नवंबर 12, 2014

ठहरे हुए दिन..

नवंबर आ गया है और कल से ठंड भी कुछ बढ़ गयी है। कश्मीर में बर्फ़ गिरी है। बर्फ़ इंडिया गेट पर उतनी ही अजीब होगी जैसे कि कल एककाँग्रेसी नेता के अपनी लड़कियों को बोझ बताने वाले हलफ़नामे पर रोष प्रकट करते राम माधव थे। इधर कई दिनों से गायब था। बीच में कईबार लौटने की कोशिश भी की। पर तीन-चार जगह हाथ-पैर बझाए रहने के बाद धीरे-धीरे यह समझ आता रहा कि ऐसे काम नहीं चलेगा। कई अधूरे ड्राफ़्ट अधूरी बातों की तरह डैशबोर्ड में पड़े हैं। कभी-कभी लिखने का इतना मन करता है कि गति से आते ख़यालों को उसी अनुपात में उतनी ही तीव्रता से कह पाता। यह ऐसी स्थिति है जिसमें दिमाग भले खाली लगता हो पर असल में वह इतना भारी होता है कि कुछ करने लायक नहीं रह पाता।

कुछ-कुछ वैसा ही जैसा कि हम बिलकुल नए तरीके से सोचना चाहें, उस सोचे हुए अजाने ख़याल को ऐसी भाषा में लिखना चाहें जो हमने भी कभी इस्तेमाल न की हो। उसे कहने के लिए घण्टों एक-एक शब्द पर ठहरते हुए आगे बढ़ने की कोशिश करना। पर हरबार ‘दिवाल’ पर टंगी घड़ी की तरह हम भी हर बारह घंटे बाद ‘खुद बखुद’ वही वक़्त दोहरा रहे होते हैं। उस दोहराने में दिन बदलता है, तारीख़ बदलती है, साल बदलता है, पर हम कहीं उन्ही बासी उबासी लेते, सोये हुए मुँह की तरह बदबू से भरे रहते हैं। इस गंध के हम इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि यह हमारे बचपन से चलकर हमारी जवानी से लेकर बुढ़ापे तक हमारे साथ रहती है और हम कस्तुरी मृग की तरह अपनी नाभि में समाई गंध को ढूँढ़ने की कोशिश नहीं करते। बस भटकते रहते हैं। 

यह भाषा में निर्मल वर्मा हो जाना नहीं है। न विनोद कुमार शुक्ल की तरह होते रहना है। यह ख़ुद में ख़ुद की तलाश है। कहीं कोई गुमशुदा तलाश केंद्र, नयी कोतवाली नहीं है, जहाँ कभी पाल गोमरा का स्कूटर दिख जाएगा। हम बस हैं। यहीं हैं। कहीं जा नहीं रहे हैं। इन बीतते दिनों में यह मेरी ऊब से बचने की कोशिश है, जो मेरे भीतर से निकाल कर मेरे व्यक्तित्व पर छा गयी है। असल में ऐसा कुछ भी न हो, पर लिखते समय इस पंक्ति में मुझे ढक लिया हैं। मैं किसी ‘इंटरव्यू’ में अयोग्य घोषित नहीं होना चाहता। उन सारी अनकही प्रेमिकाओं को फ़िर अपने अंदर से बाहर निकालते हुए सब बताना चाहता हूँ। उनसे प्रेम करते रहने में मुझे अयोग्य नहीं होना। नहीं चाहता कि एक कमरे वाले घर से एकएक कर सब चली जाएँ। पर किसी भी बहाने से रोके भी नहीं रहना चाहता।

यह किसी शैली में लगातार लिखते रहने की छटपटाहट भी हो सकती है, जिसे इस रूप में कभी प्रकट नहीं कर सका। हो सकता है यह किसी और विधा में जाने से पहले का अवकाश हो। या कि एक तरह से उन सारे इकहरे अनुभवों को दोहराते रहने से कोई फेंच अंदर तक गड़ी रह गयी हो। सोचता हूँ, इसी तरह से लिखते रहने के बाद भी मेरे पास बहुतकुछ बचा रह गया है। उस बचे हुए सामान को टाँगने वाली अलगनी, उन्हे ऊँचे कहीं रख देने वाले ताखे, कहीं पंखे की जगह उन छत से बंधे सिकहर पर पतीली में दूध के बगल कितनी बातें रख देने की सहूलियतें होंगी। दिल के दिल बने रहने के लिए ज़रूरी है, उनका बाहर आते रहना। उन्हे आने के लिए, उस पर चलने के लिए शायद मढ़हा तान रहा हूँ। हो सकता है कुछ भी निकल कर सामने न आ पाये। या हो सकता है इस संक्रमण काल में कुछ संधियों, समासों, कारक चिह्नों के बाद कोई मेरे इंतज़ार में वहीं खपरैल वाले आँगन में मिल जाये।

और आख़िरी में एक नोट यह कि ग्यारहवीं या बारहवीं पंक्ति में आए हुए ‘दिवाल’ और ‘खुद बखुद’ मुक्तिबोध की किसी याद नहीं आ रही कविता से हूबहू उड़ा लिए गए हैं। इसे यहाँ लिखने से पहले हम भी दिवार नहीं बोलते हैं, पर शायद अमिताभ बच्चन का कोई प्रभाव बचपन में अवचेतन पर पड़ गया होगा। शायद इसलिए बोलते हुए भी कभी लिखा नहीं। बाकी सब वैसा ही है। वैसे सच कहूँ तो यह इतने दिनों पर पर्देदारी है। बहुत सारी बातें हैं, जिन्हे फ़िर कहूँगा। कभी। या ऐसे ही बहानों में उन्हे छिपा ले जाऊँगा।

'पाल गोमरा 'वाले उदय प्रकाश  पर तीन ज़रूरी पन्ने: संजीव कुमार, प्रियदर्शन, अरुण माहेश्वरी

यह त्वररित समय है, जैसे कि यह पोस्ट ख़ुद। 
जिस दिन लिखी गयी, उसके चौबीस घंटे से भी कम वक़्त में अगली सुबह हिंदुस्तान में थी। इसतरह यह तारीख़ हुई तेरह नवंबर, 2014। नाम वही, ठहरे हुए दिन। आज देखा, परसो पंद्रह नवंबर, शनिवार, ट्रिब्यून में भी यह पोस्ट आई है, ठहरे हुए दिनों की बात.

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