सितंबर 21, 2014

विश्व शांति दिवस पर 'अमेरिका' होने का अर्थ

हमारे एक अध्यापक हुए। असल में इसे इस तरह कहा जाना चाहिए कि हम उनके विद्यार्थी हुए। वे कहा करते हैं, जिस चीज़ का आभाव रहता है, उसे ही बार-बार याद करने की ज़रूरत पड़ती है। सब कह रहे हैं आज ‘अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस ’ है। इन अर्थों में इसका मतलब यह हुआ कि शांति अभी भी इच्छित है, वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अभी भी हमें इसे प्राप्त करना है। शांति का एक अर्थ शक्ति संतुलन की प्रक्रिया से गुज़र जाने के बाद ‘स्थितिप्रज्ञ’ की अवस्था को प्राप्त कर लेना भी है। यह वही समय है, जब हम अमेरिका जैसे राष्ट्र-राज्य के साथ अपने देश के सह-अस्तित्व को पारिभाषित किए बगैर नहीं रह सकते। कमोबेश जापान हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु बम विस्फोट करने के बाद पूरी दुनिया में यही स्थिति बनी रही है। शीतयुद्ध के ऐतिहासिक संदर्भों में न भी लौटा जाये, तब भी हम आजतक पूरी दुनिया में एक ध्रुवीय सत्ता केंद्र के रुप में स्थापित होने की अमेरिकी आक्रामकता को पढ़ सकते हैं।

इस देश के राष्ट्रपति को कभी शांति का नोबल मिल सकता है, इस तथ्य की रौशनी में हमारा शांति विमर्श किस तरह आकार ले रहा है, हम समझ सकते हैं। हमारे पास शांति के प्रतीकों को गढ़ने का कौशल अभी भी कितनी अतार्किक अवस्था में हैं। यह एक ऐसे समय में जीना है, जहाँ शांति बंदूक की नली से ही निकलेगी, की स्वीकार्यता सत्य की तरह बढ़ती जा रही है। यह शांति को लेकर हमारे विपन्न विमर्श के खोखलेपन को ही प्रदर्शित करता है। यह बिलकुल वही स्थिति है, जहाँ हमारे देश के अति-राष्ट्रवादी अपने पड़ोसी देश के साथ एक भीषण युद्ध करने के पश्चात दीर्घकालिक शांतिमय युग का आविर्भाव देखते हैं। यहीं इसी बिन्दु पर हमारे उस्ताद कहते हैं कि जबतक हम यह नहीं मान लेते कि पाकिस्तान ने भी हिंदुस्तान की तरह आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी, तब तक हम उसे एक देश की तरह अस्वीकार करते रहेंगे। और यह शांति संकट इसी तरह भारतीय उपमहाद्वीप छाया रहेगा।

इधर शांतिदूत बराक ओबामा इराक़ में नए उभरे इस्लामिक राज्य गठन की माँग करने वाले संगठन ‘आइसिस’ को चेतावनी तो दे दी पर इस्राइल-फिलिस्तीन संकट पर वह कुछ नहीं कहा। शायद उनका ध्यान परंपरा अनुशीलन पर अधिक होगा, इसका एक ही अर्थ है, शांति की उनकी परिभाषा उनके द्वारा निर्धारित होगी और वह इसी हिंसक तरीके से प्राप्त की जा सकती है। उनके पूर्ववर्तियों ने भी इसरूप में इराक़ को कभी नहीं सोचा होगा। यह उनके लोकतान्त्रिक राष्ट्र की स्थापना करने के स्वपन से कोसो दूर प्रतीत होता है। लेकिन हमें यह विचार करना होगा कि क्या यही ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ है, जिसकी तरफ़ ‘सैमुअल हंटिंगटन ’ इशारा करते हैं? या इस सैद्धांतिकी के पीछे भी कुछ है? बारीकी से देखने पर यह इन बुद्धिजीवियों का युद्ध संबन्धित अर्थव्यवस्था के लिए ‘वैचारिकी निर्माण’ ही लगता है। वे सम्पूर्ण परिदृश्य को इस तरह व्याख्यायित करते हैं, जहाँ हम ‘सह-अस्तित्व के सिद्धान्त’ के बजाए संघर्ष को अवश्यंभावी परिणीती मान लेते हैं। उनका विमर्श छद्म युद्ध द्वारा ‘समरूपीकरण’ पर समाप्त होता है।

