नवंबर 20, 2014

एक अकेला शहर में..

अकेले खाली कमरे में बैठे रहने का सुख  क्या होता है, इसे भरे हुए लोग कभी नहीं जान पाएंगे। उनकी उन दिवारों पर घूमती छिपकलियों से कभी बात नहीं होगी। वे कभी अकेले नहीं होना चाहेंगे। वे कभी छत से झड़ते पलस्तर को ‘स्लो मोशन’ में देख लेने वाली आँखों वाले नहीं हो सकते। उनका बुरादे की तरह झड़ना किसी याद के वापस आने की तरह है। मैं यहाँ इस छतवाले कमरे में बैठकर इसी तरह बनता रहा। यह अकेलापन मुझे डराता नहीं है। जब कभी दिन बीते यहाँ नहीं आपाता तब अंदर से किसी ततईया के डंक से परेशान भागता रहता हूँ। आलोक पता नहीं फ़िर क्यों उस रात फ़ोन पर मेरे इस ‘अकेलेपन ’ को दोहरा रहा था। उसे मेरे अंदर ढूँढ़ रहा था । यह शायद उसकी समझ और मेरी समझ में कुछ मूलभूत अंतर के कारण रहा होगा। यह हमारे ज़िंदगी जीने के तरीके अलग-अलग तरीकों से हमारे अंदर  निर्मित होता होगा।

आज मैं चाहकर भी इसपर बात करने के मूड में नहीं हूँ। मूड नहीं है, फ़िर भी हट नहीं रहा। बैठा हुआ हूँ। मेरा अकेलापन अस्तित्ववादियों की तरह पूंजीवादी समाज में उत्पादन प्रणालियों में परिवर्तनों के बाद उपजी इन नगरीय संरचनाओं के भीतर दिखता भले हो लेकिन यह कहीं-न-कहीं ‘एकान्त’ के निकट अधिक है। मेरे पास भाषाविज्ञान की किसी विशिष्ट शाखा का ज्ञान नहीं है, जिसके बाद इनदोनों ‘शब्दों के चिह्नशास्त्र’ को पढ़कर इस अंतर को रेखांकित कर सकूँ। यह बस सतही समझ का फेर है, जो मुझे, मेरे भीतर इस खाली जगह को इसतरह भरता है। यह सच है कि इस जगह को लगातार व्यक्तिगत या निजी बनाता गया, फिर भी यह उसमें मेरे भावबोध समाजिकता या किन्ही अन्य भूमिकाओं के प्रति किसी भी किस्म का नकार नहीं दिखता। न किसी रूप में प्रकट करता है। यह एक सीमा तक ‘उदासीनता’ के रूप में भले दिखे पर उन बाहरी परतों की छवियों के बाद उसमें ऐसे किसी तत्व की उपस्थिति को नहीं देखा जा सकता। और अगर कुछ दिखेगा भी तो उसे इसतरह नामित नहीं किया जा सकेगा।

सब एक साँचे में ढलते हुए भी एक जैसे नहीं हो सकते, और चूँकि हम भी सबकी तरह एक चेतन प्राणी है, तब उनमें न दिख रही अदृश्य विविधताएँ, उन्हे एक जैसा बनाए जाने की सारी प्रक्रियाओं को ध्वस्त करती चलेंगी। पर यहीं इसी बिन्दु पर सबसे जादा संभलकर चलने की ज़रूरत होती हैं। जहाँ समाज, संस्कृति, राष्ट्र, परिवार, परिवेश, वातावरण भिन्न-भिन्न होने के बाद, जो बड़ा दायरा होता है, वहाँ की वृहतर अस्मिताएं, उन्हे अपने द्वारा सम्पन्न कराये जाने वाली भूमिकाओं से परिचित ही नहीं करवाएँगी अपितु अपेक्षाएँ भी रखेंगी। तभी हमारी आदतें, इच्छाएँ, भावनाएँ, प्रेम, स्वाद, स्पर्श सबकुछ इकहरा होता जाता है। हम इस समाज में खुद को व्यवस्थित करने की कोशिशें करने लगते हैं। हम हम नहीं रह जाते, कुछ और हो जाते हैं। तब हमारा स्वतंत्र अस्तित्व कुछ नहीं रह पाता। वह इस समाज में विलीन हो जाता है। यह उसमें चीनी के बजाय नमक की तरह घुलना है।

ऐसा नहीं है कि ऐसी स्थिति में प्रतिरोधी स्वर नहीं उठते। न मैं यह कह रहा हूँ कि मेरी तरफ़ से ऐसी कोई सुचिन्तित कोशिश कभी की गयी थी। फ़िर भी अगर आज भी तुम्हें लगता है कि यह एकान्त रचनात्मक न होकर अकेलेपन की त्रासदी लिए हुए है; वहाँ चेखव की कहानियों का संत्रास है या मोहन राकेश के ‘अँधेरे बंद कमरे’ वाले ‘मेटाफ़र’ जैसी कोई बात है, तो दोस्त, तुम्हें उसे कहना चाहिए। मुझे भी पता चले वह क्या है, जो मेरे सामने होते हुए भी मुझे दिख नहीं रहा। मेरी वह कौनसी छवि है (?) जो इतनी स्पष्टता से मेरी इस व्याख्या को ख़ारिज कर रही है। इतने दिनों में एक छूटी बात यह समझ में आती लग रही है कि मेरे इसतरह ‘आत्मकेन्द्रित’ होते जाने की वजह से बाहर कुछ दिखाई भी नहीं देता। जो कुछ भी है वह मेरे भीतर से बाहर जा रहा है। जिन बातों को लिख नहीं पाता उनके संदर्भ में यह भी दिखता है वह प्रत्यक्षतः मुझसे जुड़ी हुई नहीं होती। यह किसी तरह के व्यक्तित्व के रूप में गढ़ रही हैं (?) उससे मेरी किस तरह की छवि प्रसारित हो रही है, उसपर बिन सोचे कहने की आदत में कुछ बदलाव की ज़रूरत है।

इसबार तुम बड़े आश्वस्त हो कि अब लिख दोगे। मैं भी इंतेज़ार कर रहा हूँ। देखेँ तुम कब कहते हो।

1 टिप्पणी:

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