दिसंबर 09, 2014

स्वच्छ भारत अभियान की बात

अब जबकि झाड़ू उठाए नेता, मंत्री, संतरी अख़बारों में छपने के लिए इतने लालायित नहीं दिख रहे, ख़ुद कूड़ा फैलाकर मजमा जुटाने की जद्दोजहद अब ठंडी पड़ गयी है, जनता यू-ट्यूब पर प्रधान सेवक के सफ़ाई वीडियो का इंतज़ार करते-करते थक चुकी है, मन की बात  सुनने के लिए रेडियो खरीद कर अघा चुकी है, डीएवीपी के हर विज्ञापन के साथ गाँधी चश्मा छप रहा है, स्वच्छता सप्ताह हिन्दी पखवाड़े की औपचारिकता के साथ सम्पन्न हो चुका है,सबटीवी पर तारक मेहता का उल्टा चश्मा के सभी सदस्य जब हमें सफ़ाई का महत्व बता चुके हैं,एनडीटीवी पर अमिताभ बच्चन गंदगी से हर बीस सेकंड में एक बच्चे की मौत की भयावयता रोज़ बता रहे हैं, बालदिवस बाल स्वच्छता अभियान में तब्दील हो चुका है, मंत्रालयों में छब्बीस जनवरी की परेड में अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष बराक ओबामा के सामने अपनी झाँकी में इस अभियान को हथियाने की होड़ मची हुई हो, पूरा देश इस अभियान के धुआँधार विज्ञापनों, विज्ञप्तियों से अटा पड़ा हो, तब हमारा भी कुछ कर्तव्य बनता है कि कान पर जूं को रेंगने दिया जाये। हम थोड़ा पिछड़ भी गए हैं तो क्या? बातें तो बातें हैं, बातें होती रहनी चाहिए..

अगर हमारे देश में इतने तामझाम के साथ ‘स्वच्छ भारत अभियान’ चल रहा है, तो इसे समझने के लिए सबसे पहले हमें ‘स्वच्छता’ और ‘अस्वच्छता’ दोनों को पारिभाषित करना होगा। इसतरह यह भी देखना होगा कि यह कहाँ-कहाँ पायी जाती है? किन-किन अर्थों में इसका अनुवाद किया जा सकता है? वह कौन हैं, जो हमारे समाज में ‘गंदगी’ उत्सर्जित करते रहे हैं? फ़िर यदि समाज इसे अस्वच्छता के रूप में ला रहा है, तो कोई मशीनरी, कोई तंत्र ऐसा भी होगा जो इसके निपटारे के लिए प्रशासनिक स्तर पर सैद्धांतिक रूप से प्रतिबद्ध होगा। इस तरह यह एक रोज़गार भी है। लेकिन इसी क्षण हमें इसके जातिगत समीकरणों को भी समझने की कोशिश करनी चाहिए। महात्मा गांधी ‘अस्पृश्यता’ को ख़त्म करने के लिए क्या तर्क देते हैं और इसके कारण जिस वर्ग को मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रहे थे, वे किन किन पेशों से सम्बद्ध थे? वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी वही पेशे क्यों कर रहे थे? क्यों कर रहे हैं? क्यों इस अभियान की शुरुवातवाल्मीकि बस्ती से होती है? क्या वस्तुस्थिति में किसी भी प्रकार का आमूलचूल परिवर्तन हुआ भी कि नहीं। वैसे आज भी हमारे देश में सिर पर मैला उठाने वाले आज भी ऐसा करने को अभिशप्त हैं।

