अक्तूबर 18, 2014

ऐसे ही बीच में, अनमने

कभी-कभी हम वहाँ होना चाहते हैं, जहाँ हम नहीं होते। जैसे इधर। इन दिनों। कहीं फँस गया हूँ। निकल नहीं सकता, ऐसा नहीं है। पर ऐसा ही है। निकल नहीं सकता। यह ऐसी स्थिति है, जिसे जितना समझता हूँ, उतनी ही उलझती जाती है। उलझना किसी पतंग के साथ नहीं। उन उँगलियों में स्वेटर बुनने की तरह भी नहीं। यह कुछ अजीब-सा है। अटपटा लगता है, पर समझ नहीं आता, क्या अटपटा है? शाम धीरे-धीरे ढल रही है। अचानक दिवाली से पहले हवा में ठंड तैरने लगी है। इन शामों में घूमने नहीं निकल सका। पर कहीं-न-कहीं हरसिंगार के फूलों की महक  हर शाम बिखर रही होगी। उसके रूमान में डूब जाने से पहले बाहर निकलना ज़रूरी है। ज़रूरी है उन बने बनाए ढाँचों से अलग हो जाना।

ऐसा कर लेना, किसी ‘फोल्डर’ में अपने इतने सालों में कमाई डिग्रियों की ‘फ़ोटोकॉपी’ देख लेने जितना आसान नहीं है। उसे जुटाने में, उनमें गायब परिवार की छवियों का न होना, सबसे बड़ा छद्मावरण है। जिसकी ओट में हमसब केवल ख़ुद को उसका दावेदार बताने लग जाते हैं। वहाँ सिर्फ़ हमारा नाम है। और हमारे नाम में कितने बिम्ब, उन चारदीवारों के बीच सिमटकर रह जाती हैं। यह सब वैसे ही नहीं दिखती, जैसे नहीं दिखती हैं हमारी आती-जाती साँसें । उन फेफड़ों के सिकुड़ने की प्रक्रिया। उनमें सोखती-एकाकार हो जाती हवा। यह कहीं किसी दफ़्तर में घड़ी के पाँच बजने जैसी यांत्रिक क्रियाओं का दैनिक समापन नहीं है। हम सब जैविक रूप से इन आसपास की गुंफित हो गयी परिस्थितियों में घिरकर रह जाने वाले अदने से जीव बने रहते हैं। ऐसे ही किसी एक दिन उन सारी दोहरायी जाने वाली बातों को स्थगित कर कहीं भाग नहीं पाते। खाना, भूख न लगने से आगे जाकर कभी मन न होने वाली हालत में नहीं पहुँच पाती। घड़ी में साढ़े आठ बजते ही थाली दिखने लगती है। दिखते-दिखते गायब हो जाती है।

सब कितना उबाता है। ऊब बन कर हम पर छा जाता है। जीभ का स्वाद मौसम के साथ बदलने से पहले ख़ुद को कहीं छिपा ले जाता है। जैसे किसी तीमारपुर रहने वाली लड़की के न बोलने पर हमारा माधव गुमसुम सा अगले दिन होने वाली ‘प्रेजेंटेशन’ में मसरूफ़ होने की कोशिश करता हुआ भी कितना हारा हुआ, असहाय लगता है। यह उसका दूसरा साल है। हो सकता है, अगले साल पता संतनगर बुराड़ी का हो। और इस तरह उसकी ज़िन्दगी से ऊब गायब होकर, कमला नगर ‘उडुपी’ के कुर्सी-मेज़ में धँसे, दोनों की बातें रस से भर जाये। कितनी कशिश है उन दोनों में। एक ख़ुद को प्यार करती हुई महसूस कर रही थी, और जिससे यह भाव, मनः स्थिति जोड़कर इस परिघटना को घटित होते हुए देख़ने की कोशिश की जा रही थी, वह पटेल चेस्ट क्रिश्चन कॉलोनी के सामने, मॉरिस नगर थाने में छेड़छाड़ की एक ‘एफ़आईआर’ में तब्दील होकर सड़कपार कब्रिस्तान में दफन हो गयीं। मर गयी।

लड़के, तुम्हें आगे बढ़ना होगा। जिसे कहते हैं, ‘मूव ऑन यार’! उस ‘आर्ट्स फ़ैकल्टी ’ में कुछ नहीं रखा। दो साल बाद एमए करने आओगे तब  लड़कियों को लाइन लगी हुई मिलेगी। ये दिल्ली है मेरे बच्चे। जहाँ एक तो छूट गयी बस के पीछे कभी मत भागना और न कभी हाथ से निकल गयी लड़की के पीछे हाथ धोकर पड़ना। देखना एक दिन आएगा जब, ये दोनों तुम्हारे आगे-पीछे घूमती फिरेंगी। बस वहाँ दो एक दोस्त ऐसे रखना, जो मौका पड़े, खाली कमरे की चाभी  देने में देर न करें। बात किसी से ज़बर्दस्ती की नहीं है। सब तय्यार हो जाते हैं। बस अपना मन बनाकर रखना। जैसे मेरा मन तो कर रहा है कि इस ‘लड़के’ से लेकर ‘पिछले पूर्णविराम’ तक सारी लाइन काट दूँ। पर काटुंगा टूँगा नहीं। क्योंकि पता है, वह कभी-न-कभी इस ‘छूने और न छूने के द्वंद्व ’ से ज़रूर गुजरेगा। तब अगर वह वापस अपने को खोजते हुए लौटे, तब ख़ुद को इतने साल पहले यहाँ देखकर हैरान होने के बजाए उसके जवाब को टटोल रहा होगा। हो सकता है जवाब न मिले। पर ज़रूरी है, वापस आना। लौट लौट उन अनसुलझे सवालों पर डट जाना।

वैसे यह सब लिखा पढ़ी उन ख़यालों को कहने में बिलकुल भी सही शब्द विन्यास नहीं हैं। पर कैसे कह दूँ, कितने प्यार से कल उनकी बनाई आलू-टमाटर की सब्जी में शिमला मिर्च के स्वाद के बाद, आज दोपहर, वापस लौटकर खाना खाने का मन नहीं हुआ। या हो सकता है, उसी स्वाद में कहीं गुम सुम सा उसे दोहराने की कोशिश में आज दोपहर टाल गया। यह बहुत स्थूल किस्म की बातें हैं। रुई के पानी में भीग जाने की तरह। उसे सुखाने वाली धूप कहीं नहीं है। इन नुक्तों में कहीं भी कोई बारीक बात नहीं है। आगे भी एक दो भोथरी-सी बातें कहकर रुक जाऊँगा। जैसे ठंड आ जाने के बाद  यह मेरे हिस्से की पहली पोस्ट है। और शक्ल-ओ-सूरत से बिलकुल भी मेरे किसी टाइप में फ़िट नहीं होती। एक टैग बनाया था, मिसफिट रेफरेंस। उसमें न जाने  क्या-क्या भरा पड़ा है? उन्हे कभी मिटाया नहीं। वहाँ कई काम की चीज़ें भी होंगी। क्या करूँ, आदत से मजबूर हूँ। अपने लिखे को काटता नहीं न, इसलिए।

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