दिसंबर 17, 2014

कमरे में सिर्फ़ कमरा था

कमरे में सिर्फ़ कमरा था। वह न खाली था। न भरा था। वह कुछ-कुछ खाली था, कुछ-कुछ भरा था।

इस कुछ खाली, कुछ भरे कमरे में वह बालदार लड़का, कुछ कम ख़ूबसूरत लड़की के पास बैठा रहा। वह कुछ कमसूरत लड़की बालदार लड़के के पास बैठी रही। लड़के ने चुपके से अपने मन से कहा। तुम इतनी भी ख़ूबसूरत नहीं हो। लड़की ने चुपके से अपने मन से कहा। तुम इतने भी बालदार नहीं हो। दोनों के मनों ने सुनकर अनसुना कर दिया। वह वैसे ही सामने देखती रही। वह वैसे ही सामने देखता रहा।

दोनों एक-दूसरे के अगल-बगल बैठे रहे। वह उसे देख नहीं रहा था। वह उसे देख नहीं रही थी। इसतरह दोनों को लगता दोनों एक-दूसरे को न देख पाने का नाटक बहुत अच्छे से कर रहे थे। दोनों बेवकूफ़ थे। गलती उनकी नहीं उन दोनों के लड़का-लड़की होने में थी।

लड़का बार-बार उसके पैरों की तरफ़ देखता। देखता किसी घिस चुकी चप्पल में मोज़ों को पहने हुए उसके पैर। बार-बार उसकी नज़र सलवार पर चाँदी की पायलों के घुंघरुओं में कहीं अरझ जाती। लड़की बार-बार उसके पैरों की तरफ़ देखती। देखती किसी घिस चुकी चप्पल में मोज़ों को पहने हुए उसके पैर। बार-बार उसकी नज़र पजामे पर चाँदी की पायलों के घुंघरुओं में कहीं अरझ जाती।

लड़के ने कुछ देर लड़की के बारे में कुछ सोचा। लड़की ने कुछ देर लड़के के बारे में कुछ सोचा। कुछ देर बाद दोनों ने कुछ तय कर किया। लड़का कमरे के साथ वहीं रुक गया। लड़की भी कमरे के साथ वहीं रुक गयी।

अब उन्हे असली नाटक शुरू करना था। दोनों को एक-दूसरे को देखते हुए भी नहीं देखना था।

{नोट: तस्वीर बड़ी करने पर कमरे के अंदर कई कमरे और दिखाई देंगे। कदरदान ऐसा करके लड़का-लड़की दोनों को पास से देखें.}

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