कर चली आती है।

यह विज्ञापन में लड़की की स्वतन्त्रता की नागर व्याख्या है। यहाँ बदलने लायक इच्छित वस्तु यह संबंध हैं। शायद यह पहली बार है कि लड़की किसी लड़के को ऐसे छोड़कर लौट आती है। यहाँ कभी यह सवाल ही नहीं बन पाएगा कि अगर यह सेवा नहीं होती तब लड़का-लड़की के संबंध किस तरह आकार लेते? और यदि ऐसी साइट जहाँ दर्जनों फ़ेक प्रोफ़ाइल बना लेने की सरल सहज सुविधा उपलब्ध हो, वहाँ मात्र स्टेटस बदल लेने से इन सम्बन्धों में कौन-सा गुणात्मक परिवर्तन आने वाला है? क्या अभी भी वह इन सम्बन्धों की वैधता एक पुरुष से ही नहीं चाह रही है? निर्धारक के रूप में अभी भी उसकी अघोषित अपेक्षा वैसी ही बनी हुई है।

दूसरे विज्ञापन में एक जमीन है। उसे खरीदने-बेचने की बात चल रही है। उसके मालिक हरियाणवी बोलने वाले किसान लगते हैं। हो सकता है, वह एक और गुड़गाँव बनने की पठकथा दिखा रहे हों या जेपी एक्सप्रेस वे बनने से पहले की किसी कहानी का कोई टुकड़ा। मोल भाव के बीच में एक लड़की हाथ में मोबाइल लिए अपने बूढ़े से बाबा या ताऊ जी के साथ वहाँ चली आई है। वह सारी बात बड़े ध्यान से सुन रही है। कितनी क़ीमत दी जा रही है? कितने फ़ायदे गिनाए जा रहे हैं। कहीं कोई विचारधारात्मक आग्रह किसानों के खेती से पीछे हटने और अपनी भूमि को बेचने के पीछे वाले सवालों पर न पहुँच जाएँ, इसलिए बाद के दिनों में प्रसारित होते विज्ञापन में इस ज़मीन को ‘बंजर’ बोला जाने लगा। शायद भूमि अधिग्रहण को जादा हिंसक दिखाने से बचने का कोई पूँजीवादी अजेंडा काम कर रहा होगा। सवाल यह भी हो सकता है कि नक्सल प्रभावित हिस्सों में यह भूमि किस रूप व भूमिका में है? संसाधनों की लूट वहाँ कैसी है? फ़िर इसमें बघेली या बुंदेलखंडी क्यों नहीं बोली जा रही या विदर्भ या कोंकण का कोई किसान क्यों नहीं दिखता?

देश के किन खास हिस्सों में यह ज़मीन इतने अहिंसक तरीकों से अधिग्रहित हो रही है, अपने आप में दूसरे-तीसरे भारत की खोज का हिस्सा हो सकते हैं। ख़ैर, वह लड़की उसी मोबाइल पर इंटरनेट से यह पता लगा लेती है कि कुछ ही दिनों में यहाँ से कोई एक्सप्रेस वे गुजरने वाला है और बड़े-बड़े मॉल बनने वाले हैं। और उस लड़की को चुप कराता बिचौलिया लगभग चुप होकर यकायक फ़्रेम से गायब हो जाता है। सब इस टेक्नीसेवी लड़की के तारीफ़ों के पुल बाँधने लगते हैं। यह कुछ-कुछ बीबीपुर के कुंवारों की तरफ़ से हरियाणा सरकार द्वारा प्रायोजित विज्ञापन भी लगने लगता है, जहाँ लिंग अनुपात इतनी दयनीय स्थिति में है। काश इन्हे देख कन्या भ्रूण हत्या करने वाले उन प्रफुल्लित गद्गद होते बुज़ुर्गों की तरह सोचने लगते। पर यह भी पूछने लायक है कि यह टच स्क्रीन मोबाइल उन समाजों में किन-किन लड़कियों के हाथों में  इतनी सुलभता से उपलब्ध है। और सबसे ज़रूरी बात यह कि संयोग से यहाँ लड़की की जगह कोई लड़का यही सब बात कर रहा होता, तब परिदृश्य किस तरह से बदल जाता? या कुछ नहीं बदलता?

2 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. जी बिलकुल विचारणीय प्रस्तुति है। इसीलिए लिखी भी गयी है।
      आपने भी बताया इसलिए आभार।

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