दिसंबर 19, 2014

चुप घर..

वह इतनी छोटी जगह थी, जिसे कमरा कहना, किसी कमरे की चार दिवारी को तोड़कर फ़िर से कमरा बनाने की तरह होता। ऊपर पक्की छत नहीं थी। ऐबस्टस की टीन थी। बरसात में वह बूंदों के साथ कई धुनें एकसाथ गुनगुना रही होतीं। गर्मियों में इतनी गर्म कि उसके नीचे बैठे रहना मुफ़्त में स्टीमबाथ का अनुभव देता। सिर के ऊपर लगा छोटा पंखा पिछले कितने मौसमों से बंद पड़ा था, किसी को याद नहीं था। सीएफ़एल का बल्ब फ्यूज़ होकर उस ख़राब होल्डर में अभी भी लगा हुआ था। उसे कौन बदलने की सरदर्दी ले (?) यही सोच उसे वैसे ही रहने दिया। कमरे में रौशनी की ज़िम्मेदारी एक चालीस वॉट की ट्यूबलाइट थी, जो कई महीनों से लगातार हर रात जल उठती।

उसकी रौशनी जितनी चार दिवारी के अंदर रहती, उससे कहीं जादा रौशनदान से निकलकर बाहर आँगन में फैल जाती। इसके हर रात ढबरी की तरह जलने के बाद कमरा और साफ़-साफ़ दिखाई देने लगता। दिवार से चिपकी एक लोहे की अलमारी थी, जिसके ताखे किसी लाइब्रेरी की शीशे वाली अलमारी की याद दिलाते रहते। उसके बगल एक बक्सा था। बक्सा साल खाड़ में एकबार खुलने वाली अटैची की तरह था। असल अटैची कहाँ थी (?) किसी को कुछ पता न था। बक्से के अंदर क्या था (?) यह भी किसी को न पता था। लकड़ी में अभी एक दीमक भी नहीं लगी थी। घर में दीमक कहीं लगती नहीं थी। घर में दीमक लगने के लिए कुछ नहीं था।

दिवारों पर छिपकलियों का राज था। वह पुरखों की तरह उखड़ रहे पलस्तर के साथ पिछले कई सालों से लगातार वहीं बनी हुई थी। एक-दूसरे से चिपकी हुई थी। दोनों को एकदूसरे के कोई शिकायत नहीं थी।

घर दूर से काफ़ी शांत दिखाई देता। पास जाने पर भी उतना ही शांत मिलता। कोई आवाज़ बाहर नहीं जाती। उसी तरह बाहर से भी कोई आवाज़ अंदर नहीं आती। न शाम कोई हाथ सब्जियों से भरा थैला लिए लौटता। घर बिलकुल ऐसा लगता जैसे इस दुनिया में होते हुए भी इस दुनिया में नहीं था। न दिन में कोई बाहर निकलता। आसपास भी इस घर के बारे में कोई नहीं जानता। यह उसका असहयोग आंदोलन नहीं था। वह अपने आप में एक स्वतंत्र गणतन्त्र था।

इस तरह वह घर, एक चुप घर था। एक दिन यह चुप घर मेरे सपनों की दुनिया में कहीं खो गया।

{ दूसरा चुप घर ..}

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