दिसंबर 07, 2014

बिछी हुई चादर

वहाँ उस लोहे के दरवाज़े के पीछे उनकी दुनिया थी। इस बड़ी सी दुनिया में एक छोटा सा पता। बड़े लड़के की शादी अभी हुई थी इसलिए घर थोड़ा और छोटा हो गया थी। उनके इस एक कमरे वाले घर के बीचोबीच एक दरी बिछी हुई थी। जब कभी किसी मेहमान के आने की आहट होती, वे लोग कोई धुली सी साफ़ सी चादर डाल देते। इसके कई फ़ायदे होते। एकतो उस दरी के फटे होने की बात छिप जाती, दूसरे इससे मेहमानों और मेज़बानों दोनों के सौंदर्यबोध का भी पता चलता रहता। जिससे प्राप्त ज्ञान का उपयोग वे अगली खरीदी जाने वाली चादर के संदर्भ में किया करते। फ़िर बात बोझिल हो जाने की स्थिति में एक विषय हमेशा उपलब्ध रहता, बिछी हुई चादर।

दरी पर बैठे मेहमान अक्सर खिड़की की तरफ़ मुँह करके बैठा करते। उनकी रुचि सामने लगी गुलमोहर के पेड़ में बिलकुल भी नहीं रहती। न उन्होने कभी आम या अशोक के पेड़ों पर बात करना उचित समझा। वे धीर-गंभीर साहित्य अनुरागी न थे और न ही अतिसक्रिय पर्यावरणविद्। वे इस घर में रहने वाले साधारण से लोगों से मिलने साल-दोसाल पर आने वाले गाँव से आए हुए अतिसाधारण लोग हुआ करते थे। खिड़की की तरफ़ देखना उनकी मज़बूरी थी, जिसका दूसरा अनुवाद इक्कीस इंच के रंगीन टीवी के रूप में वहाँ हमेशा मौजूद रहता था।

वहीं, खिड़की के बगल बिन दरवाजे वाला एक इटिया दिवार से घिरा गुसलखाना था, जो नहाने के साथ-साथ बर्तन धोने के काम आता। नहाते भी घर वाले थे और बर्तन भी घर वाले धोते थे। यह अकथित था पर उसका इस्तेमाल मेहमानों को हाथ धोने के अलावा किसी और स्थिति में तबतक करने नहीं दिया जाता था जबतक कि उनमें भी कोई स्त्री शामिल न हो। रसोई को लेकर ऐसे अलिखित उपबंध नहीं थे। वे नहा लेने के बाद उसका यथोचित प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्हे इसके लिए कहीं बाहर नहीं जाना। जहाँ दरी का पश्चिमी छोर ख़त्म होता है, बिलकुल वहीं से रसोई की सीमाएँ प्रारम्भ होती हैं। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि वह अपने एकएक पैर के साथ किचन और लिविंग रुम दोनों जगह मौजूद रह सकती हैं। उन्हे किसी भी बात को सुनने के लिए किसी भी दिवार से कान लगाने की ज़रूरत नहीं थी। यहाँ दीवारें नहीं है, उनके कान तो दूर की बात थी। इस तरह यह परिवार में स्त्रियों की लोकतान्त्रिक स्वतंत्र भागीदारी सुनिश्चित करता रहता। घर एक कमरे का है तो क्या हुआ इसकी सैद्धांतिकी कितनी मज़बूत है।

इस रसोई में ही कभी एक लकड़ी की छोटी सी अलमारी थी। घरवालों को भी नहीं पता था वह किस लकड़ी की बनी थी। पर सब उसका इस्तेमाल पता नहीं पिछले कितने सालों से उसी तरह मिलकर कर रहे थे, जैसे दिवार में चुनी हुई दो ताखों वाली अलमारी उन सबकी अलमारी थी। बस इनका खुलना किसी तहख़ाने के खुलने की तरह होता। साल दो साल में एकबार। जब अंदर रखी कोई चीज़ याद आ जाती तब। या ठंड के दिनों में स्वेटर निकालने को होते तब। दोनों भाई इसका इस्तेमाल अपनी डिग्रियों को चूहों से बचाने के लिए करते। जैसे कुतरी हुई क़मीज़ किसी काम की नहीं होती वैसे ही इस कागज को भी कोई नहीं पूछता था। दोनों भाइयों का इस परिवार की तरह लोकतन्त्र में पूरा विश्वास था और इस लोकतन्त्र के पास उन दोनों भाइयों को देने के लिए नौकरियाँ कुछ कम थीं। वह दोनों एकदूसरे की तरह पैरों में पैरागॉन की चप्पलें पहने बेरोज़गार घूमा करते। वह घिसती कम थी और चलती जादा थी।

शादी इन्ही में से बड़े लड़के की हुई थी। आस-पड़ोस की तरह घरवालों का भी मानना था शादियों के बाद अक्सर नौकरियाँ लग जाया करती हैं। इसलिए सब अधीर थे। और इंतज़ार करने के मूड में नहीं थे। सबकी तरह लड़का कुछ सोच नहीं पा रहा था, उसे क्या करना चाहिए? लड़की भी नहीं सोच पा रही थी उसे क्या करना है? इस कारण किसी ने भी शादी को और स्थगित करना उचित नहीं समझा। सब इसी उद्घोष के साथ बारात में शामिल हुए कि इस नहीं तो अगले साल नौकरी लग ही जाएगी। शादी जनवरी में हो गयी है, अब सब बारात से लौटकर नौकरी के इंतज़ार में हैं। इसतरह सब एकबार फ़िर अधीर हुए जा रहे थे। इसबार उनकी बेताबी लगातार अपने रूप बदलती जा रही है। वह किसी भी इच्छा के आकार लेकर कभी भी कहीं से भी उछलकर बीच दरी पर आ सकती थी।

आज घर में दरी पर नयी चादर बिछी है। घर की बड़ी बहू आ रही है। लड़का सोच रहा था, उसके पास सिर्फ़ एक रज़ाई है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...