दिसंबर 10, 2014

वह बिज़ी थी..

दोनों ने चार महीने पहले इस दफ़्तर में ‘एमटीएस’ की हैसियत से आना शुरू किया था। लड़का दसवीं पास था, लड़की बारहवीं फ़ेल। यह दो अक्टूबर के दो-तीन हफ़्ते बीत जाने बाद की पहली शाम नहीं थी, जब इन दोनों को पाँच बजे के बाद भी रुकना पड़ रहा था। रुकने के लिए सिर्फ़ लड़की को कहा जाता। पर लड़का भी रुक जाता। दोनों साथ-साथ जाते। साथ इसलिए भी जाते क्योंकि दोनों सीताराम बाज़ार से थे। दोनों सोचते आईटीओ से घर है ही कितनी दूर। लड़का तुर्कमान गेट से मुड़ जाता, लड़की सीधी मोहल्ले में गुम हो जाती।

दोनों दफ़्तर के इस प्रायोजित एकांत का आधुनिक उपयोग सिर्फ़ घर पर करते, उसे यहाँ छेड़ते भी न थे। छेड़ने का मन होता, तो भी उन नेगी अंकल के पाँच-पाँच मिनट पर लौट आने की आदत को कैसे बदलते। बदलना मुश्किल था और लड़के की शक्ल इतनी चालू नहीं थी। लड़की भी दिखने में उतनी ही शरीफ़ लगती। दोनों लड़का-लड़की होते हुए भी लड़का-लड़की जैसे नहीं दिखते। ऊपर से लड़का थोड़ा कम पढ़ा लिखा था। उसने किताबों को पढ़ना सात साल पहले छोड़ दिया था। और लड़की को किताबी बातें बचपन से ही नापसंद थी।

यहाँ आने से पहले ही मुँहफट्ट होना लड़कों की निशानी बन चुकी थी। इसलिए अंदर से चाहे कितना भी रोमेंटिक हो रहा होता, दिल में कसक कितनी भी उठती बैठती रहती वह एक ख़राब हो चुकी ट्यूबलाइट के चुंधियाते उजाले में ऐसे ही थोड़ा तेज़ बोलता।

“अरे तुझे तो ठीक से दिखाई भी नहीं देता, मेज़ के नीचे देख कितनी धूल पड़ी है..
कब साफ़ करेगी इसे, कब चलेंगे हम..??”

“दिख नहीं रहा, कर तो रही हूँ, जैसे-तैसे.. तूने मेरी कमर कामलायक कहाँ छोड़ी है..
आज मूव लेते चलना..”

“हाँ हाँ चल-चल.. बड़ी आई बताने वाली। काम कर अपना..काम..
चल अब जल्दी हाथ चला, वरना आज फ़िर नौ बज जाएंगे..फ़िर तू मुझे बोलेगी..”

“क्या बोलुंगी बता.. बता..बता तो ??
लेट तो तू करता है.. रोज़.. घर वाले रोज़ पूछते हैं, तुझे क्या पता कैसे-कैसे बहाने बनती हूँ..”

इतना कहकर वह उसी मंथर गति से ज़मीन पर पोंचा लगती रही, जैसे उसने उन सुनी हुई बातों को अपने पोंचे, धूल, फ़िनाईल, फ़र्श सबमें मिलकर भुला दिया हो। वह कुछ नहीं बोली। इसपर लड़का थोड़ा झल्ला रहा था। पर चुप था। उसका चेहरा तमतमाने से पहले की स्थितियों को प्रकट कर रहा था, पर अँधेरा कुछ जादा था। उजाला शाम सूरज ढलने से कुछ और कम हो गया था, इसलिए कुछ साफ़ साफ़ नहीं दिख रहा था। वह फ़िर थोड़ी देर बोलने की सोचता लेकिन चुप रह जाता। इधर-उधर देखने लगता।

वैसे वह हरबार दरवाज़े की तरफ़ देखता। और रुक जाता। हरबार वहाँ कोई परछाई होती और जल रहे पीले बल्ब की रौशनी। फ़िर बड़ी देर बाद, उसने मेज़ के नीचे खाली जगह में ख़ुद को समेटकर, लड़की के चेहरे के पास उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा।

“अगर तू रोज़ इतना लेट करेगी तो रहने दे फ़िर,
..मैं कोई और देख लूँगा..!!”

लड़की कुछ नहीं बोली। वह अभी भी फूलझाड़ू लिए गीले कपड़े से फ़र्श चमका रही थी। वह बिज़ी थी।

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