यहाँ यह देखा रोचक होगा कि अभियान ‘अस्वच्छता’ के रूप में किन्हे चिन्हित करता है और एक नागरिक होने के नाते इस अभियान में हमारी क्या भूमिका हो सकती है? दीवारों पर पेशाब करना, खुले में शौच जाना, सड़कों गलियों में इधर-उधर कूड़ा फेंकना इन तीन प्रकारों के अलावा वह अपने इस समाज में गंदगी को देख नहीं पाते। सरकार स्वयं इन जन सुविधाओं के लिए कितनी सजग है, अलग चर्चा का विषय है। वैसे दिखाई तो हमें नीले और हरे डिब्बे भी नहीं देते, जिनमें जैविक और पुनरचक्रित होने लायक कूड़े को डाल पाएँ। नालियों, सीवरों का बोध हमें या तो बरसातों में होता है या वह बस या गाड़ी के किसी जेजे कॉलोनी के पास से गुजरते हुए महसूस होते हैं। यदि रेलगाड़ी से जा रहे हैं, तब उन पटरियों पर प्लास्टिक के डिब्बों और पुराने लोटों के साथ मल त्याग करती असंख्य अभिशप्त जनसंख्या को देख हम जुगुप्सा से भर जाते हैं। धीरे-धीरे जैसे जैसे बात आगे बढ़ती जा रही है, हम इस ‘गंदगी’ को ‘अस्वच्छता’ बोल पाने में ख़ुद को असमर्थ व असहज पाते हैं। हम ‘भद्र अस्वच्छता’ से होते हुई ‘गरीब गंदगी’ के बगल से गुज़र रहे हैं। यह सिर्फ़ भाषा का नहीं वर्ग का भी भेद है, जो हमारे मन से होकर नाक पर रुमाल बनकर हमारे चेहरे के भावों को नाटकीय रूप से बदल रहा होता है।‘मुन्नी मोबाइल ’ ऐसे ही किसी औदद्योगिक उपनगरी से रोज़ दिल्ली आती है।

हम यहाँ गंदगी को नगरीय विकास के एक पहलू से जोड़ते हैं, पर ऐसा करने के बाद भी हम उसकी अधूरी-धुँधली तस्वीर ही देख पाते हैं। सारे नेता लुटियन दिल्ली की किसी साफ़-सी सड़क पर कूड़ा फैलाकर झाड़ू लगाते दिख रहे थे। उनका ध्यान राजघाट के पीछे रेंगने को मजबूर यमुना की दयनीय स्थिति पर नहीं जाता। वे कौन से कारक हैं, जिनके परिणामस्वरूप उनकी गति बाधित हुई? यह हम देख नहीं पाते। हमें बड़े-बड़े कारखाने छोटी-छोटी औद्योगिक इकाइयाँ नज़र आती हैं। इनके लिए हम अपने पर्यावरण कानून बदलने को झट से तय्यार हो जाते हैं। ऐसा नहीं है, सरकारें उनके प्रति उदासीन रही हैं, गंगा एक्शन प्लान से लेकर टेम्स की तर्ज़ पर नदियों को साफ़ करने उनके सौंदर्यीकरण की कसमें खाकर अदालतों में हलफ़नामे दायर करती रही हैं। अबकी बार तो पूरा जल संसाधन मंत्रालय ही खड़ा कर दिया गया है। हम रोज़ उनमें मिलते लाखों टन अशोधित जल को शोधित करने के संयंत्र खरीदने में व्यस्त रहते हैं। इसतरह नदी का पारिस्थितिकी तंत्र क्या होता है, नदियाँ स्वयं भूल चुकी होती है। याद करने से भी याद नहीं आता।

और तब हम हड़बड़ी में ऐसे आधे-अधूरे स्वच्छता अभियान गढ़ते है। जिनमें उन नागरिकों को शपथ दिलवाई जा रही है, जिन्हे यह भी नहीं पता कि रोज़ उनके घर से निकला कूड़ा शहर के अंदर या शहर के बाहर किस ढलाव पर कूड़े के पहाड़ में बदल जाता है? फिर वह वहाँ से आगे की निपटान प्रक्रिया के लिए कहाँ जाएगा? ऐसी स्थिति में उन्हे कैसे पता होगा कि सुबह किया उनका मल किन नालियों, नालों, सीवरों से होता हुआ नदियों में मिल रहा है? उन्हे यह कभी पता ही नहीं चल सकेगा कि जो उत्पाद वे बाज़ार से खरीद कर लाये हैं, उसके उत्पादक ने कितना कार्बन उत्सर्जित किया और अपने अपशिष्ट पदार्थों को किन नदियों में खुले नालों से बहा दिया। हम तो बस दूरदर्शन पर विद्या बालन केजहाँ सोच वहाँ शौचालय  वाले विज्ञापन देखते रहेंगे और खुले में जाते रहेंगे।

{आज अट्ठारह दिसंबर, इस बात का संपादित अंश हिंदुस्तान में आया है, पता साइबर संसार, स्वच्छता के मायने.. }

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