नवंबर 15, 2014

मेरे अंदर अधूरी अदेखी कहानी का सपना..

मैं एक कहानी लिखना चाहता हूँ। पता नहीं यह कितने साल पहले मेरे मन में आई बात है। यह कहानी सात आठ साल से मेरे अंदर ही अंदर खुद को बुन रही है। वह कभी बाहर नहीं आ सकी। उसे कभी लिख नहीं सका। मुझे लगने लगा कहानी लिखने का हुनर मुझमें नहीं है। मैं, जिसे कहानी कहते हैं, उसे बरत नहीं पा रहा। कभी इतने धैर्य के साथ मुझमें बैठने, एक ही प्लॉट पर रुके रहने का एकाकीपन मेरे अंदर है, पर उन्हे टुकड़ों-टुकड़ों में कह देने की जल्दबाज़ी उन्हे कहीं डायरी के पन्नों में कई सारी कहानियों को समेटे हुए होगी। यह हमारे समाज की संरचना का विखंडन भी है। जिस तरह उमर बढ़ने के साथ-साथ हम जिन नगरीय गतिकी के भीतर अपने बीतते सालों में एक-एक दिन की ऊब से बाहर निकालने की जद्दोजहद में, उन सब बातों को समेट पाने के लिए जिन ज़रूरी बातों की ज़रूरत होती होगी, वह मेरे दिमाग मेरे दिल से गायब हैं शायद। उस तरह मेरे अंदर कई सारी बातें एकसाथ गुजरती तो रहती हैं, पर उन्हे बुनने वाले रेशम के धागे नहीं हैं। उन्हे कह देने की जल्दबाज़ी में कई बातें ऐसी भी होंगी, जो वहीं कहीं पीछे दबी रह जाती होंगी, कभी दिख नहीं पाती। यह मेरे दिल की धड़कन की कोई परत रही होगी शायद। चमकीली-सी। आँखें चुंधिया देने वाली।

फ़िर जब मनोहरश्याम जोशी  को पढ़ना शुरू किया, तब दिल को दिलासा दिया करता। सोचता, मेरे पास अभी भी कुछ वक़्त है। हमारे लिखने का वक़्त भी आएगा। उनकी पहली कहानी तीस पार कर जाने के बाद लिखी गयी। कभी हम भी उस कतार में खड़े होंगे। हम भी कभी कसप  लिखेंगे। मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखते रहे। इधर दिख रहा है, तीन महीने बाद हमारी उमर तीन दशक की हो जाएगी। और इन सारी बातों का हासिल एक अधबुनी अधूरी कहानी भी नहीं है। इतना होने पर भी मुक्तिबोध  ने बहुत सहारा दिया। वह जैसे मेरे लिए ही एक साहित्यिक की डायरी  में रचना प्रक्रिया के तीन क्षण बताते हैं। अभी किस क्षण तक पहुँच पाया हूँ, हमेशा यही सोचता रहता। अभी दिवाली पर अपने एमए के नोट्स में एक पुर्ज़े पर कुछ लिखा मिल गया। तीव्र अनुभूति के बाद दूसरा चरण है, उसे अंदर-ही-अंदर उमड़ने घुमड़ने का अवसर। वह किस हद तक अपना मूल स्वरूप खो देता है? प्रकट होने पर कैसा दिखता है? पता नहीं शायद उन्होनेकॉलरीज़ का कल्पना सिद्धान्त इस तरह समझा होगा। मैंने शायद इस बिन्दु पर दोनों को मिला दिया हैं।

