नवंबर 22, 2014

राकेश: इसबार जाने के बाद

हम सब सपनों में रहने वाले लोग हैं। सपने देखते हैं। और चुप सो रहते हैं। उनमें कहीं कोई दीमक घुसने नहीं देते। बक्से के सबसे नीचे वाली तरी में छिपाये रहते हैं। कहीं कोई देख न ले। उसमें किसी की बेवजह आहट कोई खलल न डाल दे। सब वैसा का वैसा बना रहे जैसे सपनों में देखा है। अनछुआ। अनदेखा। रात बाग में दुधिया चाँदनी रौशनी में इन ठंडी हो गयी घास के तिनकों में अरझी हुई ओस की बूँद की तरह नंगे पैरों से छू जाती हों जैसे। इस सपने में कहीं कोई भी चीज़ इधर से उधर नहीं है, सब अपनी जगह हैं। उनका ऐसे होना दिल की धड़कनों में होती आवाज़ में सारंगी की बेकरार धुनों का मिल जाना है। किसी अधूरे ख़्वाब की टीस किसी तस्वीर में छिपी मुस्कान से बाहर निकलती जाती है।

उन पन्नों का पीला पड़ते जाना मेरी कनअँखियों से छिप नहीं पाता। तब मैं उठता हूँ। रज़ाई से निकलने का मन नहीं होता, तब भी निकलना ज़रूरी है। पिछली बार ऐसे ही रात खिड़की खुली रह गयी होगी। वहीं से कुछ ख़याल ऐसे ही कमरे में बिखरे रह गए थे। कटोरियाँ भर गईं थी। गिलास भरभर हम इन्हे ही पी रहे थे। थालियों में तुम्हारी रोटियाँ नहीं थी, यही अनछुए ख़याल रह गए थे।

राकेश  इसबार बिन कम्बल लिए ही छिंदवाड़ा से चल पड़ा। मुझे याद नहीं रहा उसके दिल्ली पहुँचने की तारीख़ पिछली साल की तरह नौ नवंबर है। वह यहाँ इस शहर से अधूरे ख़्वाब लिए वापस लौट गया। तब से कितनी बार यहाँ आया होगा। उसका हमेशा कुछ यहाँ छूटा रह जाता होगा। वह कभी कोशिश नहीं करता कि उस छूट गए पर दोबारा लौट जाए। लौटना इतना आसान नहीं। कितनी ही मासूम सी कल्पनायें उसके मन में दिल में उतरती रहती होंगी। वह कभी जताता नहीं है, कभी कुछ नहीं कहता बस वापस अपनी खोह में लौट जाता है। उसे वही सपनीली दुनिया बुलाती भी होगी पर पलभर भी नहीं ठहरता। आते-आते तबीयत दवाई लेने तक पहुँच गयी। गोल मार्किट, किसी कैमिस्ट की दुकान से कोई गोली ली थी। उसे शायद ऐसे ही सपने से मिलने की तय्यारी करनी थी। जितना बेपरवाह वह ख़ुद को दिखाने की कोशिश करता है, शायद वह उतना है नहीं। हमसब भी जो दिख रहे होते हैं वो होते कहाँ हैं? वह किसी भी तरह दीवार के पार दिखती दुनिया में पहुँच जाना चाहता है। अभी, तुरंत, झट से। जादू की तरह।

यह वहाँ पहुँचने में लगने वाली देरी से पैदा हुई ऊब है, जो हम सबको चिड़चिड़ा कर रही है। कितना मन करता है उड़कर वहाँ पहुँच जाएँ। ऊपर से यह दुनिया कैसी लगती होगी? कितने छोटे-छोटे से दिखते होंगे? हम सब कितनी हड़बड़ी में हैं। पर कोई सुन नहीं रहा। जैसे मेरे सपनों के चाँदनी चौक में आग लग जाये और भाई मतिदास चौक पर कूड़ा उठाने वाली गाड़ी के खराब हो जाने से लालकिले की तरफ़ से आग बुझाने वाली ‘फ़ायर ब्रिगेड’ वहीं फँस जाये। बेतरह हॉर्न की आवाज़ में गालियाँ धीमी पड़ गयी हैं। पर कहीं से कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। मेरे सपनों, ख़्वाबों, ख़यालों का गोदाम दिल की बैठती धड़कनों के साथ राख़ बनकर बैठता जा रहा हो। पता नहीं कितने ऐसे ख़याल इन डरों को अपने अंदर समाये घूमते रहते हैं। यह कुछ न कर पाने की छटपटाहट बेचैनी के रास्ते नींद में बदल जाती है। हम एकबार फ़िर वहीं नए सपनों को ढूँढ़ने लगते हैं। उन्हे अपनी नसों में बहते ख़ून से दोबारा बुनने की कोशिश में लगे रहते हैं। और इसतरह वह हमेशा बगल में काँख से नीचे वाले तिल की तरह दिखते रहते हैं।

हम हार नहीं मानते। बस चुप रहते हैं। उन अधूरे सपनों को पूरा कर लेने को कोशिश करते रहते हैं। इधर मेरे मन में दिल में न जाने कितने साल पहले शादी का सपना था। सपने से बाहर मैंने शादी कर ली है। कई सारे सपने उसके साथ चले आए हैं। राकेश बीहू में अपने नए सपने बुन रहा है। बातों-बातों में उसकी फ़ोन पर सुनाई देती आवाज़ कहीं न कहीं उन अधबुने सपनों की नयी फ़ेहरिस्त की तरह है। यह हमारे सपनों से आगे के सपने हैं। आशीष की बिटिया भी उसके सपनों के साथ-साथ बड़ी हो रही है। हमसब अपने सपने ‘रिन्यू’ करवा रहे हों जैसे। उनके नए बने रहने में ही हम भी बने रहेंगे। वह हमारे अंदर साँस लेकर बड़े होते रहेंगे। उनके साथ हम भी चलते रहेंगे। आहिस्ते से, धीरे से। और ऐसी कितनी छोटी-सी मुलाक़ातों में हमारी बातें वापस आती रहेंगी।

यह एक फ़िलर पोस्ट है। इस तरफ़ अचानक दोपहर ध्यान गया कि बीते इतवार भी नौ नवंबर थी। पूरे एक साल बाद वह दोबारा दिल्ली में था। इसबार सिर्फ़ एक दिन के लिए। जब दोस्त दिल्ली से चले जाते हैं, तब ऐसे ही लौटते हैं। कम दिनों की किश्तों के साथ। यादगारी के लिए पिछले साल की आवाज़ लगा रहा हूँ। इसकी तारीख़ दोबारा, नौ नवंबर। ध्यान से, आराम से, अकेले में सुनना। 


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