नवंबर 19, 2014

बातें बे-वजह

वह अचानक एक पोस्ट में ख़ुद को पाकर  हैरान रह गया। उसकी हैरानी को डर में बदलते देखने का एहसास किसी भी तरह से रोमांचित नहीं कर रहा था। वहाँ उसका नाम नहीं था, बस कुछ इशारे थे। बहुत बारीक-सी सीवन उधेड़ते सब उसे देख लेते। यह कैसा होता होगा, जब कोई हमारे बारे में लिखने के लिए सोचता होगा? उसके सामने हमारी कौनसी छवि जा रही है, जिसे वह अपने यहाँ रख लेगी। प्यार करना भी कुछ-कुछ इसी तरह की बातों से भर जाना होगा। हम कहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते। हम इतनी पास हैं कि छूकर उस चेहरे को हमेशा के लिए अपने अंदर छिपाये रख सकते हैं। पर वह छुअन अजीब-सी सिहरन बनकर हमारी बाँछों से शुरू होकर काँखों के बालों में जाकर सिमट जाती है। इसे वहीं पसीने की दुर्गंध में उलझना भी कह सकते हैं, जो सस्ते डीओ के इस्तेमाल के बाद उपजी होगी। उसके चौबीस घंटे तक असरदार रहने के दावे हमारी तरह ही धराशाही हो चुके होंगे।

यह तकलीफ़ उस लड़की की भी है। वह दिल्ली से एमए हिन्दी  का रही है। एक शराब पीने वाले पिता की बेटी के इस कोर्स में दाख़िला लेने की सूचना को और किस तरह से लेना चाहिए? समझ नहीं पाता। वह सिलेबस में लगी कहानियों में ख़ुद को गुम कर लेगी। वह भी मन्नू भण्डारी की तरह ‘मिराण्डा हाउस’ में पढ़ाने के सपने बुनेगी। उसे भी राजेन्द्र यादव के साथ ‘एक इंच मुस्कान’ की तरह कोई अभिनव प्रयोग करना है। इसके लिए वह भरपूर कोशिश भी कर रही है। उन छूट गयी कक्षाओं में पढ़ाई गयी पाठ्यसामाग्री को उसकी एक अच्छी सहेली सहेजकर फ़ोटोकॉपी वाले भईया के पास हिदायत के साथ छोड़ जाती। वह इलाहाबाद से आए लड़के के साथ कभी रिज में उस विद्यापति को लिखने के लिए सामाग्री उपलब्ध करती, तो कभी घनानन्द किन्ही बरसात वाली सुबहों को विचलित मन के साथ अपने जिगरी दोस्त के कमरे पर उसके इंतेज़ार में दाल, चावल, रोटी बनाकर सो चुके होते।

उसकी बहन लक्ष्मी नगर से अपनी कोचिंग खत्म करने के बाद वापस लौट रही है। दिल्ली मेट्रो ने इस तरह से भी शाहदरा को जोड़ा है, वह दिख जाता है। वह यमुना बैंक पर उतारने वाली है और घंटा-डेढ़ घंटा अपने बॉयफ्रेंड के साथ वहीं बातें करके घर लौटेगी। ऐसा उसने मन में सोचा और बगल में खड़ी अपनी सहेली को भी बताया। एक सस्ते से मोबाइल फ़ोन को हाथ में समेटे वह अपनी सहेले के साथ खड़ी है। बैठने की कोई सीट नहीं है। तभी मुड़ी गर्दन के साथ यह सब देखते-देखते उसका फ़ोन घरघराया। अगर घंटी बजती तो पता नहीं कौनसी रिंगटोन होती? शायद हनी सिंह के किसी गाने की यह परसो बीते छठ वाली शारदा सिन्हा की आवाज़ में कोई लोकगीत सुनाई देता। अब प्लान में थोड़ा चेंज है। तुम मुझे उस पार्क में ले जाओगे न, मुझे पता है। इतना कहकर वह फ़ोन रख देती है। अब वह इंद्रप्रस्थ स्टेशन पर उतरेगी। वहीं कोई पार्क भी है, पास में। ऐसा उसने कहा और चुप हो गयी।

ऐसी कितनी ही कहानियाँ उसके दिमाग में  घूमती रहती हैं। पर वह उन्हे कह नहीं पाता। उन्हे समेटते-समेटते मन कहीं और भागने लगता है। यहीं उसे अपने दोस्त की कही बात याद आ जाती है। वह अकेला है, वह उसे बार-बार याद दिलाता। पर उसे नहीं पता कि वह जितना कहता है, उससे कई गुना नहीं कहता। उन्हे कह देना वह ज़रूरी भी नहीं समझता। वह बस उसकी यह बात सुन लेता। ऐसे सुनकर वह चुप सा कहीं छत पर बनी किसी बरसाती में इस बड़े से महानगर की भीड़ में गुम रह जाता। कोई उसे जान नहीं पाता। कोई ढूँढ नहीं पाता। कि जिससे हम कल मिले थे, उसने हमारी थोड़ी-सी ज़िन्दगी चुराकर, हमें कहीं लिख दिया है। वह उसकी कही हरबात में छिपे हैं, दिख रहे हैं। लेकिन इसतरह वह अपने उस दोस्त को कैसे बताए, इतने सारे लोगों के साथ रहते हुए वह अकेला कैसे है? वह कभी नहीं बोला। वह कभी उसे समझा नहीं पाया कि किसी खाली कमरे में बैठे रहने का सुख क्या है ?

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