सालों बातें छिपाये रखने में माहिर हूँ। कभी कहता नहीं। पर जबसे यह ब्लॉग मिला है, तब से मन के एक कोने में इसका दख़ल बढ़ गया है। जब कभी थोड़ा भी भारी महसूस होता लूस शटिंग करने यहाँ बैठने लगा। इसने न जाने मेरे हिस्से की कितनी बातें अपने अंदर छिपाये रखी हैं। यह छिपाना छिपाने की तरह नहीं है। ख़ुद मुझे नहीं लगता कि वह सब कहने के लिए किसी हिम्मत की ज़रूरत है। यह डर अपने आप सृजित किया गया भय है। जिसका मूल्य शून्य है। वह बस भावातिरेक है, जो किसी भी बात को उन गहराईयों से बाहर निकाल लाता है। वहीं कहीं भीतर एक बात यह भी लगती रही कि दरअसल यह मेरे दिल के पन्ने हैं, जिन्हें कुछ क़तर-ब्योंत के बाद यहाँ बेतरतीब रखने लगा। इनका बेतरतीब होना मेरा मन का बिखर जाना है। इन्हे साथ-साथ रखने पर दिखने वाली तस्वीर, किसी खो गए शहर में किसी गुम हो गयी आवाज़ की तरह होगी। इन बिखरे हुए टुकड़ों को एक साथ रखने के बाद यह कृति कुछ-कुछ ऐसी बनती दिख रही है, जैसे नेकचंद जी ने किसी टूट गए क्रॉकरी सेट से कोई कामचलाऊ टी-सेट बना लिया हो। जिसमें मेहमानों के लिए चाय डालने पर चाय चाय नहीं रह जाती कुछ और हो जाती है। फ़िर भी वह उसे चाय समझकर पी जाते हैं।

पर लगता है मेरा मन ऐसा पात्र नहीं है। इसका मिक्सर-ग्राइंडर काम नहीं कर करता। पता नहीं कितनी भारी शामों में संजीव सर को फोन पर कितनी तरहों से अपने अंदर गुजरने वाले इन क्षणों की बेचैनी को बताता रहा हूँ। कभी ऐसा नहीं हुआ के उन सारे खाली एकांतिक अवकाशों में उन अधूरी बातों को कातकर कोई मुकम्मल शक्ल दे सकूँ। वह किसी बिछौनी की तरह भी काम में नहीं आती। गुदड़ी बनाए जाने लायक सिलाई भी नहीं कर पाता। बस उन सारी उलझनों में उलझकर रह जाता हूँ। कुछ कर नहीं पाता। थोड़े दिन इन्ही बातों में ख़र्च हो जाते हैं। कुछ जो मन में होता है वह इस रास्ते से बाहर निकल आता है और जिसे यहाँ नहीं कह पाता, वह चिलपर्क या पार्कर कुइंक की नीली स्याही में डूबकर कागज़ पर उतरते रहते हैं। इसतरह एकबार फ़िर अपने मन को मना लेता हूँ कि अभी थोड़ा और वक़्त बचा है। थोड़ा और लिखना अभी बाकी रह गया है। अभी तो सही से लिखने की तहज़ीब सिखनी है। फ़िर सोचता हूँ, यह सब बहाने हैं। अंदर से मुझे पता है, वह कहानी कभी बाहर नहीं आ सकेगी। मैं उसे ऐसे ही याद करता रहूँगा। वह मेरे अंदर ऐसे ही बनती बिगड़ती रहेगी। कोई धागा ऐसी ही चटककर यहाँ छिटक आएगा। मैं एकबार फ़िर फ़ोन उठाऊंगा और उन्हे फ़ोन करूंगा। और इसतरह यह सारी बातें एकएक कर मेरे अंदर अपने आप फ़िर से घूमने लगेंगी।

फ़िर ऐसे ही एक ठंडी-सी दोपहर होते-होते यह सारी बातें मेरे अंदर एक चक्कर लगाकर ठहर जाएँगी। मैं फ़िर कुछ नहीं कर पाऊँगा।

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर पोस्ट !

    आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा , मैं आपके ब्लॉग को फॉलो कर रहा हूँ ताकि नियमित रूपसे आपके ब्लॉग को पढ़ सकू ! आप मेरे ब्लॉग पर सादर आमंत्रित हैं आशा करता हूँ क़ि आपके सुझाव मुझे मिलते रहंगे !

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