यह हज़ारों वर्षों में निर्मित हुई सामाजिक, सांस्कृतिक विविधताओं, संरचनाओं और संस्थाओं का अस्वीकार है। उन नृजातीय समूहों को सिरे से नकार देना है। हम अपनी तरह जीने के तरीक़े को ही श्रेष्ठ मानने लगते हैं, तब यह समस्या का रूप ले लेती हैं। तब हमारी जीवनशैली विचारधारा का रूप ले लेती है। इस तरह हम दूसरों पर अपने जीवनशैली ही नहीं इतिहास, विचार, संस्थाएं, भाषाएँ, स्मृतियाँ, भावुकता, हृदयहीनता, स्वाद, रूप, गंध, स्पर्श, दृश्य, सौंदर्य अपनी तरफ़ से दूसरी तरफ़ संप्रेषित करते हैं। क्योंकि हम उनकी ‘बुद्धि के व्यवस्थापक’ बन जाना चाहते हैं। उनके सोचने समझने की शक्ति पर अपना नियंत्रण चाहते हैं। उनमें एक विशिष्ट तरह के हीनता बोध को पोषित करना है। मार्टिन कॉरनॉय के शब्दों में यह काम ‘सांस्कृतिक औपनिवेश’ स्थापित करने जैसा है। ‘पूँजीवाद’ अपने आप में हिंसक उत्पादन प्रणाली है। युद्ध उसके स्वयंसिद्ध पोषक है। यह पूंजीवाद की इस सबसे चरम अवस्था से भी दो कदम आगे का पाठ है। यह हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाने का छद्म युद्ध है। 

जिस तरह का वह देश है बिलकुल उसी तरह उसकी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हैं। एक राष्ट्र-राज्य के रूप में अमेरिका की यही व्याख्या है। वह धीरे-धीरे यह उन उत्तर-आधुनिक संरचनाओं की तरफ़ बढ़ता गया है, जहाँ यह निर्धारित करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि सांस्कृतिक रुप से उनके ‘राष्ट्र’ की परिकल्पना में वह स्वयं क्या है? शांति के लिए किए गए युद्धों को इससे अलग भी देखा जा सकता है? दुर्भाग्य से अभी तक कहीं से भी इसका कोई और चश्मा उपलब्ध नहीं हो पाया है। इसलिए इसी से काम चलाना पड़ रहा है। यह मात्र संयोग नहीं है कि इस शांति दिवस से कुछ दिन पूर्व ही अपनी अमेरिका यात्रा से पहले भारतीय प्रधानमंत्री  मुसलमानों को लेकर इतने भावुक हुए जा रहे हैं। वह उस शक्तिशाली राष्ट्र से अपनी ‘वैधता’ प्राप्त करना चाहते हैं, जिसका इतिहास स्वयं में कितना हिंसक, अमानवीय, पाशविक रहा है। इस अर्थ में हम शांति के इस वैश्विक दूत की एक और भूमिका से परिचित होते हैं।

{यहाँ दो ज़रूरी बातें:
01. यह तस्वीर 2012 की है, इसके कैप्शन से सहमत नहीं हूँ, फ़िर भी लगा रहा हूँ।
02. हम दिल्ली विश्वविद्यालय के दिनों में प्रो. कृष्ण कुमार के छात्र थे। वे अपनी किताब ‘Prejudice and Pride’ में भारत और पाकिस्तान के स्कूलों में स्वाधीनता संघर्ष का इतिहास की पढ़ाई को देखकर कहते हैं कि इतिहास की किताबें दो परस्पर विरोधी राष्ट्रीय अस्मिताओं का निर्माण कर रही है। बाद में राजकमल प्रकाशन से यही किताब ‘मेरा देश तुम्हारा देश’ नाम से प्रकाशित हुई। }

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